खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष लक्षण का खण्डन ३५५ अथान्यथाकारं लक्षणमभिधत्से—असिद्धिविरोधव्यभिचारकालात्ययापदेश- विरहितया प्रतीयमानेन बोधितो यदीयसाध्यस्य विपर्ययः, स प्रकरणसम इति । एतदपि विचारासहम् ; केन तथा प्रतीयमानत्वमभिमतं किं प्रत्यनुमानप्रयोक्त्रा, अथ प्रथमानुमानवादिना, द्वाभ्यामपि वा, येन केनचिद्वा ? न तावदाद्यः ; स्वयं दोषं जानतोऽपि दूषणान्तरापरिस्फूर्ती यद्ययं दोषं न प्रतिसन्धायति तदाऽभीष्टमेव । अथ प्रतिसन्धायति तदानीमन्यथाऽपि ममा- स्फुरद्दोषान्तरस्य पराजये अनेन कक्षान्तरारूढायां कथायां शाखान्तरं वा सङ्क्रमितुमवकाशमासादयिष्यामीत्यभिप्रायवतोऽल्पप्रज्ञस्य, मयि वदत्यसत्पक्षोऽपि निर्वहतीति लोके प्रकर्षदर्शनार्थम् , कथमपि ग्रन्थकारादिभिरुक्तस्य वा तथाविध- प्रतिहेतोर्निर्वाहार्थमन्यानुयुक्तस्य प्रौढप्रज्ञस्य स्फुरद्दोषेणापि प्रतिहेतुना सत्प्रति- पक्षीकरणदर्शनात् । तत्र परेण दोषानुद्भावने जयस्यापि भावात् । समर्थन – 'असिद्धि, विरोध, व्यभिचार, कालात्ययापदेश से रहितस्वरूप से ज्ञाय- मान जो हेतु, उससे जिस हेतु के साध्य का अभाव बोधित है, वह प्रकरणसम है' ऐसा लक्षणान्तर करेंगे । खंडन—यह कथन भी विचारसह नहीं है । देखिये—अन्ततः किससे प्रतीयमानत्व कहेंगे ? क्या प्रति-अनुमानप्रयोक्ता से, प्रथम अनुमानप्रयोक्ता से, दोनों से या जिस किसीसे ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण जब वादी-प्रयुक्त हेतु में असिद्धि आदि दोषों की स्फूर्ति नहीं होती, तब अल्पज्ञ पण्डित सदोष हेतु से भी इस आशय से सत्प्र- तिपक्ष देते हैं कि 'यदि वादी को दोषस्फूर्ति न हुई, तो निश्चय ही विजय होगी और यदि हुई, तो भी द्वितीय कक्षा में पराजय होगी या शाखान्तर के अवलम्बन का अवसर मिलेगा, जब कि सदोष हेतु सत्प्रतिपक्ष से न दें, तो इसी कक्षा में पराजय होती है । इतना ही नहीं, विशेषज्ञ भी जगत् में अपनी यह अतिशयता प्रकट करने के लिए सदोष हेतु से भी सत्प्रतिपक्ष देते हैं कि हमारे कहने पर असत्पक्ष का भी निर्वाह हो जाता है, तो सत्पक्ष की बात ही क्या है । किंवा 'ग्रन्थकार या गुरुओं द्वारा प्रयुक्त स्फुट दोष प्रति- हेतुका निर्वाह कैसे हो ?' इस प्रकार शिष्य या वादी द्वारा पूछे जाने पर उसके निर्वा- हार्ध भी प्रौढमति सदोष हेतु से सत्प्रतिपक्ष दे ही सकता है । वैसी स्थिति में प्रतिपक्षी को उसमें दोषस्फूर्ति न हो, तो विजय भी संभाव्य हो जाती है अर्थात् एकान्त पराजय की अपेक्षा विजय-संशय ही अच्छा है ।