भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

३५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम न च सपक्षसत्तया तुल्येनेति लक्षणे तदनुरोधान्न कर्तव्यमेव; तथा सति असाधारणानैकान्तिकतया निश्चितेनापि सत्प्रतिपक्षत्वप्रसङ्गात् । न चान्वयव्यतिरेकिणैव अन्वयव्यतिरेकिणः केवलव्यतिरेकिणैव केवलव्यति- रेकिणः सत्प्रतिपक्षता, न व्यत्यासेनापीति नियमोऽभ्युपगन्तुं शक्यः ; उभयोरपि अनवगम्यमानदोषान्तरत्वदशायाम् 'एकसम्बन्धिनो दोषस्यावश्यम्भावितया एक- तरस्य व्याप्त्यपक्षधर्मत्वावगमो मे भ्रान्तिर'ति बुद्धिमादाय प्रतिपत्तुर्निश्चयोत्पत्ति- प्रतिबन्धमाधातुं केवलव्यतिरेकिणि अन्वयव्यतिरेकिणोऽन्वयव्यतिरेकिणि च केवलव्यतिरेकिणः प्रतिहेतोः सामर्थ्यस्य दुरपवादत्वात् । एतदेव च सत्प्रति- समर्थन– उक्त स्थल में अव्याप्ति न हो, इसलिए सपक्षसत्त्व का लक्षण में निवेश ही नहीं करेंगे । खंडन -- सपक्षसत्त्व का निवेश न करने पर 'शब्दोऽनित्यः कार्य- त्वात्' यहाँ कार्यत्व-हेतु में 'शब्दो नित्यः आकाशविशेषगुणत्वात्' इससे असाधारणत्व के ज्ञानकाल में भी सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा; कारण पक्ष-सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, अबाधितविषयस्वरूप बल दोनों में तुल्य ही है । समर्थन – हम यह कहेंगे कि अन्वय-व्यतिरेकी के साथ अन्वय व्यतिरेकी की और केवल-व्यतिरेकी के साथ केवल-व्यतिरेकी को ही सत्प्रतिपक्षता है, इसके विपरीत नहीं । एवञ्च सपक्षसत्त्व पद न देने पर भी पूर्वोक्त असाधारण में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन — अन्वय-व्यतिरेकी में केवल-व्यतिरेकी प्रतिहेतु की निश्चयोत्पत्ति ( अनुमिति )- प्रतिबन्धकता की सामर्थ्य या केवल-व्यतिरेकी में अन्वय-व्यतिरेकी प्रतिहेतु की निश्चयोत्पत्ति ( अनुमिति )-प्रतिबन्धकता की सामर्थ्य का आप अपवाद ( खण्डन ) नहीं कर सकते । कारण वैसे दोनों हेतुओं के बीच एकमें असिद्ध्यादि दोष का ज्ञान हो, तो दूसरा सद्धेतु हो ही जायगा । किन्तु जहाँ दोनों में कोई दोष ज्ञात न हो, उस समय भी ऐसे हेतु यह बुद्धि उत्पन्न कर स्थापनावादी की निश्चयोत्पत्ति ( अनुमिति ) रोक ही सक्ते हैं कि 'इन दोनों हेतुओं के बीच एक में दोष अवश्यम्भावी होने से उनमें से एक को व्याप्ति-पक्षधर्मतायुक्त मानना मेरी भ्रान्ति ही है।' यदि कहें कि इस तरह अन्वय-व्यतिरेकी और केवल-व्यतिरेकी प्रतिहेतुओं में परस्पर निश्चयप्रति- बन्धकता तो मान लेंगे, पर उनमें सत्प्रतिपक्षता क्यों मानी जाय, तो वह भी ठीक नहीं । कारण सत्प्रतिपक्ष को दोष मानने का यही मूल है कि समान बलवाले प्रतिहेतु होने पर