खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम सर्वानुमानानां सत्प्रतिपक्षता दुर्निंवारो । तद्यथा-- शब्दानित्यत्वानुमानेन बुद्धिमद्भिः शतशः शब्दनित्यत्ववादिजयात्, शब्दनित्यत्वानुमानेन च प्राज्ञैः शतशः शब्दानित्यत्ववादिजयात् । द्वयोः पक्षयोरनुमानेषु कतरद्वस्तुतः सदनुमान- मित्यर्हतो दोषसंशयस्य दुर्निंवारत्वादिति । बाध-लक्षण-खण्डनम् प्रकारभेदाभावाच्च न कालात्ययापदिष्टः पृथक् । तद्यथा—बाधितविषयः कालात्ययापदिष्ट इत्यलक्षणम् । तथाहि—बाधितविषयत्वं किं विवक्षितम् ? न तावद् बलवता बोधितो विषय- विपर्ययो यस्य तत्त्वम्; यथाश्रुतस्य सत्प्रतिपक्षेऽपि गतत्वात् । तत्र प्रत्यनुमानस्य प्रथमानुमानविषयविपर्ययबोधकस्य पक्षधर्मतादिबलसम्भवात् । अथ बलवदित्यधिकबलेनेति विवक्षितम्, तदाऽपि केवलव्यतिरेकिणोऽन्वय- कारण बुद्धिमान् नैयायिकों ने शब्दानित्यत्वानुमान से सौ बार शब्दनित्यत्ववादियों को परास्त किया होगा । और प्राज्ञ मीमांसकों ने शब्दनित्यत्वानुमान से हजार बार शब्दा- नित्यत्ववादियों को परास्त किया होगा । अतः दोनों पक्षों में कौन वस्तुतः सदनुमान है, यह योग्य सन्देह सर्वत्र दुर्वार है । फिर जब स्वहेतु में औचित्य से आभासत्व का सन्देहरूप सत्प्रतिपक्ष का फल सर्वत्र विद्यमान है, तो सर्वत्र सत्प्रतिपक्षत्व क्यों न हो ? बाध-लक्षण का खण्डन उक्त हेत्वाभास के प्रकारों से अन्य प्रकार भी सम्भव नहीं है, अतः कालात्ययाप- देश (बाध) भी भिन्न हेत्वाभास नहीं है। देखिये—'बाधित विषय ( साध्य ) है जिसका, वह कालात्ययापदेश है,' यह लक्षण उसका नहीं कह सकते । कारण बाधितविषयत्व क्या है, इसका निर्वचन नहीं हो सकता । देखिये—'बलवान् से बोधित विषय ( साध्य) का अभाव जिसका, वह बाधित- विषयत्व है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि यथाश्रुत (बलवत्त्व के विवेचन के बिना (सामान्यतः) लक्षण सत्प्रतिपक्ष में भी अतिव्याप्त है । वहाँ भी प्रथम अनुमानके विषय के अभाव के बोधक द्वितीय अनुमान में पक्षधर्मता आदि बल है ही । यदि 'बल' से अधिक बलका ग्रहण करें, तो केवलव्यतिरेकी के अन्वय-व्यतिरेकी से