भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

परिच्छेदः बाध-लक्षण का खण्डन ३७७ अपि च--घटपटयोः स्वरूपभेदेन वैधर्म्यभेदेन चोभयकोटीकृतयोरन्योन्या- भावनिरूपणं भवति । अत्र तु प्रत्यक्षाभासादेः प्रत्यक्षाभासत्वादिना एककोटिताऽस्तु नाम । यत्तु प्रत्यक्षाभासत्वादिभ्यो व्यतिरिक्ततया प्रतिपत्तव्यं तस्य केन रूपेणैककोटीकरणम् ? न तावत्प्रतिव्यक्तिभिन्नेन स्वरूपेण, तेषामनन्ततया बुद्धिस्थीकर्तुमशक्यत्वात् । नापि यद्रूपोपात्तं विशेष्यं प्रत्यक्षाभासादिव्यतिरिक्तत्वेन विशेषणेन विशेषणीयम्, तद्रूपक्रोडीकृततयैव अन्योन्याभावनिरूपणमिति युक्तम्; तस्य स्वरूपस्य प्रत्यक्षाभासादिसङ्ग्राहकतया कोटिद्वैतभङ्गापादकत्वेन अन्योन्य- भावनिरूपणविरोधित्वात् ।

वस्तुतः तादात्म्य न होने पर भी तादात्म्यरूप से घट-पट प्रतियोगी हों, तो उसमें हानि क्या है ? यदि कहें कि 'अन्य घट का अर्थ और कालान्तर में उसी घट का भूतल में संसर्ग प्रसिद्ध है, किन्तु घट-पट का तादात्म्य तो अप्रसिद्ध ही है, अतः वह प्रति- योगी कैसे होगा ?' तो घट-पट का तादात्म्य भी प्रमेयत्व, द्रव्यत्व, सत्त्वरूप प्रकारों से सहित में आप मानते ही हैं। कारण प्रमेयत्वादि रूप से घट-पट का भेद अनुभवविरुद्ध है, यह आपके दर्शन का अभिप्राय है। हमें उसका निर्वाह करना नहीं है, अतः विस्तार व्यर्थ है । अर्थात् इस तरह अन्योन्याभाव का तादात्म्यप्रतियोगित्व आपके दर्शन में मान्य है। यदि उसे छोड़ देते हैं, तो अपसिद्धान्त होता है। यदि मानते हैं, तो असत्प्रतियोगित्व होगा, अतः वह आपके लिए ही निर्वाह्य है, हमारे ( अनिर्वचनीयवादी के ) लिए नहीं, यह भाव है ।

किञ्च - घट-पट स्वरूपभेद या वैधर्म्यभेद से उभयकोटिक हैं, अतः उन दोनों ( प्रतियोगी-अनुयोगियों ) से अन्योन्याभाव का निरूपण कथञ्चित् हो सकता है। किन्तु यहाँ प्रत्यक्षाभासत्व से प्रत्यक्षाभास का एककोटीकरण (अनुयोगिताग्रह) तो है, किन्तु जिसे प्रत्यक्षाभास व्यतिरिक्तत्वरूप से जानना है, उसकी किस रूप से कोटि करेंगे ? प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न जो स्वरूप उससे एककोटीकरण नहीं हो सकता, कारण अनन्त होने से वे बुद्धिस्थ ही नहीं हो सकते । प्रत्यक्षाभास-व्यतिरिक्तत्वरूप से विशेषणीय जो विशेष्य ( उपलक्षण ) है, तद्रूप-क्रोडीकृततया ( तद्रूपावच्छिन्न अनुयोगिता-ग्रह से ) अन्योन्याभाव का निरूपण नहीं हो सकता, कारण वह रूप प्रत्यक्षाभास में भी है। अतः उस रूप से दो कोटियाँ न रहने के कारण उस रूप से अन्योन्याभाव का निरूपण कैसे होगा ? ४८