खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७३ उपलक्षणेन चासताऽपि व्यवच्छिन्नप्रतीतिरूपजन्यते । यथा—'काकवन्तो देवदत्तगृहाः' इत्युपलक्षणीभूतया काकवत्तया देवदत्तगृहस्य व्यवहारकाल इति । यतस्तत्रोपलक्ष्यदेवदत्तगृहस्य स्वाभाविको विशेषोऽस्ति व्यवहारकाले, तेन काकवत्त्वाभावेऽपि तमादाय व्यवहारनियमप्रवृत्तिः, न तु तत्राऽप्यसत उपलक्षणस्य कारणत्वम् । अत्र तु व्यक्तीनामुपलक्ष्यत्वे लक्षणस्याननुगतत्वम् । अनुगतञ्च किञ्चिदुपलक्ष्यं न लक्षयामहे । अत उक्तमेव वाक्यार्थमादाय प्रवर्तमाने लक्षणात्मके साधने विशेषाणासिद्धिर्दुर्निवारा । एतेन पूर्वशङ्कितस्य हेतुरित्यस्य प्रत्यक्षाभासव्यवच्छेदार्थमुपात्तस्य स्थाने हेतुत्वाभिमत इत्येतादृशस्य करणं दूषितप्रायम् । होता ही है । जैसे 'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' यहाँ असत् भी काक उपलक्ष्य देवदत्तगृह की प्रतीति का जनक होता है । खण्डन—'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' इस स्थल में व्यवहार-काल में काकरूप उपलक्षण न होने पर भी उपलक्ष्य देवदत्त- गृह में इष्टका-दारूमयत्व आदि विशेष विद्यमान ही हैं । अतएव व्यवहार की प्रवृत्ति होती है । असत् काक वहाँ भी व्यवहार का कारण नहीं है । यदि यहाँ तत्-तत् व्यक्ति को उपलक्ष्य मानें, तो लक्षण का अननुगम होगा । कोई अनुगत रूप हमें नहीं दीखता, अतः प्रतीति को विशेषण ही मानना होगा । एवञ्च लक्ष्य में व्यतिरेकानुमिति के साधक उक्त लक्षण में विशेषण की असिद्धि हो जायगी । इसी प्रकार प्रत्यक्षाभास के व्यवच्छेद के लिए उपात्त 'हेतु' पद के स्थान पर विकल्प- भय से 'हेतुत्वाभिमतत्व'रूप जो विशेषण दिया गया है, वह भी दूषितप्राय जानना चाहिए । अर्थात् 'हेतुत्वाभिमत' यहाँ अभिमान क्या पदार्थ है ? क्या वह अभ्युपगम है, प्रमा है या भ्रान्ति है ? अभ्युपगम कहें, तो वह दूषक का नहीं है, क्योंकि उसने असद्हेतु माना है । स्थापनावादी का भी नहीं, कारण उसने भी अपने हेतु में आभासता समझकर ही स्थापना का प्रयोग किया है । सिवा इसके उपन्यास को अभ्युपगम मानें, तो स्वार्थानुमान-बाध का असंग्रह हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, बाधित हेतु में व्याप्ति या पक्षधर्मता इनमें से किसी एक का भंग निश्चित होने से हेतुत्वप्रतीति प्रमा नहीं, अप्रमा ही है । तृतीय पक्ष भी अस्वीकार्य है, बाधग्रह होने पर हेतुभ्रम नहीं हो सकता । कदाचित् उसे अपेक्षणीय मानें, तो अव्यावर्तकता या अतिव्याप्ति होगी, कारण प्रत्यक्षाभासादि में कदाचित् हेतुभ्रम हो सकता है, यह भाव है ।