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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७१ पक्षत्वाभिमतांशभूतस्येति च क्रियमाणे प्रष्टव्यं किं पक्षत्वाभिमतत्वम्— किमु पक्षतयाऽभ्युपगम्यमानत्वम्, अथ तत्तया प्रमितत्वम्, उत प्रत्यक्षतया प्रतीतत्वम् ? नाद्यः; दूषकं प्रति तदसम्भवात्, तेन बाध्यसाध्यस्य पक्षाभासतयैव प्रत्युताङ्गीकारात् । अनुमानवाद्यपेक्षयाऽपि नियमाभावः, सदनुमानापरिस्फूर्त्तौ मन्दप्रज्ञेन प्रज्ञाभिमानभृता च 'मयि वदति स्फुटदोषमपि को दूषयितुं शक्तः' इत्यभिप्रायेण यदृच्छया ज्ञातदोषस्यापि प्रयोगस्य सम्भवात् । तत्रानुमानवादिना पक्षत्वाङ्गीकाराभावेन तथाभूतबाधितानुमानाव्यापकमिदं लक्षणं स्यात् । न च पक्षतयोपन्यस्यमानत्वमङ्गीकारार्थ इति युक्तम्; तथा सति स्वार्थानुमाने कालात्ययापदेशाव्याप्तिः । नापि द्वितीयः; पक्षत्वेन प्रमिते विषये कालात्ययापदेशानवकाशात् । नापि तृतीयः; तदा ह्येवं लक्षणमिदं सम्पद्यते—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्यस्य पक्ष- यदि साध्य में 'पक्षत्वाभिमत में अंशभूत' यह विशेषण दें, तो यह पूछा जायगा कि पक्षत्वाभिमतत्व क्या वस्तु है—क्या पक्षत्वरूप से अभ्युपगम्यमानत्व है अथवा पक्षत्व- रूप से प्रमितत्व है या पक्षत्वरूप से प्रतीतत्वमात्र है? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण बाध का उद्भावनकर्ता ( अनुमान का दूषक ) वहाँ साध्य बाधित होने से उसे पक्षरूप से स्वीकार नहीं करता, किन्तु पक्षाभासत्वरूप से ही स्वीकार करता है । अनुमानवादी भी उसे पक्षरूप मानें, यह नियम नहीं है; कारण सत्-अनुमान की अस्फूर्तिदशा में मन्दप्रज्ञ तथा प्रज्ञाभिमानी भी 'जब मैं कहता हूँ, तो स्फुट दोष को भी कौन दूषित कर सकता है' इस अभिप्राय से स्वेच्छा से सदोषत्वरूप से ज्ञात का भी प्रयोग करता है । वहाँ बाधित अनुमान के विषय पक्ष को अनुमानवादी भी पक्षत्वरूपसे स्वीकार नहीं करता । अतः उस स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'पक्षत्वरूप से उपन्यास अभ्युपगम्यमानत्व है ।' उक्त स्थल में उपन्यास है, अतः दोष नहीं है । खंडन—यह भी युक्त नहीं, कारण स्वार्थानुमान में पक्ष का उपन्यास नहीं होता, अत वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण जहाँ पक्ष की प्रमिति है, वहाँ कालात्यया- पदेश नहीं हो सकता । तृतीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण उस कल्प में ऐसा लक्षण सम्पन्न हुआ कि 'प्रमाण से जिसके पक्ष की प्रतीति के अंशभूत साध्य का व्यतिरेक बोधित है, वह कालात्ययापदिष्ट है । इस वाक्य का कहीं भी सम्भव नहीं दीखता । जब

३७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रतीतिविषयांशस्य व्यतिरेकः, स कालात्ययापदिष्ट इति । अस्य च वाक्यार्थस्य न कदाचिदपि सम्भवं पश्यामः । यदा तावत्प्रमाणेन साध्यस्य व्यतिरेकबोधस्तदा पक्षप्रतीतिर्नास्ति विशेषदर्शने भ्रमस्यानवकाशात् । ततश्च तदा पक्षप्रतीत्यभावेन तद्विषयत्वाभावात् तद्विषयांशस्येति विशेषणाभावाधीनो विशिष्टस्य लक्षणात्म- नोऽभावः । यदाऽपि च प्रमाणेन साध्यव्यतिरेकबोधनं नास्ति, तदा तस्यैव लक्षणा- भागस्याभावात् लक्षणाभाव इति नित्यमसत्त्वव्यवस्थितेन लक्षणेन लक्ष्यं व्यवस्था- पयन् श्लाघनीयप्रज्ञो भवान् । न च वैशेषिकप्रक्रियामाश्रित्य विनश्यदवस्थाऽपि पक्षप्रतीतिस्तत्काले सम्भा- वनीया । तदीयसाध्यव्यतिरेकावगमनिवर्तनीया हि सा । तत्साध्यव्यतिरेकावगमश्च पूर्वतरमेव भूत इत्यवश्यमभ्युपगम्यम् । अन्यथा प्रमाणेन बोध्यमानत्वं कथं साध्यव्यतिरेकस्य तदाऽवगम्येत । न च वाच्यं प्रतीतिविषयत्वमिदं विशेषणं न भवति, किन्तु उपलक्षणम् । साध्य के व्यतिरेक का बोध हो, तब पक्ष की प्रतीति हो ही नहीं सकती । कारण विशेष-दर्शन होने से भ्रम का अवकाश ही नहीं है । तब तो उस काल में पक्ष की प्रतीति का अभाव होने से तद्विषयत्व का अभाव है । अतः तद्विषयांशरूप विशेषण के अभाव से विशिष्ट लक्षण का भी अभाव होने के कारण सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । फिर जिस काल में प्रमाण से साध्य के व्यतिरेक का बोध नहीं है, उस काल में उसी लक्षणभाग का अभाव होने से लक्षण का अभाव है। अतः सदा लक्ष्य में अविद्यमान लक्षण से लक्ष्य की व्यवस्था करनेवाले आपकी बुद्धि प्रशंसनीय (बुद्धि की बलिहारी ) है ! समर्थन—वैशेषिक-प्रक्रिया (योग्यविभुविशेषगुणानां स्वोत्तरवर्तिविशेषगुणनाश्यत्व- रूप नियम ) का आश्रयणकर बाधग्रहकाल में भी विनश्यत्-अवस्था का या द्वितीय- क्षणचुम्बिनी पक्ष की प्रतीति हो सकती है । अतः उस प्रतीति का आश्रयणकर समन्वय हो जायगा । खण्डन —साध्य-प्रतीति की निवृत्ति साध्याभाव-प्रतीति से होती है और साध्याभाव की प्रतीति पहले हो चुकी है, यह अवश्य मानना होगा । अन्यथा साध्य-व्यतिरेक का प्रमाणतः बोध्यमानत्व ज्ञात कैसे होगा ? समर्थन—'प्रतीति-विषयत्व' पक्ष का विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है । एवञ्च अविद्यमान भी उपलक्षण व्यवच्छिन्नत्व रूप से उपलक्ष्य की प्रतीति का कारण

