भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३६७ व्यतिरेकिणा सत्प्रतिपक्षे गतत्वादतिव्यापकत्वम्, तत्रान्वयव्यतिरेकिणः प्रतिहेतोः सपक्षसत्त्वलक्षणबलाधिक्यसम्भवात् । किञ्चैवं प्रत्यक्षेणानुमानाभासबाधो न स्यात् । प्रत्यक्षस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षो- त्पन्नाभ्रान्तज्ञानकरणत्वमात्रं बलम्,अनुमानस्य तु पक्षधर्मत्वादिभूयिष्ठं बलमितिचे । अथ मन्यसे-अनन्यथासिद्धत्वं बलं विवक्षित्वेवमुच्यते । तेनानन्यथासिद्धेन बोधितो यदीयसाध्यस्य व्यतिरेकस्तत्त्वं बाधितविषयत्वमिति । मैवम्; तथाऽपि वस्तुतोऽनन्यथासिद्धेन सत्प्रतिपक्षेऽपि गतत्वम् । किञ्च-अन्यथेत्यन्येन प्रकारेणेत्युच्यते, अनन्यथेति चानन्येन प्रकारेण, यस्मादनन्यत्वं तेनैवेत्यर्थः सम्पद्यते । तथा च वक्तव्यं किं तदन्यताप्रतियोगीति ? प्रामाण्यं तदिति चेत् , अहो दुर्वैदग्धी भवतः । प्रामाण्येनेति वक्तव्ये 'प्रामाण्यात् योऽन्यः, स यो न भवति, तेन प्रकारेण यः सिद्धः प्रतीत उत्पन्नो वा तेने'ति ब्रुवाणस्य । दिये जानेवाले सत्प्रतिपक्षत्व में अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण वहाँ अन्वय-व्यतिरेकी प्रतिहेतु में सपक्षसत्त्वरूप बल अधिक है । किञ्च-ऐसा लक्षण मानने पर प्रत्यक्ष से अनुमानाभास का बाध नहीं होगा, कारण प्रत्यक्ष में इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न अभ्रान्त ज्ञानमात्र का करणत्वरूप बल है, किन्तु अनुमान में तो पक्षधर्मता आदि बहुत-सा बल है । समर्थन--अनन्यथासिद्ध बल के अभिप्राय से यहाँ अधिक बल का कथन है । अतः 'अनन्यथासिद्ध बलवान् से जिसके साध्य का अभाव बोधित है, वह कालात्या- पदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो कोई दोष न होगा । खंडन-ऐसा लक्षण करने पर भी वस्तुतः अनन्यथासिद्ध (सद्धेतु) से दिये गये सत्प्रतिपक्ष में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च-'अन्यथा, शब्द का 'अन्य प्रकार से' यह अर्थ है और 'अनन्यथा' शब्द का 'अनन्य प्रकार से' । अर्थात् जिससे अन्य न हो 'उसीसे' यह अर्थ सम्पन्न हुआ । अब यह बताना होगा कि इस अन्यत्व का प्रतियोगी कौन है ? यदि प्रामाण्य को उसका प्रतियोगी कहें, तो प्रामाण्य से सिद्ध अर्थात् 'प्रमाण से' इस कथन के स्थान पर 'प्रामाण्य से जो अन्य, वह जो न हो, उससे सिद्ध ( उत्पन्न या प्रतीत ) उससे' यह कथन करनेवाले आपकी वैदग्धी (चातुर्य) सचमुच आश्चर्यजनक है ।