भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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३७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रतीतिविषयांशस्य व्यतिरेकः, स कालात्ययापदिष्ट इति । अस्य च वाक्यार्थस्य न कदाचिदपि सम्भवं पश्यामः । यदा तावत्प्रमाणेन साध्यस्य व्यतिरेकबोधस्तदा पक्षप्रतीतिर्नास्ति विशेषदर्शने भ्रमस्यानवकाशात् । ततश्च तदा पक्षप्रतीत्यभावेन तद्विषयत्वाभावात् तद्विषयांशस्येति विशेषणाभावाधीनो विशिष्टस्य लक्षणात्म- नोऽभावः । यदाऽपि च प्रमाणेन साध्यव्यतिरेकबोधनं नास्ति, तदा तस्यैव लक्षणा- भागस्याभावात् लक्षणाभाव इति नित्यमसत्त्वव्यवस्थितेन लक्षणेन लक्ष्यं व्यवस्था- पयन् श्लाघनीयप्रज्ञो भवान् । न च वैशेषिकप्रक्रियामाश्रित्य विनश्यदवस्थाऽपि पक्षप्रतीतिस्तत्काले सम्भा- वनीया । तदीयसाध्यव्यतिरेकावगमनिवर्तनीया हि सा । तत्साध्यव्यतिरेकावगमश्च पूर्वतरमेव भूत इत्यवश्यमभ्युपगम्यम् । अन्यथा प्रमाणेन बोध्यमानत्वं कथं साध्यव्यतिरेकस्य तदाऽवगम्येत । न च वाच्यं प्रतीतिविषयत्वमिदं विशेषणं न भवति, किन्तु उपलक्षणम् । साध्य के व्यतिरेक का बोध हो, तब पक्ष की प्रतीति हो ही नहीं सकती । कारण विशेष-दर्शन होने से भ्रम का अवकाश ही नहीं है । तब तो उस काल में पक्ष की प्रतीति का अभाव होने से तद्विषयत्व का अभाव है । अतः तद्विषयांशरूप विशेषण के अभाव से विशिष्ट लक्षण का भी अभाव होने के कारण सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । फिर जिस काल में प्रमाण से साध्य के व्यतिरेक का बोध नहीं है, उस काल में उसी लक्षणभाग का अभाव होने से लक्षण का अभाव है। अतः सदा लक्ष्य में अविद्यमान लक्षण से लक्ष्य की व्यवस्था करनेवाले आपकी बुद्धि प्रशंसनीय (बुद्धि की बलिहारी ) है ! समर्थन—वैशेषिक-प्रक्रिया (योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिविशेषगुणनाश्यत्व- रूप नियम ) का आश्रयणकर बाधग्रहकाल में भी विनश्यत्-अवस्था का या द्वितीय- क्षणचुम्बिनी पक्ष की प्रतीति हो सकती है । अतः उस प्रतीति का आश्रयणकर समन्वय हो जायगा । खण्डन —साध्य-प्रतीति की निवृत्ति साध्याभाव-प्रतीति से होती है और साध्याभाव की प्रतीति पहले हो चुकी है, यह अवश्य मानना होगा । अन्यथा साध्य-व्यतिरेक का प्रमाणतः बोध्यमानत्व ज्ञात कैसे होगा ? समर्थन—'प्रतीति-विषयत्व' पक्ष का विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है । एवञ्च अविद्यमान भी उपलक्षण व्यवच्छिन्नत्व रूप से उपलक्ष्य की प्रतीति का कारण