परिच्छेद ] बाध-लक्षण का खण्डन ३७३ उपलक्षणेन चासताऽपि व्यवच्छिन्नप्रतीतिरूपजन्यते । यथा—'काकवन्तो देवदत्तगृहाः' इत्युपलक्षणीभूतया काकवत्तया देवदत्तगृहस्य व्यवहारकाल इति । यतस्तत्रोपलक्ष्यदेवदत्तगृहस्य स्वाभाविको विशेषोऽस्ति व्यवहारकाले, तेन काकवत्त्वाभावेऽपि तमादाय व्यवहारनियमप्रवृत्तिः, न तु तत्राऽप्यसत उपलक्षणस्य कारणत्वम् । अत्र तु व्यक्तीनामुपलक्ष्यत्वे लक्षणस्याननुगतत्वम् । अनुगतञ्च किञ्चिदुपलक्ष्यं न लक्षयामहे । अत उक्तमेव वाक्यार्थमादाय प्रवर्तमाने लक्षणात्मके साधने विशेषाणासिद्धिर्दुर्निवारा । एतेन पूर्वशङ्कितस्य हेतुरित्यस्य प्रत्यक्षाभासव्यवच्छेदार्थमुपात्तस्य स्थाने हेतुत्वाभिमत इत्येतादृशस्य करणं दूषितप्रायम् । होता ही है । जैसे 'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' यहाँ असत् भी काक उपलक्ष्य देवदत्तगृह की प्रतीति का जनक होता है । खण्डन—'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' इस स्थल में व्यवहार-काल में काकरूप उपलक्षण न होने पर भी उपलक्ष्य देवदत्त- गृह में इष्टका-दारूमयत्व आदि विशेष विद्यमान ही हैं । अतएव व्यवहार की प्रवृत्ति होती है । असत् काक वहाँ भी व्यवहार का कारण नहीं है । यदि यहाँ तत्-तत् व्यक्ति को उपलक्ष्य मानें, तो लक्षण का अननुगम होगा । कोई अनुगत रूप हमें नहीं दीखता, अतः प्रतीति को विशेषण ही मानना होगा । एवञ्च लक्ष्य में व्यतिरेकानुमिति के साधक उक्त लक्षण में विशेषण की असिद्धि हो जायगी । इसी प्रकार प्रत्यक्षाभास के व्यवच्छेद के लिए उपात्त 'हेतु' पद के स्थान पर विकल्प- भय से 'हेतुत्वाभिमतत्व'रूप जो विशेषण दिया गया है, वह भी दूषितप्राय जानना चाहिए । अर्थात् 'हेतुत्वाभिमत' यहाँ अभिमान क्या पदार्थ है ? क्या वह अभ्युपगम है, प्रमा है या भ्रान्ति है ? अभ्युपगम कहें, तो वह दूषक का नहीं है, क्योंकि उसने असद्हेतु माना है । स्थापनावादी का भी नहीं, कारण उसने भी अपने हेतु में आभासता समझकर ही स्थापना का प्रयोग किया है । सिवा इसके उपन्यास को अभ्युपगम मानें, तो स्वार्थानुमान-बाध का असंग्रह हो जायगा । द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, बाधित हेतु में व्याप्ति या पक्षधर्मता इनमें से किसी एक का भंग निश्चित होने से हेतुत्वप्रतीति प्रमा नहीं, अप्रमा ही है । तृतीय पक्ष भी अस्वीकार्य है, बाधग्रह होने पर हेतुभ्रम नहीं हो सकता । कदाचित् उसे अपेक्षणीय मानें, तो अव्यावर्तकता या अतिव्याप्ति होगी, कारण प्रत्यक्षाभासादि में कदाचित् हेतुभ्रम हो सकता है, यह भाव है ।

अथ ब्रूषे—प्रमाणेन बोधितो यदीयसाध्याभावः, स प्रत्यक्षाभासातिरिक्तः कालात्ययापदिष्ट इति । नैतदपि सुस्थम् ; शब्दोपमानाभाससाधारण्यात् । तद्व्यतिरिक्त इत्यपि विशेषणीयमिति चेत् । एतदपि विचार्यताम्; किं प्रत्य- क्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वं प्रत्यक्षाभासादिभ्यो वैधर्म्यं किञ्चित्, उत स्वरूपभेदः, अथवाऽन्योन्याभावः ? न तावदाद्यः; तद्भेदकस्य धर्मस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । नापि द्वितीयः ; स्वरूपस्य परस्परव्यावृत्ततया लक्षणानौपयिकत्वात् । नापि तृतीयः ; व्यतिरिक्त- त्वस्यान्योन्याभावात्मनः प्रत्यक्षाभासादावपि भावेन तद्व्यवच्छेदानुपपत्तेः । ननु न व्यतिरिक्तमात्रमन्योन्याभावस्वरूपं विशेषणमस्माभिरुपात्तम्, किन्नाम ? प्रत्यक्षाभासादिभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । न च प्रत्यक्षाभासादयः स्वात्मभ्य एव भिन्नाः, तत्कथमुक्तस्य प्रसङ्गस्यावकाशः ? अवगतमिदं त्वद्विव- समर्थन—'प्रमाण से बोधित है साध्यव्यतिरेक जिसका, और जो प्रत्यक्षाभास से व्यतिरिक्त भी हो, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह भी युक्त नहीं है, कारण जहाँ शब्द से शब्दाभास का अथवा उपमानाभास का बाध है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'शब्दाभास-उपमानाभास-व्यतिरिक्तत्व' निवेश कर देंगे, तो उक्त दोष नहीं होगा । खण्डन—यहाँ यह भी विचारें कि प्रत्यक्षाभासादि-व्यतिरिक्तत्व क्या वस्तु है ? क्या प्रत्यक्षाभास से कुछ वैधर्म्य है, स्वरूपभेद है या अन्योन्या- भाव है ? इनमें प्रथम वैधर्म्यरूप व्यतिरिक्तत्व नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि कालात्ययापदेश में कोई भेदक धर्म निरुक्त हो नहीं है । द्वितीय (स्वरूपरूप) व्यतिरिक्तत्व भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप परस्पर व्यावृत्त होने से लक्षण का उपयोगी नहीं है । अर्थात् लक्षण लक्ष्यमात्र का उपसंग्राहक होना चाहिए और स्वरूप ऐसा नहीं है । तृतीय (अन्योन्याभावरूप) व्यतिरिक्तत्व भी ठीक नहीं है, कारण वह प्रत्यक्षाभास में भी विद्यमान है, अतः उसका व्यवच्छेद नहीं हो सकता । समर्थन—हम अन्योन्याभावरूप व्यतिरिक्तमात्र विशेषण नहीं देते, किन्तु प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्व विशेषण देते हैं । एवञ्च प्रत्यक्षाभास अपनी आत्मा से भिन्न नहीं, फिर उसमें अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खण्डन—आप क्या कहना चाहते हैं, वह सब तो जान लिया । विचारणीय यही है कि अन्योन्याभाव का लक्षण में निवेश

३७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य अथ ब्रूषे—प्रमाणेण बोधितो यदीयसाध्यस्याभावः, स प्रत्यक्षा- कालात्ययापदिष्ट इति । नैतदपि सुस्थम् ; शब्दोपमानाभाससाधारण्य- तद्व्यतिरिक्त इत्यपि विशेषणीयमिति चेत् । एतदपि विचार्यतां क्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वं प्रत्यक्षाभासादिभ्यो वैधर्म्यं किञ्चित्, उत अथवाऽन्योन्याभावः ? न तावदाद्यः ; तद्भेदकस्य धर्मस्य निर्वक्तुमशक्यत्वात् । नापि स्वरूपस्य परस्परव्यावृत्ततया लक्षणानौपयिकत्वात् । नापि तृतीयः ; त्वस्यान्योन्याभावात्मनः प्रत्यक्षाभासादावपि भावेन तद्व्यवच्छेदानुप- ननु न व्यतिरिक्तत्वमात्रमन्योन्याभावस्वरूपं विशेषणमस्म- किन्नाम ? प्रत्यक्षाभासादिभ्यो व्यतिरिक्तत्वम् । न च प्रत्य- स्वात्मभ्य एव भिन्नाः, तत्कथमुक्तस्य प्रसङ्गस्यावकाशः ? अवगतमि- समर्थन—'प्रमाण से बोधित है साध्यव्यतिरेक जिसका, और जो प्र- व्यतिरिक्त भी हो, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे। खंड- युक्त नहीं है, कारण जहाँ शब्द से शब्दाभास का अथवा उपम- बाध है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'शब्दाभास-उपमानाभास-व्यतिरिक्तत्व' निवेश कर देंगे दोष नहीं होगा । खण्डन—यहाँ यह भी विचारें कि प्रत्यक्षाभासादि क्या वस्तु है ? क्या प्रत्यक्षाभास से कुछ वैधर्म्य है, स्वरूपभेद है य- भाव है ? इनमें प्रथम वैधर्म्यरूप व्यतिरिक्तत्व नहीं कह सकते; कारण कालात्ययापदेश में कोई भेदक धर्म निरुक्त हो नहीं है । द्वितीय व्यतिरिक्तत्व भी नहीं कह सकते, कारण स्वरूप परस्पर व्यावृत्त होने उपयोगी नहीं है । अर्थात् लक्षण लक्ष्यमात्र का उपसंग्राहक होना चाहिए ऐसा नहीं है । तृतीय (अन्योन्याभावरूप) व्यतिरिक्तत्व भी ठीक नहीं वह प्रत्यक्षाभास में भी विद्यमान है, अतः उसका व्यवच्छेद नहीं हो सक- समर्थन—हम अन्योन्याभावरूप व्यतिरिक्तत्वमात्र विशेषण नहीं प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्व विशेषण देते हैं । एवञ्च प्रत्यक्षाभास अपनी आ- नहीं, फिर उसमें अतिव्याप्ति कैसे होगी ? खण्डन—आप क्या कहना वह सब तो जान लिया । विचारणीय यही है कि अन्योन्याभाव का लक्ष-

परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३७५ क्षितम् । एतदेव विचार्यते—किं प्रत्यक्षाभासादिभिर्विशेषितोऽसौ अन्योन्या- भावस्त्वयोच्यते, उत तैरुपलक्षितः, यं प्रत्यक्षाभासादिष्वप्रसक्तं मन्यसे ? आद्यस्तावन्न सम्भवति; न हि प्रतियोगिरूपविशेषणरहितोऽभावः क्वचिदप्यस्ति । ततस्तादृशस्य विवक्षितत्वे सर्वाव्याप्तिः । द्वितीये तु प्रत्यक्षाभासा- दिभिरुपलक्षणैर्यदुपलक्ष्यमन्योन्याभावस्य स्वरूपमेकं तत्प्रत्यक्षाभासादिषु बाधितानुमानेषु च साधारणमिति कथं नोक्तदोषप्रसङ्गः । अन्यदस्तु सदात्मकं विशेषणम् प्रतियोगी त्वभावस्यासन्नेव तज्ज्ञानस्य विशेष्ये व्यावृतबुद्ध्याधानाविरोधात् विशेषणं भवतीति चेत् ! अयुक्तमेतत्; विशिष्टं तावदभावस्य स्वरूपमिहोपात्तम् । तच्च विशेष्यमात्रशरीरं न भवितुमर्हति; तथा सति विशेष्यस्वरूपमेवोच्यताम्, वृथा विशेषणपदोपन्यासः ? तदनुपन्यासे चान्योन्याभाववत्त्वमात्रमुपन्यस्तं भवेत् । तच्च प्रत्यक्षाभासादेर्व्यव- च्छेद्यस्यापि सङ्ग्राहकम् । ततश्च विशेष्यादन्योन्याभावादधिकं किञ्चिद्वक्तव्यं तद्विशिष्टमुपन्यस्यताम् । स च यदि प्रतियोगी तदीयोऽभिधीयते, तर्हि तस्याभावा- त्तदानीं विशिष्टाभावः प्रसक्तः । विशेष्यमात्रं परिशिष्टम्, तच्च केवलमतिप्रसक्तम् । प्रत्यक्षाभास से विशेषित है या उपलक्षित, जिसे प्रत्यक्षाभास में अप्रसक्त आप मानते हैं । प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारणप्रतियोगी से विशिष्ट अभाव कहीं नहीं रहता । अतः लक्षण में वैसा निवेश करने पर असम्भव हो जायगा । द्वितीय पक्ष में प्रत्यक्षाभास- रूप उपलक्षण से उपलक्ष्य जो अन्योन्याभाव का एक स्वरूप है, वह प्रत्यक्षाभास और बाधित अनुमान उभय-साधारण है। अतः प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति क्यों न हो ? समर्थन—गुण, क्रिया आदि तो विद्यमान ही विशेषण होते हैं, किन्तु प्रतियोगी अविद्यमान ही अभाव का विशेषण होता है । कारण विशेषण का ज्ञान विशेष्य में इतरव्यावृत्तत्व-बुद्धि कर सकता है, इसमें कोई विरोध नहीं है । खंडन—यह कथन अयुक्त है, कारण यहाँ विशिष्ट अभाव का स्वरूप कहा गया है। वह विशेष्यमात्र-शरीर नहीं हो सकता । कारण यदि विशेष्यमात्र ही उसका शरीर हो तो उतना ही कहें, 'विशेषण' पद का उपन्यास व्यर्थ है । यदि विशेषण का उपन्यास न कर विशेष्यमात्र का उपन्यास करें, तो अन्योन्याभावमात्र का उपन्यास हुआ, वह व्यवच्छेद्य प्रत्यक्षाभास का भी संग्राहक हो जायगा । अतः विशेष्य अन्योन्याभाव से अधिक कुछ कहना चाहिए। तब यद्विशिष्ट अभाव का उपन्यास करेंगे, वह यदि प्रतियोगी है, तो उस लक्ष्य में प्रतियोगी का अभाव होने से विशिष्ट

३७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तस्माद्विशिष्टव्यवहारप्रवर्तनकाले विशेष्यातिरिक्तं किञ्चिदनभ्युपेत्य विशिष्ट- सत्ता व्यवहर्तुमशक्या । अतः प्रतियोगी नाभावस्य विशेषणं भवितुमर्हति । उपलक्षणं तु स्यात्, तत्र चोक्तमेव । न चान्योन्याभाव एको न भवति, भिन्नप्रतियोगिकौ द्वावभावौ तौ । तथाच प्रतियोगिलक्षितं तत्स्वरूपमन्यदेवेति सिद्धान्ताविरोधि । न च युक्तम्; उभयं ह्यन्योन्याभावस्यैकात्मतया प्रतियोगि, एकात्मतायाश्च भेदविरोध एव । ततश्च येन च रूपेण प्रतियोगित्वं तेन रूपेण भेदानवकाशात्, भिन्नप्रतियोगिकता कुतोऽन्योन्याभावस्य । येन च रूपेण भिन्नता तेनान्योन्याभावं प्रति प्रतियोगिता नास्ति वस्तुनोः । ननु वस्तुतस्तयोरेकत्वाभावात् कथमेकतया प्रतियोगित्वमन्योन्याभावं प्रति घटेत वस्तुनोः ? यथा वस्तुतो भूतलासंसर्गाभावेऽपि घटस्य भूतलसंसृष्टतया संसर्गा- भावं प्रति, तत्र यथाऽन्यद् भूतलसंसृष्टया दृष्टं तथाऽत्रापि तावेव सप्रकारभेदौ तदा- त्मानौ दृष्टौ । सोऽयं त्वद्दर्शनाभिप्रायो नास्माकं निर्वाहार्ह इत्यास्तां विस्तरः । (प्रत्यक्षाभासान्योन्याभाव) का भी अभाव है; अतः असम्भव हो जायगा । यदि विशेष्य- मात्र कहें, तो उसकी प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति हो जायगी । तस्मात् विशिष्ट-व्यवहार के प्रवर्तनकाल में विशेष्य से अन्य कुछ न मानकर विशिष्टसत्ता का व्यवहार असम्भव है । अतः व्यवहारकाल में प्रतियोगी का अभाव अवश्य स्वीकार करना होगा । एवञ्च प्रतियोगी उक्त प्रकार से विशेषण तो हो नहीं सकता, किन्तु उपलक्षण हो सकता है और उपलक्षण पक्ष में दोष दे ही आये हैं । समर्थन—अन्योन्याभाव एक नहीं है, किन्तु कालात्ययापदिष्ट में प्रत्यक्षाभासान्य है और प्रत्यक्षाभास में कालात्ययापदिष्टान्य है । अतः प्रत्यक्षाभासप्रतियोगिक अन्योन्याभाव प्रत्यक्षाभास में न होने से प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—यह कथन सिद्धान्त का अविरोधी नहीं है और न युक्त ही है, कारण अन्योन्याभाव के (तादात्म्य के) दोनों प्रतियोगी हैं और तादात्म्य का भेद विरोध है । अतः जिस रूप (तादात्म्य) से प्रतियोगी है, उस रूप से भेद नहीं है । अतः अन्योन्याभाव के अन्यान्य प्रतियोगी कैसे होंगे ? जिन घटत्व-पटत्वादि रूपों से भेद है, उन्हीं रूपों से वस्तु अन्योन्याभाव के प्रतियोगी ही नहीं हैं । समर्थन—उन घट-पटादि वस्तुओं में वास्तविक तादात्म्य है ही नहीं, फिर तादात्म्य से अन्योन्याभाव का प्रतियोगी कैसे होगा ? खण्डन—जैसे वस्तुतः घट भूतल-संसृष्ट नहीं है, तथापि संसर्गाभाव का भूतलसंसृष्टत्वरूप से घट प्रतियोगी होता है, वैसे ही

