भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७१ पक्षत्वाभिमतांशभूतस्येति च क्रियमाणे प्रष्टव्यं किं पक्षत्वाभिमतत्वम्— किमु पक्षतयाऽभ्युपगम्यमानत्वम्, अथ तत्तया प्रमितत्वम्, उत प्रत्यक्षतया प्रतीतत्वम् ? नाद्यः; दूषकं प्रति तदसम्भवात्, तेन बाध्यसाध्यस्य पक्षाभासतयैव प्रत्युताङ्गीकारात् । अनुमानवाद्यपेक्षयाऽपि नियमाभावः, सदनुमानापरिस्फूर्त्तौ मन्दप्रज्ञेन प्रज्ञाभिमानभृता च 'मयि वदति स्फुटदोषमपि को दूषयितुं शक्तः' इत्यभिप्रायेण यदृच्छया ज्ञातदोषस्यापि प्रयोगस्य सम्भवात् । तत्रानुमानवादिना पक्षत्वाङ्गीकाराभावेन तथाभूतबाधितानुमानाव्यापकमिदं लक्षणं स्यात् । न च पक्षतयोपन्यस्यमानत्वमङ्गीकारार्थ इति युक्तम्; तथा सति स्वार्थानुमाने कालात्ययापदेशाव्याप्तिः । नापि द्वितीयः; पक्षत्वेन प्रमिते विषये कालात्ययापदेशानवकाशात् । नापि तृतीयः; तदा ह्येवं लक्षणमिदं सम्पद्यते—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्यस्य पक्ष- यदि साध्य में 'पक्षत्वाभिमत में अंशभूत' यह विशेषण दें, तो यह पूछा जायगा कि पक्षत्वाभिमतत्व क्या वस्तु है—क्या पक्षत्वरूप से अभ्युपगम्यमानत्व है अथवा पक्षत्व- रूप से प्रमितत्व है या पक्षत्वरूप से प्रतीतत्वमात्र है? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण बाध का उद्भावनकर्ता ( अनुमान का दूषक ) वहाँ साध्य बाधित होने से उसे पक्षरूप से स्वीकार नहीं करता, किन्तु पक्षाभासत्वरूप से ही स्वीकार करता है । अनुमानवादी भी उसे पक्षरूप मानें, यह नियम नहीं है; कारण सत्-अनुमान की अस्फूर्तिदशा में मन्दप्रज्ञ तथा प्रज्ञाभिमानी भी 'जब मैं कहता हूँ, तो स्फुट दोष को भी कौन दूषित कर सकता है' इस अभिप्राय से स्वेच्छा से सदोषत्वरूप से ज्ञात का भी प्रयोग करता है । वहाँ बाधित अनुमान के विषय पक्ष को अनुमानवादी भी पक्षत्वरूपसे स्वीकार नहीं करता । अतः उस स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'पक्षत्वरूप से उपन्यास अभ्युपगम्यमानत्व है ।' उक्त स्थल में उपन्यास है, अतः दोष नहीं है । खंडन—यह भी युक्त नहीं, कारण स्वार्थानुमान में पक्ष का उपन्यास नहीं होता, अत वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण जहाँ पक्ष की प्रमिति है, वहाँ कालात्यया- पदेश नहीं हो सकता । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण उस कल्प में ऐसा लक्षण सम्पन्न हुआ कि 'प्रमाण से जिसके पक्ष की प्रतीति के अंशभूत साध्य का व्यतिरेक बोधित है, वह कालात्ययापदिष्ट है । इस वाक्य का कहीं भी सम्भव नहीं दीखता । जब