भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 392

अथ ब्रूषे—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्याभावः, स प्रत्यक्षाभासातिरिक्तः कालात्ययापदिष्ट इति । नैतदपि सुस्थम् ; शब्दोपमानाभाससाधारण्यात् । तद्व्यतिरिक्त इत्यपि विशेषणीयमिति चेत् । एतदपि विचार्यताम्; किं प्रत्य- क्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वं प्रत्यक्षाभासादिभ्यो वैधर्म्यं किञ्चित्, उत स्वरूपभेदः, अथवाऽन्योन्याभावः ? न तावदाद्यः; तद्भेदकस्य धर्मस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । नापि द्वितीयः ; स्वरूपस्य परस्परव्यावृत्ततया लक्षणानौपयिकत्वात् । नापि तृतीयः ; व्यतिरिक्त- त्वस्यान्योन्याभावात्मनः प्रत्यक्षाभासादावपि भावेन तद्व्यवच्छेदानुपपत्तेः । ननु न व्यतिरिक्तमात्रमन्योन्याभावस्वरूपं विशेषणमस्माभिरुपात्तम्, किन्नाम ? प्रत्यक्षाभासादिभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । न च प्रत्यक्षाभासादयः स्वात्मभ्य एव भिन्नाः, तत्कथमुक्तस्य प्रसङ्गस्यावकाशः ? अवगतमिदं त्वद्विव- समर्थन—'प्रमाण से बोधित है साध्यव्यतिरेक जिसका, और जो प्रत्यक्षाभास से व्यतिरिक्त भी हो, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह भी युक्त नहीं है, कारण जहाँ शब्द से शब्दाभास का अथवा उपमानाभास का बाध है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'शब्दाभास-उपमानाभास-व्यतिरिक्तत्व' निवेश कर देंगे, तो उक्त दोष नहीं होगा । खण्डन—यहाँ यह भी विचारें कि प्रत्यक्षाभासादि-व्यतिरिक्तत्व क्या वस्तु है ? क्या प्रत्यक्षाभास से कुछ वैधर्म्य है, स्वरूपभेद है या अन्योन्या- भाव है ? इनमें प्रथम वैधर्म्यरूप व्यतिरिक्तत्व नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि कालात्ययापदेश में कोई भेदक धर्म निरुक्त हो नहीं है । द्वितीय (स्वरूपरूप) व्यतिरिक्तत्व भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप परस्पर व्यावृत्त होने से लक्षण का उपयोगी नहीं है । अर्थात् लक्षण लक्ष्यमात्र का उपसंग्राहक होना चाहिए और स्वरूप ऐसा नहीं है । तृतीय (अन्योन्याभावरूप) व्यतिरिक्तत्व भी ठीक नहीं है, कारण वह प्रत्यक्षाभास में भी विद्यमान है, अतः उसका व्यवच्छेद नहीं हो सकता । समर्थन—हम अन्योन्याभावरूप व्यतिरिक्तमात्र विशेषण नहीं देते, किन्तु प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्व विशेषण देते हैं । एवञ्च प्रत्यक्षाभास अपनी आत्मा से भिन्न नहीं, फिर उसमें अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खण्डन—आप क्या कहना चाहते हैं, वह सब तो जान लिया । विचारणीय यही है कि अन्योन्याभाव का लक्षण में निवेश