परिच्छेदः बाध-लक्षण का खण्डन ३७७ अपि च--घटपटयोः स्वरूपभेदेन वैधर्म्यभेदेन चोभयकोटीकृतयोरन्योन्या- भावनिरूपणं भवति । अत्र तु प्रत्यक्षाभासादेः प्रत्यक्षाभासत्वादिना एककोटिताऽस्तु नाम । यत्तु प्रत्यक्षाभासत्वादिभ्यो व्यतिरिक्ततया प्रतिपत्तव्यं तस्य केन रूपेणैककोटीकरणम् ? न तावत्प्रतिव्यक्तिभिन्नेन स्वरूपेण, तेषामनन्ततया बुद्धिस्थीकर्तुमशक्यत्वात् । नापि यद्रूपोपात्तं विशेष्यं प्रत्यक्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वेन विशेषणेन विशेषणीयम्, तद्रूपक्रोडीकृततयैव अन्योन्याभावनिरूपणमिति युक्तम्; तस्य स्वरूपस्य प्रत्यक्षाभासादिसङ्ग्राहकतया कोटिद्वैतभङ्गापादकत्वेन अन्योन्य- भावनिरूपणविरोधित्वात् ।

वस्तुतः तादात्म्य न होने पर भी तादात्म्यरूप से घट-पट प्रतियोगी हों, तो उसमें हानि क्या है ? यदि कहें कि 'अन्य घट का अर्थ और कालान्तर में उसी घट का भूतल में संसर्ग प्रसिद्ध है, किन्तु घट-पट का तादात्म्य तो अप्रसिद्ध ही है, अतः वह प्रति- योगी कैसे होगा ?' तो घट-पट का तादात्म्य भी प्रमेयत्व, द्रव्यत्व, सत्त्वरूप प्रकारों से सहित में आप मानते ही हैं। कारण प्रमेयत्वादि रूप से घट-पट का भेद अनुभवविरुद्ध है, यह आपके दर्शन का अभिप्राय है। हमें उसका निर्वाह करना नहीं है, अतः विस्तार व्यर्थ है । अर्थात् इस तरह अन्योन्याभाव का तादात्म्यप्रतियोगित्व आपके दर्शन में मान्य है। यदि उसे छोड़ देते हैं, तो अपसिद्धान्त होता है। यदि मानते हैं, तो असत्प्रतियोगित्व होगा, अतः वह आपके लिए ही निर्वाह्य है, हमारे ( अनिर्वचनीयवादी के ) लिए नहीं, यह भाव है ।

किञ्च - घट-पट स्वरूपभेद या वैधर्म्यभेद से उभयकोटिक हैं, अतः उन दोनों ( प्रतियोगी-अनुयोगियों ) से अन्योन्याभाव का निरूपण कथञ्चित् हो सकता है। किन्तु यहाँ प्रत्यक्षाभासत्व से प्रत्यक्षाभास का एककोटीकरण (अनुयोगिताग्रह) तो है, किन्तु जिसे प्रत्यक्षाभास व्यतिरिक्तत्वरूप से जानना है, उसकी किस रूप से कोटि करेंगे ? प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न जो स्वरूप उससे एककोटीकरण नहीं हो सकता, कारण अनन्त होने से वे बुद्धिस्थ ही नहीं हो सकते । प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्वरूप से विशेषणीय जो विशेष्य ( उपलक्षण ) है, तद्रूप-क्रोडीकृततया ( तद्रूपावच्छिन्न अनुयोगिता-ग्रह से ) अन्योन्याभाव का निरूपण नहीं हो सकता, कारण वह रूप प्रत्यक्षाभास में भी है। अतः उस रूप से दो कोटियाँ न रहने के कारण उस रूप से अन्योन्याभाव का निरूपण कैसे होगा ? ४८

३७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य तस्मात् स्वरूपभेदं वैधर्म्यभेदं वा कोटिद्वयं व्यवस्थापकमप्रतिसन्धाय अन्योन्याभावनिरूपणमशक्यमिति स्थिते स्वरूपभेदपक्षस्येह दूषितत्वाद्धर्मभेदः कश्चिद्वक्तव्यः। न चासौ वक्तुं शक्यः, शक्यत्वे वा तमादायैव लक्षणव्यवस्थिति- रस्तु, कृतमन्योऽन्यव्यतिरिक्तत्वकुयुक्त्या। तदनेन न्यायेन अन्यत्राप्यतिप्रसक्त्युदाहरणान्यत्वेन व्यावर्तनं लक्षणा- वादिनो भग्नस्य शरणमस्त्रं निरसनीयम्। अत एव भेदकान्तरं विना तद्व्यतिरिक्त- त्वमेव दुर्निरूपमित्यभिप्रायेण तत्तदन्यत्वे सतीति विशेष्यमाणं वैशेषिकहेतुं ‘नैतदेवं येन येन व्यभिचारस्तदन्यत्वे सति प्रमेयत्वादि’ति सत्प्रतिपक्षहेतूपन्यासा- दुपहसन्ति सन्त इति। इति कवितार्किकचक्रवर्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये प्रमाण-तदाभासखण्डनं नाम प्रथमः परिच्छेदः। तस्मात् कोटिद्वय के व्यवस्थापक स्वरूप-भेद या वैधर्म्य-भेद का स्मरण न करके अन्योन्याभाव का निरूपण अशक्य है। ऐसा होने पर स्वरूपभेद से लक्षण की व्यवस्था अनन्त या अननुगत होने से अशक्य है, अतः किसी अन्य धर्म को कहना होगा और उसे कह नहीं सकते। यदि किसी धर्म को कह सकें, तो उसीसे लक्षण व्यवस्थित हो जाने से अन्योन्य-व्यतिरिक्तत्वरूप कुसृष्टि व्यर्थ है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जिसमें अतिव्याप्ति दी जाय, तदन्यत्व विशेषण देकर उसका व्यावर्तक भग्न (परास्त) लक्षणवादी का रक्षक वह अस्त्र निरसनीय है। जबतक भेदक धर्म ज्ञात न हो, तबतक तदन्यत्व का निरूपण हो ही नहीं सकता। अतः तदन्यत्व से विशेषित वैशेषिक (लक्ष्य में इतरभेद के साधक) लक्षणरूप हेतु का लक्ष्य इतर से भिन्न नहीं है, ‘जिस-जिस में व्यभिचार हो, तदन्य होकर प्रमेयत्व होने से’ इस सत्प्रतिपक्ष का उपन्यास करने पर सन्त लोग उपहास करते हैं। प्रथम परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त।

अथ द्वितीयः परिच्छेदः प्रतिज्ञाहानि-लक्षण-खण्डनम् ननु यदि दुर्लक्ष्या हेत्वाभासास्तर्हि निग्रहस्थानानि प्रतिज्ञाहान्यादीनि बाधकानि भविष्यन्ति । मैवम्; का पुनः प्रतिज्ञाहानिः ? स्वीकृतोक्तपरित्यागः प्रतिज्ञाहानिरित्यलक्षणम् । तथाहि—झटिति संवरणे- ऽनिग्रहस्थानेऽपि गतत्वेन परदूषिते सतीत्यपि विशेषणीयत्वात् । किञ्च—स्वीकृतेत्यनेनाभीष्टमात्रं वाऽभिधीयते अस्तित्वेनेष्टं वा ? आद्ये केनचिद्रूपेणेष्टस्य रूपान्तरेण त्यागः क्व नाम नास्तीत्यतिव्याप्तिः । प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन शिवमनोहरपादरजोजुष शिवमनोहरशर्मजनिप्रद । शिवमनोहरपादसरोरुह शिवमनोहरपूतरजोजुषे ॥ समर्थन—यदि हेत्वाभास के लक्षण करने में मेरी अशक्ति है, तो क्या हानि है, प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थान ही अद्वैतसिद्धि या विजय के बाधक होंगे । खण्डन— प्रतिज्ञाहानि भी क्या वस्तु है । अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । फिर उससे अद्वैतसिद्धि का प्रतिबन्ध कैसे होगा ? निर्वचन—'स्वीकृत उक्त का परित्याग' प्रतिज्ञाहानि है । खण्डन—यह लक्षण युक्त नहीं है । देखिये—जहाँ नैयायिक 'अनित्यः शब्दः' इस प्रतिज्ञा के स्थान पर प्रमाद से 'नित्यः शब्दः' ऐसी प्रतिज्ञा कर बैठे, किन्तु शीघ्र ही स्मरण होने पर 'अनित्यः शब्दः' ऐसी पुनः प्रतिज्ञा करे, वहाँ लक्षण की अतिव्याप्ति न हो, इस भय से 'परदूषित' विशेषण भी देना पड़ेगा । फिर तो 'हेत्वन्तर' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । किञ्च—'स्वीकृत' शब्द से इष्टमात्र अभिप्रेत है या अस्तित्व से इष्ट ? प्रथम पक्ष में गुणत्वरूप से इष्ट शब्द का नित्यत्वरूप से त्याग होने पर उस त्याग में अति- व्याप्ति हो जायगी ।

