खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यश्चास्य सदनुमानतां न मन्यते, तं प्रत्येवंप्रायाणि बहून्युदाहरणानि सन्तीति तेषु प्रसङ्गः । न च सोऽपि तथाऽस्त्येव ; तस्य धर्मिसिद्ध्यर्थमुपजीव्यत्वेन बलवत्त्वात् । तद्व्यवच्छेदार्थं स प्रकृतः प्रकरणसम इति कर्तव्यमिति चेत् ; तथाप्यनुपपत्तिः। अत्र हि यदि यस्य न गृह्यत इति सम्बन्धः, तेन यत्सम्बन्धितया न गृह्यत इत्यर्थो विवक्षितः तदाऽव्यापकत्वं दोषः । तथाहि—यत्र द्वयोरपि हेत्वोः परमार्थतः साधारणो व्याप्त्यादिभङ्गः सत्प्रतिपक्षदशायामगृह्यमाणस्तत्र नास्त्येतल्लक्षणम् । न हि तत्र व्याप्त्यादिभङ्गो विशेषः, अपि तु प्रकृतहेतुना सह साधारण एव । नन्वत्यन्तासतो व्याप्त्यादिभङ्गरूपस्य विशेषस्यापि तावत्तत्राग्रहणमस्ति, तदादायैव लक्षणं तद्व्यापि भविष्यति । तर्हि यत्र वादी स्वहेतुसाधारणं व्याप्ति- भङ्गादिदोषं जानन् प्रतिहेतुनिष्ठतया परस्योद्भावयति, परश्च परिहर्तुं न शक्नोति जो भट्ट आदि इसको सदनुमान ही मानते हैं, उनके मत में 'आकाशं विभु निःस्पर्श- द्रव्यत्वात्' यह कहने पर 'आकाशं न विभु आत्मान्यविशेषगुणवत्त्वात्' इससे 'शब्दो भूतेन्द्रियग्राह्यो बहिर्द्रव्यत्वात्' इसे सत्प्रतिपक्षत्व हो जायगा । यहाँ आकाशरूपधर्मी का ग्राहक तृतीय अनुमान आकाश के विभुत्व में पर्यवसित है । यहाँ तृतीय अनुमान सत्प्रतिपक्षिक ही है, ऐसी इष्टापत्ति नहीं कह सकते । कारण वह अनुमानरूप धर्मी की सिद्धि के लिए है, अतः उपजीव्य होने से प्रबल है । समर्थन—इस दोष के निवारणार्थ हेतु में प्रकृत ( प्रथम ) विशेषण देंगे । एवञ्च तृतीय में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—फिर भी अनुपपत्ति है ही । यहाँ 'यदि विशेषो यस्य न गृह्यते' ऐसा अन्वय करें, तो 'विशेष यत्सम्बन्धित्वरूप से गृहीत न हो' यह अर्थ हुआ, तब अव्याप्ति दोष होगा । देखिये—जहाँ दोनों हेतुओं में वस्तुतः साधारण ( व्याप्त्यादिभङ्गरूप ) दोष है और सत्प्रतिपक्ष-दशा में वह अगृह्यमाण है, वहाँ इस लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । कारण व्याप्ति आदि का भङ्ग विशेष नहीं है, किन्तु दोनों हेतुओं के सम्बन्धी होने से साधारण ( सामान्य ) ही है । फिर जब विशेष नहीं है, तो हेतुसम्बन्धित्वरूप से ग्रहण किसका होगा ? यदि कहें कि 'अत्यन्त असत् जो व्याप्त्यादिभङ्गरूप विशेष, उसका अग्रहण यहाँ है ही, अतः अव्याप्ति नहीं होगी' तो जहाँ व्याप्त्यादिभङ्गरूप दोष को वादी स्वहेतु- साधारण जानता हुआ, पर के प्रति प्रतिहेतुनिष्ठत्वरूप से उद्भावन करता है और प्रति-