खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य तस्मात् स्वरूपभेदं वैधर्म्यभेदं वा कोटिद्वयं व्यवस्थापकमप्रतिसन्धाय अन्योन्याभावनिरूपणमशक्यमिति स्थिते स्वरूपभेदपक्षस्येह दूषितत्वाद्धर्मभेदः कश्चिद्वक्तव्यः। न चासौ वक्तुं शक्यः, शक्यत्वे वा तमादायैव लक्षणव्यवस्थिति- रस्तु, कृतमन्योऽन्यव्यतिरिक्तत्वकुयुक्त्या। तदनेन न्यायेन अन्यत्राप्यतिप्रसक्त्युदाहरणान्यत्वेन व्यावर्तनं लक्षणा- वादिनो भग्नस्य शरणमस्त्रं निरसनीयम्। अत एव भेदकान्तरं विना तद्व्यतिरिक्त- त्वमेव दुर्निरूपमित्यभिप्रायेण तत्तदन्यत्वे सतीति विशेष्यमाणं वैशेषिकहेतुं ‘नैतदेवं येन येन व्यभिचारस्तदन्यत्वे सति प्रमेयत्वादि’ति सत्प्रतिपक्षहेतूपन्यासा- दुपहसन्ति सन्त इति। इति कवितार्किकचक्रवर्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये प्रमाण-तदाभासखण्डनं नाम प्रथमः परिच्छेदः। तस्मात् कोटिद्वय के व्यवस्थापक स्वरूप-भेद या वैधर्म्य-भेद का स्मरण न करके अन्योन्याभाव का निरूपण अशक्य है। ऐसा होने पर स्वरूपभेद से लक्षण की व्यवस्था अनन्त या अननुगत होने से अशक्य है, अतः किसी अन्य धर्म को कहना होगा और उसे कह नहीं सकते। यदि किसी धर्म को कह सकें, तो उसीसे लक्षण व्यवस्थित हो जाने से अन्योन्य-व्यतिरिक्तत्वरूप कुसृष्टि व्यर्थ है। इसी प्रकार अन्यत्र भी जिसमें अतिव्याप्ति दी जाय, तदन्यत्व विशेषण देकर उसका व्यावर्तक भग्न (परास्त) लक्षणवादी का रक्षक वह अस्त्र निरसनीय है। जबतक भेदक धर्म ज्ञात न हो, तबतक तदन्यत्व का निरूपण हो ही नहीं सकता। अतः तदन्यत्व से विशेषित वैशेषिक (लक्ष्य में इतरभेद के साधक) लक्षणरूप हेतु का लक्ष्य इतर से भिन्न नहीं है, ‘जिस-जिस में व्यभिचार हो, तदन्य होकर प्रमेयत्व होने से’ इस सत्प्रतिपक्ष का उपन्यास करने पर सन्त लोग उपहास करते हैं। प्रथम परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त।