भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

नैतदपि युक्तम्; प्रतीयमानभागासिद्धत्वेनापि प्रतिहेतुना सत्प्रतिपक्षत्वप्रस- ङ्गात् । कियत्यपि पक्षे सत्त्वेन तस्य पक्षसत्त्वभावात् । न चैष्टव्यमेव भागासिद्धे- नापि सत्प्रतिपक्षत्वम् , प्रतीयमानदोषान्तरेणापि; तथा सति सत्प्रतिपक्षत्वस्यैष्टव्य- त्वापत्तेः, हेत्वाभासान्तरत्वाविशेषात् । न च सर्वपक्ष इति कृते नायं दोष इति वाच्यम् ; यत्रैक एव पक्षः प्रतिहेतौ तस्य सत्प्रतिपक्षस्याव्यापनात् । तत्र पक्षस्य सर्वशब्दार्थत्वाभावादेव सर्वपक्षसत्त्वा- भावेनोक्तलक्षणाानुपपत्तेः । एतेन—यावदित्यपि पक्षविशेषणे दोष उक्तप्रायः । किञ्च—अन्वयव्यतिरेकिणः केवलव्यतिरेकिणा, केवलव्यतिरेकिणश्चान्वय- व्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्षे लक्षणमिदं नास्ति, सपक्षसत्त्या तुल्यतायास्तत्राभावात् । खण्डन--यह भी युक्त नहीं, क्योंकि 'परमाण्वाकाशौ नित्यौ नीरूपद्रव्यत्वात् आत्मवत्' इसका 'परमाण्वाकाशौ अनित्यौ भूतमहत्त्वात् घटवत्' इससे [ जहाँ भागासिद्धि ज्ञात है, वहाँ भी ] सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा । कारण किसी एक पक्ष में रहने से इस भागासिद्ध हेतु में पक्षसत्त्व तो है, किन्तु भागासिद्धत्व प्रतीयमान होने से उसमें सत्प्रतिपक्षत्व इष्ट नहीं है । अन्यथा जहाँ अन्य दोष प्रतीयमान हों, वहाँ भी हेतु में सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा, कारण अन्य हेत्वाभासों से भागासिद्ध में कोई विशेष नहीं है । समर्थन—'सर्वपक्षसपक्षसत्त्व-विपक्षव्यावृत्तत्व-अबाधितत्वरूप समान बलयुक्त हेतु से बोधित है, साध्यविपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है' इस प्रकार पक्ष में 'सर्व' विशेषण देने से ज्ञात भागासिद्ध स्थल में यह अतिव्याप्ति ( सत्प्रतिपक्षत्व ) नहीं होगी । खण्डन— जहाँ एक ही पक्ष है—जैसे 'आकाशं नित्यं नीरूपद्रव्यत्वात् आत्मवत्', 'आकाशम् अनि- त्यम् बाह्येन्द्रियग्राह्यविशेषगुणाधिकरणत्वात्'—वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । इसी तरह पक्ष में यावत्त्व विशेषण दें, तो जो दोष होगा, वह उक्तप्राय ही है । अर्थात् 'सर्व' पद की तरह 'यावत्' पद भी अनेकार्थवाची होने से यही दोष बना रहेगा । किञ्च—'आत्मा स्वव्यवहारहेतुप्रकाशः अदृष्टत्वात् घटवत्' इस केवलव्यतिरेकी से 'आत्मा प्रत्यक्षः महत्त्वे सति अश्रावणविशेषगुणाधिकरणत्वात् घटवत्' इस अन्वयव्यति- रेकी का सत्प्रतिपक्षत्व तथा 'विवादाध्यासितं चित्कर्तृकं सावयवत्वात्' इस केवलव्यतिरेकी का 'विवादाध्यासितम्, अकर्तृकम् , शरीराजन्यत्वात् ; आत्मवत्' इस अन्वयव्यतिरेकी से सत्प्रतिपक्षत्व नहीं होगा, क.रण वहाँ सपक्षसत्त्वरूप तुल्यबलत्व नहीं है । केवल- व्यतिरेकी हेतु का सपक्ष न होने से वह सपक्षसत्त्व में अन्वयव्यतिरेकी प्रतिहेतु से हीनबल हो जायगा ।