खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयः परिच्छेदः प्रतिज्ञाहानि-लक्षण-खण्डनम् ननु यदि दुर्लक्ष्या हेत्वाभासास्तर्हि निग्रहस्थानानि प्रतिज्ञाहान्यादीनि बाधकानि भविष्यन्ति । मैवम्; का पुनः प्रतिज्ञाहानिः ? स्वीकृतोक्तपरित्यागः प्रतिज्ञाहानिरित्यलक्षणम् । तथाहि—झटिति संवरणे- ऽनिग्रहस्थानेऽपि गतत्वेन परदूषिते सतीत्यपि विशेषणीयत्वात् । किञ्च—स्वीकृतेत्यनेनाभीष्टमात्रं वाऽभिधीयते अस्तित्वेनेष्टं वा ? आद्ये केनचिद्रूपेणेष्टस्य रूपान्तरेण त्यागः क्व नाम नास्तीत्यतिव्याप्तिः । प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन शिवमनोहरपादरजोजुष शिवमनोहरशर्मजनिप्रद । शिवमनोहरपादसरोरुह शिवमनोहरपूतरजोजुषे ॥ समर्थन—यदि हेत्वाभास के लक्षण करने में मेरी अशक्ति है, तो क्या हानि है, प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थान ही अद्वैतसिद्धि या विजय के बाधक होंगे । खण्डन— प्रतिज्ञाहानि भी क्या वस्तु है । अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । फिर उससे अद्वैतसिद्धि का प्रतिबन्ध कैसे होगा ? निर्वचन—'स्वीकृत उक्त का परित्याग' प्रतिज्ञाहानि है । खण्डन—यह लक्षण युक्त नहीं है । देखिये—जहाँ नैयायिक 'अनित्यः शब्दः' इस प्रतिज्ञा के स्थान पर प्रमाद से 'नित्यः शब्दः' ऐसी प्रतिज्ञा कर बैठे, किन्तु शीघ्र ही स्मरण होने पर 'अनित्यः शब्दः' ऐसी पुनः प्रतिज्ञा करे, वहाँ लक्षण की अतिव्याप्ति न हो, इस भय से 'परदूषित' विशेषण भी देना पड़ेगा । फिर तो 'हेत्वन्तर' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । किञ्च—'स्वीकृत' शब्द से इष्टमात्र अभिप्रेत है या अस्तित्व से इष्ट ? प्रथम पक्ष में गुणत्वरूप से इष्ट शब्द का नित्यत्वरूप से त्याग होने पर उस त्याग में अति- व्याप्ति हो जायगी ।