भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 372

३५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु भवत्वेवमपि, तेन किन्न नाम भवेत् ? तस्यासिद्धतया हीनबलस्य सिद्धादिमता पक्षबाधं विधूय न किञ्चिदन्यत् । बाधादेव तर्हि न तेन सत्प्रतिपक्षतेति चेन्न । सन्दिह्यमानासिद्धतया सत्प्रति- पक्षहेतोरपि तर्हि कथं परहेत्वसाधकत्वप्रसाधकत्वं भविष्यति, हेत्वाभासत्वाविशेषात् । हेत्वाभासान्तरं न दोषसंशयापादकमतो नैवमिति चेन्न । तर्हि यमुपाधि- मादाय न्यूनबलतया बाध्यता, तामादायैव तथाविधोपाधेर्दोषसंशयक्षमत्वादेव । किञ्च—क्वचित्सत्प्रतिपक्षत्वनिश्चयाभावे संशयानुपपत्तिः । समर्थन—निश्चित उपाधिस्थल में भले ही सत्प्रतिपक्ष न हो, किन्तु शङ्कित उपाधिस्थल में तो वह (सत्प्रतिपक्ष) इष्ट ही है; उसमें क्या हानि है ? खण्डन—वहाँ प्रतिहेतु में उपाधि की शङ्का से असिद्धि की शङ्का होती है । अतः हीनबल होने से उसके पक्ष का, सिद्धि होने के कारण बलवान् स्थापनानुमान से, बाध हो जायगा । एवञ्च असमबल होने से वहाँ सत्प्रतिपक्षत्व नहीं हो सकता । समर्थन—तब तो शङ्कित उपाधिस्थल में बाध होने से ही सत्प्रतिपक्ष की आपत्ति भी नहीं दी जा सकती । खण्डन—यदि आप ऐसा कहें, तो जहाँ प्रतिहेतु के दर्शन से असिद्धि की शङ्का होती है, वहाँ भी हीनबल होने से प्रतिहेतु से स्थापनानुमान के हेतु में असाधकत्व का साधन नहीं होगा, कारण उपाधि की शङ्का से जहाँ हेतु में असिद्धि की शङ्का हुई ।' उससे और जहाँ प्रतिहेतु के दर्शन से असिद्धि की शङ्का हुई है, उस हेतु के हेत्वाभासत्व में कोई विशेष नहीं है । समर्थन—शङ्कित उपाधि से सत्प्रतिपक्षत्व की शङ्का नहीं होती और प्रतिहेतु के दर्शन से जात असिद्धि की शङ्का से सत्प्रतिपक्षत्व की शङ्का होती है । अतः उस स्थल में शङ्कित सत्प्रतिपक्ष माना जाता है । खण्डन—उपाधि के शङ्कास्थल में असिद्धि की शङ्का तो अवश्य मानेंगे । फिर वहाँ सत्प्रतिपक्षत्व की शङ्का नहीं होती और प्रतिहेतु दर्शन से ज्ञात असिद्धि के शङ्कास्थल में वह होती है, इसमें कोई विशेष कारण नहीं है । किञ्च—किसी स्थल में सत्प्रतिपक्षत्व का निश्चय हो, तो अन्यत्र शङ्कित सत्प्रतिपक्ष से भी व्यवहार हो सकता है । किन्तु उक्त प्रकार से जब कहीं भी असिद्ध्यादिहीनत्व का निश्चय नहीं है, तो असिद्धादि की शङ्का से सत्प्रतिपक्षत्व की शङ्का कैसे होगी ?

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · पृष्ठ 372, कुल 610 में से · BharatKosha