३८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय स्वीकारपूर्वकोऽस्वीकारस्त्यागः । न च रूपान्तरेण तत्र तत्स्वीकारः । ततस्त्याग एवासौ न भवतीति नातिप्रसङ्ग इति चेन्न । स्वीकारस्यापि परित्यागपदार्थान्तर्भावे स्वीकृतेति व्यर्थम्, तत्यागेऽपि च नाद्यद्वितीयौ, अस्तित्वेनेष्टस्य रूपान्तरेण सर्वत्रैवानिष्टत्वसम्भवात् । संयोगाद्यव्याप्यवृत्तितावादिपक्षे चैकस्यैव संयोगस्यास्तित्वनास्तित्वाभ्या- मभ्युपगम्यमानत्वात् । एवञ्च कालदेशादिभेदेन सत्त्वासत्त्वाभ्युपगमेऽपि प्रसङ्गो द्रष्टव्यः । तस्यैव तदैव तत्रैव तेनैव तथैवेष्टत्वानिष्टत्वे विवक्षिते अत्रेति चेत्; एवं तर्हि कालमभ्युपगम्यानभ्युपगच्छतः प्रतिज्ञाहानिर्न स्यात् । तत्र तदेत्युक्तविशेषां- शस्यासंभवात् । नहि कालः कालान्तरं स्वात्मानमेव वाऽध्यास्ते । काले तदेति यदि कहें कि "स्वीकारपूर्वक अस्वीकार त्याग है', नित्यत्वरूप से शब्द का 'स्वीकार' नहीं है, अतः उस रूप से अस्वीकार त्याग ही नहीं है, एवञ्च अतिव्याप्ति नहीं है", तो स्वीकार त्यागपद के अर्थ में अन्तर्भूत होने से 'स्वीकृत' विशेषण व्यर्थ हो जायगा । स्वीकृत विशेषण न भी दें, तब भी दोनों पक्ष युक्त नहीं, कारण 'अस्तित्व' रूप से इष्ट का अन्य रूप (नित्यत्व आदि) से त्याग सर्वत्र शब्दादि स्थल में है, अतः अतिव्याप्ति हो जायगी । जो लोग संयोग आदि को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में वृक्ष में अस्तित्व से इष्ट संयोग नास्तित्व रूप से भी इष्ट है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। इसी प्रकार देश और कालभेद से मीमांसक के अनुयायी बनकर जो शब्द का नित्यत्व मान चुके हैं, वे ही यदि इस देश-काल में नैयायिक बनकर शब्दानित्यत्व का त्याग करें, तो उसमें भी अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस देश-काल में जिस पुरुष ने जिस रूप से जिस पदार्थ का अस्वीकार किया हो, उस देश-काल में उस पुरुष का उस रूप से उस पदार्थ का अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि है' ऐसा लक्षण करेंगे । अतः देश-काल, पुरुष या प्रकार-भेद से स्वीकृत के अस्वीकार में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कालोऽस्ति' ऐसा मानकर 'कालो नास्ति' ऐसा कहने पर भी प्रतिज्ञाहानि नहीं होगी । अर्थात् वहाँ प्रतिज्ञाहानि के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी; कारण काल अन्य काल में या अपने में नहीं रहता, अतः वहाँ 'तदा' यह विशेषण नहीं है । यदि कहें कि कालस्थल के लक्षण में 'तदा' यह विशेषण नहीं देंगे और अन्य

परिच्छेद ] प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन ३८१ विशेषणस्य प्रतिषेपेऽन्यत्र च प्रक्षेपे लक्षणैकताक्षतिः । कालं प्रति च प्रतिज्ञाहानि- रदोषत्वे तद्वदन्यत्राप्यदोषत्वापातः । यदैव स्वीकारस्तदैवास्वीकारासिद्धेश्च । तदेति तत्कथाकालो विवक्षित इति चेन्न । तच्छब्दस्यैकव्यक्तिपरत्वे लक्षणा- ननुगमः, वादादित्वेन साम्ये कदाचिदपि तद्विपरीतवादान्तराकरणप्रसङ्गः, एवं तथैव तस्यैवेत्यादिपदस्य द्रष्टव्यम् । उक्तेति पदस्य चापसिद्धान्तव्यवच्छेदकस्य विरुद्धन्यायेनासमर्थविशेषणत्वम् । एवं सर्वनिग्रहस्थानेषु द्रष्टव्यमिति सङ्क्षेपः । स्थलों के लक्षणों में 'तदा' विशेषण देंगे, एवञ्च कालस्थल में अव्याप्ति नहीं है, तो एक लक्षण न रहा, किन्तु लक्षण-भेद हुआ । यदि कहें कि कालस्थल में प्रतिज्ञाहानि दोष नहीं है, तो इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । यदि प्रमाण के बिना भी कालस्थल में प्रतिज्ञाहानि को दोष न मानें, तो अन्यत्र भी प्रतिज्ञाहानि दोष न होगा । किञ्च—जिस काल में स्वीकार हो, उसी काल में अस्वीकार हो भी नहीं सकता । समर्थन—'यदा-तदा' पद एकक्षणपरक नहीं, किन्तु तत्कथा-कालपरक हैं । एवञ्च एक कथा से उपलक्षित काल में क्षणभेद से स्वीकार-अस्वीकार हो सकता है, अतः असम्भव दोष नहीं है । खंडन—तत् शब्द एककथाव्यक्तिपरक है अथवा कथात्वपरक है, वादत्वादिरूप से कथामात्रपरक है या वादमात्रपरक ? प्रथम पक्ष में जिस कथा व्यक्ति का तत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । यदि तत्-शब्द को कथामात्रपरक मानें, तो मीमांसक होकर कदाचित् किसी वाद में शब्द- नित्यत्व स्वीकारकर, नैयायिक बनकर अन्य कथा में भी शब्द-नित्यत्व का अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि हो जायगी । इसी प्रकार 'तथा' शब्द को यदि एक प्रकारव्यक्तिपरक मानें, तो अन्य प्रकार से स्वीकार-अस्वीकार स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । यदि प्रकारमात्रपरक कहें, तो अस्तित्व से स्वीकृत का नित्यत्व से अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि हो जायगी । इसी प्रकार 'तस्य, तेन' इत्यादि पदों में भी दोष जानने चाहिए । किञ्च—'स्वीकृत उक्त का परित्याग प्रतिज्ञाहानि है' इस लक्षण में अपसिद्धान्त का व्यवच्छेदक 'उक्त' पद, विरुद्ध के लक्षण में सव्यभिचार के व्यवच्छेदक नियम के तुल्य व्यर्थ है; कारण स्वीकृत का परित्यागमात्र दूषण में पर्याप्त है । संक्षेप में इसी प्रकार अन्य निग्रहस्थानों के लक्षणों में भी विशेषण का वैयर्थ्य जानना चाहिए ।

