खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष लक्षण का खण्डन ३५१ पक्षत्वस्य दोषत्वाम्युपगमे मूलं यन्नाम व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितिरस्मिन् सति न भवितुमर्हतीति । अथाभिधत्से—पक्षसपक्षसत्त्वविपक्षव्यावृत्तत्वाबाधितविषयत्वयो गिना बोधित- साध्यविपर्ययः सत्प्रतिपक्ष इति । न ; निरस्तप्रायत्वात् पक्षपदे सर्वशब्दविशेषण- प्रक्षेपाप्रक्षेपपक्षोक्तदोषस्य केवलव्यतिरेक्यव्यापकत्वस्यापि भावात् । किञ्च—सोपाधिमसिद्धभेदं वदतां मते सोपाधितया निश्चीयमानेऽपि सर्वं यथोक्तमिदं लक्षणमस्तीति तेनापि सत्प्रतिपक्षता स्यात् । अथ ब्रूषे—असिद्धविरुद्धानैकान्तिकबाधितविषयत्वहीनेन बोधितसाध्यासत्त्वः प्रकरणसम इति। नैतदपि सुस्थम्; आपाततोऽस्फुरद्दोषेण वस्तुगत्या वाऽसिद्ध्यादि- दोषवता सत्प्रतिपक्षतास्वीकारात् तद्व्यापकत्वात् । किञ्च—विरुद्धार्थगोचरयोः सत्प्रतिपक्षहेत्वोर्मध्येऽवश्यमन्यतरासिद्ध्यादिदोषेण व्याप्तिपक्षधर्मता की प्रमिति नहीं होती और यही बात इन विधर्मी प्रतिहेतुओं में भी है। अन्यथा कहीं सत्प्रतिपक्षता ही नहीं हो सकेगी। समर्थन—‘पक्ष-सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्तत्व, अबाधितविषयत्व से योगी (ज्ञायमान) हेतु से बोधित है साध्य-विपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है’ ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—यह लक्षण प्रायः पहले ही खण्डित हो चुका है। देखिये—पक्ष में ‘सर्व’ विशेषण न दें, तो प्रतीयमान भागासिद्ध से भी सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा। यदि ‘सर्व’ विशेषण दे, तो जहाँ एक व्यक्ति पक्ष है, वहाँ अव्याप्ति हो जायगी। किंच—जो आचार्य सोपाधिक हेतु को असिद्ध का भेद मानते हैं, उनके मत में सोपाधित्वरूप से निश्चित हेतु से भी सत्प्रतिपक्षता हो जायगी, कारण वहाँ भी उक्त लक्षण समन्वित हो जाता है। समर्थन—‘असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनैकान्तिकत्व, बाधितविषयत्व से हीन हेतु से बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है’ ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन—यह भी निर्दोष नहीं है, कारण यदि वास्तविक असिद्धत्वादिहीन कहें, तो आपाततः जहाँ दोष का स्फुरण नहीं है पर वस्तुतः असिद्धि आदि दोष हैं, उस हेतु में भी सत्प्रतिपक्षत्व होता है। किन्तु वहाँ यह लक्षण अव्याप्त हो जायगा, क्योंकि वह हेतु वस्तुतः असिद्धि आदि से हीन नहीं है। यदि असिद्धत्वादि-दुष्टत्वप्रतीति से रहित कहें, तो विरुद्धार्थसाधक सत्प्रतिपक्ष स्थल के दो हेतुओं के बीच एक में अवश्य ही असिद्ध्यादि होंगे। अन्यथा (यदि