खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[३५८] सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
सति संत्प्रतिपक्षहेतुकः सत्प्रतिपक्षो न व्याप्यते । परमार्थतस्तिष्ठतीति च दर्शनीयम्, न च ज्ञेयमिति च महती प्रज्ञा । न चागृह्यमाणहेतुदोषहेतुगुणरूपविशेषेणेति विशेषणे विवक्षिते निस्तारः, व्यतिरेकिण्यन्वयव्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्षे हेतुगुणरूपो विशेषः सपक्षसत्त्वलक्षणो गृह्यते इति तदव्यापकत्वापत्तेः ! अथ अगृह्यमाणाव्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गरूपविशेषेणेति क्रियते, तदा प्रष्टव्यम्— किमपेक्ष्य विशेषत्वमिदमिष्टम् ? यदि यत्किञ्चिदपेक्ष्य, तदा प्रसिद्धासिद्ध्यादिभावं हेत्वाभासमपेक्ष्य विशेषो गृह्यते सदनुमानात्मके प्रतिहेताविति तत्राव्यापकत्वम् । अथ प्रकृतविरोधिनं हेतुमपेक्ष्य, तदा लक्षणवाक्यमीदृशं पर्यवस्यति— ऐसा मानने पर सद्हेतु से सत्प्रतिपक्षस्थल में अव्याप्ति हो जायगी, कारण सद्हेतु में परमार्थतः दोष नहीं होता । किञ्च—इस हेतु में परमार्थतः दोष है, यह दिखाना पड़ेगा; फिर वह अगृह्यमाण कैसे रहेगा ? अतः दोष परमार्थतः स्थित हो तथा अगृह्यमाण हो, यह आपका कथन बड़ी ही बुद्धिमानी का रहा ! समर्थन—'अगृह्यमाण है हेतु का दोषगुणरूप विशेष जिसका' इत्यादि विवक्षा से निर्वाह हो जायगा । खंडन—इस विवक्षा में 'आत्मा स्वव्यवहारहेतुप्रकाशः अदृष्टत्वात्' इस व्यतिरेकी में 'आत्मा प्रत्यक्षः महत्त्वे सति अश्रावणविशेषगुणाधिकरणत्वात्' इस अन्वय- व्यतिरेकी से सत्प्रतिपक्ष स्थल में सपक्षसत्त्वलक्षण हेतु का गुणरूप विशेष गृहीत है । अतः उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । प्रतिवादी स्वोक्त हेतु में सपक्षसत्त्व को न जानता हो, यह अशक्य है । समर्थन—'अगृह्यमाण है व्याप्तिपक्षधर्मता ( भाव-अभाव ) रूप विशेष जिसका, ऐसे हेतु से बोधित है साध्यविपर्यय जिसका, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—इस लक्षण में यह प्रष्टव्य है कि किसकी अपेक्षा से विशेष अभिप्रेत है, यदि यत्किञ्चित् की अपेक्षा, तो यत्किञ्चित् की अपेक्षा विशेष सदनुमान में भी अगृहीत है, अतः वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । यदि प्रकृत हेतु की अपेक्षा कहें, तो लक्षण-वाक्य ऐसा हुआ—'व्याप्तिपक्षधर्मता भंग-अभंगरूप ( भाव-अभावरूप ) प्रकृत हेतु की अपेक्षा जिसका विशेष गृह्यमाण
१. सन् = निरवद्यः प्रतिपक्षः = प्रतिहेतुः सद्धेतुरित्यर्थः ।