३८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय प्रतिज्ञान्तर-लक्षण-खण्डनम् प्रतिज्ञाहान्यादीत्यादिपदेन च किं सङ्गृह्यते ? प्रतिज्ञान्तरादीति चेन्न । प्रतिज्ञान्तरमेव न निरूपयितुं शक्यते । तद्यथा—स्वोक्तस्य परदूषितस्य साध्यभागस्य पूर्वानुक्तविशेषणवतोऽभिधानं प्रतिज्ञान्तरमित्यल्लक्षणम् । तथा हि, यत्र वादिना प्रथमं सविशेषणः प्रतिज्ञाभागो- ऽभिहितः, परेण च निर्विशेषणोक्तभ्रमाद् दूषितः । ततो वादी प्रथमाभिहितं सविशेषणमेवोपन्यस्य 'ईदृशं मयोक्तम्, न तु निर्विशेषणमतो निरनुयोज्यानुयोगो भवतः' इति सदुत्तरमेव ब्रूते, तत्रापि गतत्वादतिव्यापकमेतत् । पूर्वानुक्तविशेषणवत्त्वं तत्र नास्ति, तत्कथमतिव्याप्तिरिति चेन्न । प्रथमोक्तेः प्रागभावस्य पूर्वं स्थितत्वात् । विशेष्योक्तिरपि तदा नाऽऽसीदिति चेत् ; किमायातं तावता विशेषणानुक्त्यतिप्रसङ्गस्य । प्रतिज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन प्रस्तुत परिच्छेद के आरम्भ में 'प्रतिज्ञाहान्यादि' यहाँ आदि पर से किसका ग्रहण करेंगे ? यदि कहें कि प्रतिज्ञान्तर आदि का ग्रहण करेंगे, तो वह ठीक नहीं । कारण प्रतिज्ञान्तर का निरूपण ही नहीं हो सकता । समर्थन—'स्व से उक्त और पर से दूषित साध्यभाग का पूर्वानुक्त विशेषण- युक्तत्व रूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है।' खण्डन—यह लक्षण युक्त नहीं, कारण जहाँ वादी ने सविशेषण ही साध्यभाग कहा, किन्तु प्रतिवादी विशेषणरहितत्व भ्रम- से उसे दूषित करता है। इसके बाद वादी पूर्वकथित सविशेषण प्रतिज्ञाभाग का उल्लेख कर यह कहे कि 'हमने ऐसा कहा है, निर्विशेषण नहीं कहा, अतः आपका दोष अयुक्त है', तो यह सत्-उत्तर ही है। किन्तु यहाँ आपके इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—यहाँ हमने प्रथम विशेषण देकर ही कहा है, अतः वह पूर्वानुक्त विशेषण नहीं है । एवञ्च लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—प्रथम विशेषण की उक्ति से पूर्व- काल में विशेषणोक्ति का अभाव है ही, अर्थात् पूर्वानुक्त इत्यादि शब्द का पूर्वकाल में विद्यमान जो प्रागभाव, तत्प्रतियोगी जो उक्ति, तद्विषय जो विशेषण, तादृश विशेषण- वत्त्वरूप से अर्थ है। उक्त स्थल में प्रथमोक्ति से पूर्व विद्यमान प्रागभाव का प्रतियोगी जो उक्ति, तद्विषयविशेषणवत्त्वरूप से अभिधान है, अतः अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—उस काल में विशेष्य की उक्ति भी नहीं है। खण्डन —इस कथन से

विशेष्योक्तिकाले विशेषणानुक्तिर्विवक्षितेति चेन्न । एककर्तृकाया वाचो गपदसम्भवेन सर्वत्र तथाभावस्यैव भावात् । विशेष्योक्तेरनन्तरकाल इति चेन्न । नीलोत्पलमित्यादौ पूर्वनिपातिविशेषणे ऽदभावात् । विशेष्योक्तेरव्यवहितपूर्वकाल इति चेन्न । 'उत्पलं नीलमित्यादौ ऽदभावात् । अव्यवहित इति चेन्न । बहुविशेषणके विशेष्ये तदभावात् । विशेषणाभिधानोचितकाल इति चेन्न । नानाविशेषणके विशेष्ये क्रमवृत्ति- वाद्वाचः क्रमेणाभिधीयमाने य एकविशेषणाभिधानकालः सोऽपरेषामपि विशे- वेशेषगुणानुक्ति का जो अतिप्रसङ्ग है, उसमें क्या लाभ हुआ । अर्थात् वह अतिसङ्ग ज्यों-का-त्यों बना ही रहा । समर्थन—‘विशेष्योक्ति के काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा कहेंगे। अनुदित विशेषण की तो तदानीं अनुक्ति नहीं है, अतः अतिप्रसंग नहीं है । खण्डन—एक पुरुष द्वारा उच्चरित वचन में एक काल में विशेष्य और विशेषण दोनों की उक्ति नहीं हो सकती, कारण वह क्रमभावी है । अतः सविशेषण वाक्य में सर्वत्र विशेष्योक्ति-काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से अभिधान हो जाने से अतिव्याप्ति हो ही जायगी । समर्थन—‘विशेष्योक्ति के उत्तर काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्व रूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा निवेश करने पर जहाँ विशेष्योक्ति से पूर्वकाल में विशेषणोक्ति है, वहाँ अर्थात् ‘नीलमुत्पलम्’ इस स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘विशेष्योक्ति से अव्यवहित पूर्वकाल में अनुक्त जो विशेषण’ इत्यादि निवेश करें, तो ‘उत्पलंन्नीलम्’ यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘विशेष्योक्ति से अव्यवहित काल में अनुक्त जो विशेषण’ इत्यादि निवेश करें, तो बहु- विशेषणवाले ‘सुरभि नीलम् उत्पलं विकासिमनोहरम्’ वाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘विशेषण के अभिधान के लिए उचित जो काल, उसमें अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से स्वोक्त परदूषित साध्यभाग का अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च ‘सुरभि नीलमुत्पलम्’ इत्यादि पूर्वोक्त वाक्यों में अतिव्याप्ति नहीं है, कारण उक्त वाक्यों में विशेषणोक्ति-काल में सभी विशेषण उक्त ही हैं, अनुक्त नहीं । खंडन—नाना विशेषणवाले विशेष्य में वचन क्रमवृत्तिक होने से जहाँ क्रमशः विशेषण का अभिधान है, वहाँ एक विशेषण का जो अभिधान-काल है, वही

३८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय

षणामिधानानां योग्यो भवत्येवेति तदान्येषां क्रमभाविनामभावात्सैवातिव्याप्तिः । सर्वस्मिन् योग्यकाल इति चेन्न । दूषणानन्तरकालस्य योग्यकालत्वाभ्युप- गमेऽव्याप्तिः । दूषणपूर्वकालस्य तथाऽभिमतत्वे च दूषणानन्तरभाविन्या विशेषणोक्ति- व्यक्तेस्तदानीमभावात् पूर्ववदतिव्याप्तिः । सर्वस्यास्तज्जातीयाया विशेषणस्योक्तेरभावो विवक्षित इति चेन्न । व्यक्तीनामभावप्रतियोगिभूतानां सर्वासां पृथक् पृथक् प्रमाणेन केनापि अस्मदादृशा प्रत्येतुमशक्यतयाऽभावानिरूपणेन लक्षणस्याज्ञानादसिद्धिप्रसङ्गात् । सामान्य- प्रत्यासत्त्या व्यक्तयः प्रतिभान्तीति निरस्तमनुमानावसरे । अन्य विशेषण के अभिधान के भी योग्य है ही और एक विशेषण के अभिधान में अन्य विशेषण की अनुक्ति भी है। अतः पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है। समर्थन—'सम्पूर्ण योग्य काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से स्वोक्त परदूषित साध्यभाग का अभिधान प्रतिज्ञान्तर है' ऐसा लक्षण करेंगे। उक्त वाक्य में सम्पूर्ण योग्यकाल में अनुक्त विशेषण नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं। खंडन—जहाँ दूषणदान से उत्तर काल में विशेषण का अभिधान है, वहाँ लक्ष्य में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वहाँ भी योग्यकाल में विशेषण उक्त ही है, अनुक्त नहीं। समर्थन—'दूषणदान से पूर्वकाल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्व रूप से स्वोक्त परदूषित साध्यभाग का अभिधान प्रतिज्ञान्तर है' ऐसा कहेंगे। खंडन—प्रत्यु- च्चारण शब्द भिन्न-भिन्न होने से दूषण के उत्तर काल में उक्त विशेषण-व्यक्ति भी पूर्वकाल में अनुक्त होने से पूर्वोक्त स्थल में (जहाँ सविशेषण ही निर्विशेषण-भ्रम से वादी द्वारा दूषित होने पर पूर्वोक्त विशेषणवत्त्व रूप से कहा गया हो, वहाँ) अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—'दूषण से पूर्व उक्त जो विशेषण, तत्सजातीय जो यावत् विशेषण, उन सबसे भिन्न जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से स्वोक्त परदूषित साध्यभाग का अभिधान प्रतिज्ञान्तर है' ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—उक्त लक्षण में अभाव के प्रतियोगी सम्पूर्ण विशेषण-व्यक्तियों का हम लोगों को किसी भी प्रमाण से ज्ञान न होने से अभाव दुर्ज्ञेय हो जाने के कारण लक्षण ही असिद्ध हो जायगा। सामान्यलक्षणा से सभी प्रतियोगी व्यक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता, कारण सामान्यलक्षणा का खण्डन हम अनुमान- खण्डन के अवसर पर कर ही चुके हैं।

