भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 375

परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डनं ३५७ किञ्च—सर्वेषामेवैषां लक्षणानां धर्म्यादिग्राहकानुमानबाधितेऽपि गतत्वा- दतिव्यापकत्वम् । एतेन—स्वार्थानुमाने तदाभासेऽपि वा सत्प्रतिपक्षस्य दोषत्वमपोढम् । अथोच्यते—अगृह्यमाणविशेषेण बोधितसाध्यविपर्ययः प्रकरणसम इति । अस्तु तावत् केनागृह्यमाणत्वमित्यादिविकल्पदोषाभिधानम् । यदि यः कश्चिद्विशेषो विशेषशब्देनाभिप्रेतस्तदा तदग्रहणं क्वचिदपि नास्तीति सर्वाव्याप्तिः । अथ हेतुदोषलक्षणो विशेषोऽभिमतस्तदा धर्म्यादिग्राहकानुमान- बाधितेऽपि गतत्वादतिव्यापकता, अगृह्यमाणहेतुदोषरूपविशेषेण बोधितसाध्य- विपर्ययत्वात्तस्यापि, तत्र हेतुदोषस्याभावादेवागृह्यमाणविशेषत्वात् । न च अगृह्यमाणपरमार्थस्थितहेतुदोषरूपविशेषेणेति कृते निस्तारः ; तथा किञ्च—इन सभी लक्षणों की धर्मिग्राहक मान से बाधित हेतु में अतिव्याप्ति है, देखिये—'परमाणुः निरवयवः विश्रान्तपरिमाणतरतमादिभावत्वात् व्योमवत्' इस अनुमान में 'परमाणुः सावयवः मूर्तत्वात् घटवत्' इस अनुमान से सत्प्रतिपक्ष हो जायगा । कारण उक्त हेतु परमाणुरूप धर्मी के ग्राहक 'अणुपरिमाणतरतमभावः क्वचिद्विश्रान्तः, परिमाणतरतमादिभावत्वात्, महत्परिमाणतरतमादिभाववत्' इस अनुमान से बाधित होने से वास्तव में सत्प्रतिपक्षत नहीं है । इससे 'स्वार्थानुमान में सत्प्रतिपक्ष दोष है और वहाँ स्व से दोष अगृहीत है, अतः 'केन प्रतीयमानत्वम्' इत्यादि विकल्पोक्त दोष नहीं हैं,' यह कथन भी खण्डित हो जाता है । कारण उस दोष के न होने पर भी धर्मिग्राहक प्रमाण से बाधित अनुमानस्थलीय यह दोष तदवस्थ ही है । समर्थन—'अगृह्यमाण है विशेष जिसका, ऐसे हेतु से बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह हेतु प्रकरणसम है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—इस लक्षण में भी 'केन अगृह्यमाणत्वम्' इत्यादि विकल्पोक्त दोष हैं ही । किंच—विशेष से यदि यत्किंचित् विशेष का ग्रहण करें, तो यत्-किंचित् विशेष सर्वत्र गृहीत है, अतः अगृह्यमाणत्व न होने से सर्वत्र असम्भव हो जायगा । यदि हेतु-दोष लक्षण-विशेष का ग्रहण करें, तो धर्मिग्राहक अनुमान से बाधित में अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण वहाँ भी अगृह्यमाण है, विशेष जिसका ऐसे हेतु से बोधित साध्य- विपर्यय है ही; हेतु में दोष न होने से ही दोष अगृहीत है । समर्थन—'अगृह्यमाण है परमार्थतः स्थित हेतुदोषरूप विशेष जिसका, ऐसे हेतु से जिसका साध्यविपर्यय बोधित है, वह प्रकरणसम है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—