परिच्छेद ] प्रतिज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन ३८५ एतेन पूर्वमविशिष्टोक्तस्येति विशेषणं प्रक्षिप्तव्यमिति निरस्तम् । उत्तरकाल- वाक्यविशेषणकविशेष्यस्य प्रथममविशिष्टोक्तत्वसम्भवस्य दर्शितत्वात् । किञ्च—प्रथममविशिष्टमुक्त्वा भवता यदि विशेषणमिदं प्रक्षिप्यते, तदा हेत्वन्तरं भवतोऽपि स्यात्तथापि तदभावे वा ममापि कुतः प्रतिज्ञान्तरम् । अथ प्रथममेवेदं विशेषणमुपादाय ब्रवीषि; तथाप्यव्याप्तिः । प्रथमं सविशेषण- मुक्त्वा विशेषणवैय्यर्थ्यभ्रमेण झटिति संरम्भान्निर्विशेषणेऽभिहिते परेण च दूषिते पुनः सविशेषणमभिदधतः सैवं प्रतिज्ञान्तरं स्यादित्यव्याप्तिः, स्वपरसाध्यपूर्वपदानां विवेचने व्यक्तौ पतनादव्याप्तिश्च । प्रकरणादिलभ्यतया प्रागनुक्तस्य विशेषणस्य भ्रान्तपरदूषितस्य प्रकरणलभ्यविशेषणवत्तयाऽनुवदतोऽपि सद्वादे प्रसङ्गः । समर्थन—'पूर्वकाल में अविशिष्टत्व रूप से उक्त परदूषित साध्यभाग का विशेषण- वत्त्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'किससे पूर्वकाल में अविशिष्टत्व रूप से उक्त हो' यह विशेषरूप से नहीं कहा है । अतः यदि विशेष्योक्ति से पूर्वकाल का ग्रहण करें, तो जहाँ विशेष्य से उत्तर काल में विशेषण की उक्ति है, वहाँ विशेष्योक्ति से पूर्व अविशिष्टत्वरूप से अनुक्ति होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—प्रथम तो आपने 'पूर्वम् अविशिष्टतया उक्तस्य' यह विशेषण दिया नहीं, अब दे रहे हैं; अतः आपका 'हेत्वन्तर' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । फिर भी यदि हेत्वन्तर न हो, तो हमें भी प्रतिज्ञान्तर कैसे होगा ? यदि प्रथम से ही यह विशेषण देकर आप कहें, तब भी अव्याप्ति है । देखिये—जहाँ प्रथम से सविशेषण ही कहकर विशेषण के वैय्यर्थ्य के भ्रम से झटिति विशेषण का त्यागकर निर्विशेषण का ही अभिधान किया हो और फिर प्रतिवादी के दोष देने पर सविशेषण का अभिधान हो, वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि लक्षणघटक स्वपर-साध्य-पद के अर्थ का विवेचन करते हैं, तो वह तत्-तत् व्यक्तिपरक होने से जिस व्यक्ति का स्वशब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—जहाँ प्रकरण से लभ्य होने से प्राक्काल में विशेषण अनुक्त है, परन्तु अज्ञानवश प्रतिवादी से दूषित है और वादी ने प्रकरणलभ्य विशेषण का अनुवादमात्र किया है, वहाँ सद्वाद में अतिव्याप्ति हो जायगी । ४६

अनुक्तस्थाने चाऽप्रतिपादितकरणेऽपि दोषः ; परस्मिन्नजातप्रतिपत्तौ प्रति- पादितत्वानुपपत्तेरित्यादि स्वयमूहनीयम् । प्रतिज्ञाविरोध-लक्षण-खण्डनम् प्रतिज्ञान्तरादीति आदिपदेन किमिष्टम् ? प्रतिज्ञाविरोधादीति चेन्न । यत एकवक्तृकैकवाक्यांशयोर्मिथो व्याघातः साध्यविपरीतव्याप्तस्योद्भावनानपेक्षोद्भावनः प्रतिज्ञाविरोधः । तदेतदलक्षणम् ; तथाहि—‘इह भूतले घटो नास्ती’त्यादावपि गतत्वेनातिव्यापकमिदम् । वचनयोर्हि व्याघातोऽन्योन्यविरुद्धार्थत्वम् । तच्चेहास्ति, घटोऽस्तीत्यंशस्य घटसत्त्वबोधकत्वात् , नकारस्य च तन्निषेधकत्वात् । नन्वयुक्तमिदमुच्यते । न हि ‘घटो नास्ती’त्यत्र घटोऽपि विधीयते यदि ‘पूर्वकाल में अप्रतिपादित विशेषणवत्स्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’, ऐसा लक्षण करें, तो यद्यपि प्रकरणलभ्य विशेषण भी प्रतिपत्ति का विषय होने से प्रति- पादित ही है, अप्रतिपादित नहीं, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है; तथापि पर को जहाँ प्रतिपत्ति नहीं हुई है, वहाँ प्रकरणलभ्य विशेषण के भी अप्रतिपादित होने से अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है, इत्यादि दोष स्वयं ऊहनीय हैं । प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खंडन ‘प्रतिज्ञान्तरादि’ यहाँ ‘आदि’ पद से किसका ग्रहण इष्ट है ? समर्थन—प्रतिज्ञाविरोध का ही ग्रहण करेंगे । खण्डन—यह संभव नहीं, क्योंकि उसका लक्षण ही नहीं कर सकते । यदि ‘साध्य के अभाव के व्याप्तत्व के उद्भावन की अनपेक्षा से जिसका उद्भावन हो, ऐसा एक वक्ता के एक वाक्य के दो अंशों का परस्पर व्याघात प्रतिज्ञा-विरोध है’ ऐसा लक्षण करेंगे, तो वह युक्त नहीं। देखिये— ‘इह भूतले घटो नास्ति’ यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । परस्पर विरुद्ध अर्थ होना ही वचनों का व्याघात है। वह विरोध यहाँ ‘घटः’ इस अंश के घटसत्त्व बोधक होने से और ‘न’ के घट-निषेध-बोधक होने से विद्यमान ही है। समर्थन—‘घटो नास्ति’ इस वाक्य में घट और घट-निषेध दोनों का विधान नहीं है, जिससे व्याघात हो । किन्तु घट-निषेध का ही विधान है, फिर इस वाक्य

३८६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [द्वितीय ] अनुक्तस्थाने चाऽप्रतिपादितकरणेऽपि दोषः ; परस्मिन्नजातप्रतिपत्तौ प्रति- पादितत्वानुपपत्तेरित्यादि स्वयमहनीयम् । प्रतिज्ञाविरोध-लक्षण-खण्डनम् प्रतिज्ञान्तरादीति आदिपदेन किमिष्टम् ? प्रतिज्ञाविरोधादीति चेन्न । यत एकवक्तृकैकवाक्यांशयोर्मिथो व्याघातः साध्यविपरीतव्याप्तत्योद्भावनानपेक्षोद्भावनः प्रतिज्ञाविरोधः । तदेतदलक्षणम् ; तथाहि-- 'इह भूतले घटो नास्ती'त्यादावपि गतत्वेनातिव्यापकमिदम् । वचनयोर्हि व्याघातोऽन्योन्यविरुद्धार्थत्वम् । तच्चेहास्ति, घटोऽस्तीत्यंशस्य घटसत्त्वबोधकत्वात् , नकारस्य च तन्निषेधकत्वात् । नन्वयुक्तमिदमुच्यते । न हि 'घटो नास्ती'त्यत्र घटोऽपि विधीयते यदि 'पूर्वकाल में अप्रतिपादित विशेषणवत्स्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है', ऐसा लक्षण करें, तो यद्यपि प्रकरणलभ्य विशेषण भी प्रतिपत्ति का विषय होने से प्रति- पादित ही है, अप्रतिपादित नहीं, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है; तथापि पर को जहाँ प्रतिपत्ति नहीं हुई है, वहाँ प्रकरणलभ्य विशेषण के भी अप्रतिपादित होने से अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है, इत्यादि दोष स्वयं ऊहनीय हैं । प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खंडन 'प्रतिज्ञान्तरादि' यहाँ 'आदि' पद से किसका ग्रहण इष्ट है ? समर्थन--प्रतिज्ञाविरोध का ही ग्रहण करेंगे । खण्डन--यह संभव नहीं, क्योंकि उसका लक्षण ही नहीं कर सकते । यदि 'साध्य के अभाव के व्याप्तत्व के उद्भावन की अनपेक्षा से जिसका उद्भावन हो, ऐसा एक वक्ता के एक वाक्य के दो अंशों का परस्पर व्याघात प्रतिज्ञा-विरोध है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो वह युक्त नहीं । देखिये-- 'इह भूतले घटो नास्ति' यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । परस्पर विरुद्ध अर्थ होना ही वचनों का व्याघात है । वह विरोध यहाँ 'घटः' इस अंश के घटसत्त्व बोधक होने से और 'न' के घट-निषेध-बोधक होने से विद्यमान ही है । समर्थन--'घटो नास्ति' इस वाक्य में घट और घट-निषेध दोनों का विधान नहीं है, जिससे व्याघात हो । किन्तु घट-निषेध का ही विधान है, फिर इस वाक्य

परिच्छेद ] प्रतिज्ञा-विरोध-लक्षण का खण्डन ३८७ घटनिषेधोऽपि च, येन मिथो व्याघातः स्यात् । किन्तु घटो निषिद्ध्यते, घटनिषेध एव तु विधीयत इति यावत् । तत्कुतो व्याहतिरिति चेत् । मैवम्; घट इत्यस्य तावदंशस्य घटविधिवोधकत्वम्, नास्तीत्यस्यापि तत्प्रतिषेधार्थत्वं भवताऽपि मन्तव्यम् । यदि त्वेवं नाभ्युपैषि, तदा तयोरविरुद्धार्थ- तया घटश्चाऽपेक्षितनिषेधास्तित्वं च भूतलाश्रितं द्वयमस्य वाक्यस्य बोधनीयं स्यादिति । तस्माद्विधिरूप एव घट इति तन्प्रतिक्षेप एव न नेति किमेतौ एक- कर्तृकवाक्यांशौ न भवतः, परस्परविरोधाथर्माभिधायकौ वा न भवतः, येन लक्षणमिदं भवतस्तत्र न गच्छेत् । न मिथो विरुद्धत्वमात्रं मिथो व्याघातकत्वम्, किन्त्वेकदेशकालादौ परस्पर- विरुद्धार्थयोरस्तित्वम् । न च नास्तीत्यनेन एकदेशकालादौ विधिनिषेधौ वर्तमानौ बोध्येते इति चेन्न । उक्तोत्तरत्वान, देशकालाद्यनन्तर्भावे विरोधधर्मस्यानुपपत्तेः । किञ्च—यद्येकदेशादौ विरुद्धास्तित्वं प्रामाणिकमभ्युपैषि, तदा विरुद्धशब्द- में व्याघात कहाँ है ? अतः 'घटो नास्ति' इस वाक्य में व्याघात है, यह कथन युक्त नहीं है । खंडन—'घटः' यह अंश घटविधि का बोधक है और 'नास्ति' यह अंश घट- निषेध का—यह तो आप भी मानेंगे । यदि ऐसा न मानें, तो दोनों के अविरुद्धार्थक होने से घट और घटनिषेध दोनों का भूतल में अस्तित्व वाक्यार्थ हो जायगा । तस्मात् 'घट' विधिरूप है और 'न' का अर्थ उसका निषेध ही है । फिर क्या यह एककर्तृक वाक्य का अंश नहीं हुआ या परस्पर विरुद्ध अर्थ का वाचक नहीं है, जिससे आपके लक्षण की अतिव्याप्ति न हो ? समर्थन—परस्पर विरोधमात्र व्याघात नहीं है, किन्तु एकदेश या एककाल में विरुद्ध दो पदार्थों का अस्तित्व व्याघात है । उक्त वाक्य से एकदेश अथवा एककाल में वर्तमान विधि-निषेध बोधित नहीं होते, अतः उक्त वाक्य में व्याघात नहीं है । खण्डन—घट और घट-निषेध दोनों परस्पर विरुद्ध हैं—यह तो आप भी मानते ही हैं । वह विरोध एकदेश और एककाल के अन्तर्भाव के बिना हो नहीं सकता । अतः अगत्त्या देश-काल का अन्तर्भाव भी मानना ही पड़ेगा । किञ्च--विरुद्ध पदार्थों का एकदेश या एककाल में अस्तित्व प्रामाणिक है या नहीं ? यदि एकदेश में अस्तित्व प्रामाणिक है, तो रूप-रस के तुल्य वे दोनों एक

३८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय स्तवायमन्य एव सामयिकार्थः कश्चित्, प्रमाणेन तथाभूतस्य ग्रहणादेव विरुद्धत्वाभ्युपगमशान्तेः । अथ प्रामाणिकं तन्नाभ्युपैषि, तदाऽप्रामाणिकं मिथो व्याघातकत्वं क्व नाम नास्तीत्यतिव्याप्तिः । अथ मन्यसे—यथा परेणाभिधीयेते अर्थौ तथा मिथो व्याघातकाविति ब्रूमः, तत्र च प्रमाणं प्रसरत्येवेति । न; कथमपि तत्र प्रमाणप्रसृतौ विरोधाभावात्परि- भाषामात्रत्वापत्तेः । यथा परेणोक्तोऽर्थस्तथा मिथो व्याघातक इत्यपि क्वचिन्मिथोव्याघातक- मर्थमप्रमाय न वक्तुं शक्यम् । प्रसज्यते मिथो व्याघातः, न प्रसाध्यत इति चेन्न । क्वचिदप्यप्रमितस्य प्रसञ्जयितुमपि भवताऽशक्यत्वात् । देश में रहने से विरुद्ध ही नहीं हैं । उन्हें विरुद्ध कहना तुम्हारा सङ्केतमात्र है । यदि उन दोनों का एकदेश में अस्तित्व प्रामाणिक नहीं है, तो 'अमुक वाक्य व्याहत है' इस कथन का यह अर्थ हुआ कि यहाँ अप्रामाणिक व्याघात दोष है । फिर इससे हानि क्या हुई, कारण प्रामाणिक दोष ही कार्य का प्रतिबन्धक होता है । ऐसा अप्रामाणिक व्याघात कहां नहीं है ? वह 'घटो नास्ति' इस वाक्य में भी है, अतः पूर्वोक्त अतिव्याप्ति वैसी ही बनी हुई है । समर्थन—वादी ने जिस प्रकार अर्थात् सामानाधिकरण्यरूप से बन्ध्यात्व और मातृत्व रूप दो अर्थों का प्रयोग किया है, उस (सामानाधिकरण्य) रूप से वह व्याघातक है—यह हम कहते हैं । वहाँ वाद्युक्त 'बन्ध्या-माता' इस वाक्य के बाधितार्थक होने से अप्रमाण होने पर भी उक्त वाक्यप्रतिपाद्यत्वरूप से बन्ध्यात्व-मातृत्व-सामानाधिकरण्य प्रमाण- विषय हैं ही, अतः उक्त दोष नहीं है । खंडन—किसी प्रकार अर्थात् वाक्यप्रतिपाद्य- त्वरूप से भी यदि वन्ध्यात्व और मातृत्व का सामानाधिकरण्य प्रमाण का विषय है, तो रूप-रस के तुल्य वे दोनों विरुद्ध ही नहीं हैं, अतः विरोध का कथन परिभाषामात्र है । किञ्च—जबतक परस्पर व्याघातकत्व अन्यत्र प्रमित नहीं होता, तबतक 'जिस प्रकार पर ने कहा, उस प्रकार मिथो व्याघात है' यह साधन नहीं किया जा सकता । समर्थन—पर द्वारा उक्त वन्ध्या में माता इस प्रसञ्जक (आरोपक) वाक्य से परस्पर व्याघात का प्रसञ्जन (आरोप) मात्र होता है, साधन नहीं । खण्डन—जो कहीं प्रमित नहीं है, उसका प्रसञ्जन भी नहीं हो सकता । तर्कस्थल में भी हृद में प्रमित ही धूमाभाव का पर्वत में प्रसञ्जन होता है ।