भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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३७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तस्माद्विशिष्टव्यवहारप्रवर्तनकाले विशेष्यातिरिक्तं किञ्चिदनभ्युपेत्य विशिष्ट- सत्ता व्यवहर्तुमशक्या । अतः प्रतियोगी नाभावस्य विशेषणं भवितुमर्हति । उपलक्षणं तु स्यात्, तत्र चोक्तमेव । न चान्योन्याभाव एको न भवति, भिन्नप्रतियोगिकौ द्वावभावौ तौ । तथाच प्रतियोगिलक्षितं तत्स्वरूपमन्यदेवेति सिद्धान्ताविरोधि । न च युक्तम्; उभयं ह्यन्योन्याभावस्यैकात्मतया प्रतियोगि, एकात्मतायाश्च भेदविरोध एव । ततश्च येन च रूपेण प्रतियोगित्वं तेन रूपेण भेदानवकाशात्, भिन्नप्रतियोगिकता कुतोऽन्योन्याभावस्य । येन च रूपेण भिन्नता तेनान्योन्याभावं प्रति प्रतियोगिता नास्ति वस्तुनोः । ननु वस्तुतस्तयोरेकत्वाभावात् कथमेकतया प्रतियोगित्वमन्योन्याभावं प्रति घटेत वस्तुनोः ? यथा वस्तुतो भूतलासंसर्गाभावेऽपि घटस्य भूतलसंसृष्टतया संसर्गा- भावं प्रति, तत्र यथाऽन्यद् भूतलसंसृष्टया दृष्टं तथाऽत्रापि तावेव सप्रकारभेदौ तदा- त्मानौ दृष्टौ । सोऽयं त्वद्दर्शनाभिप्रायो नास्माकं निर्वाहार्ह इत्यास्तां विस्तरः । (प्रत्यक्षाभासान्योन्याभाव) का भी अभाव है; अतः असम्भव हो जायगा । यदि विशेष्य- मात्र कहें, तो उसकी प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति हो जायगी । तस्मात् विशिष्ट-व्यवहार के प्रवर्तनकाल में विशेष्य से अन्य कुछ न मानकर विशिष्टसत्ता का व्यवहार असम्भव है । अतः व्यवहारकाल में प्रतियोगी का अभाव अवश्य स्वीकार करना होगा । एवञ्च प्रतियोगी उक्त प्रकार से विशेषण तो हो नहीं सकता, किन्तु उपलक्षण हो सकता है और उपलक्षण पक्ष में दोष दे ही आये हैं । समर्थन—अन्योन्याभाव एक नहीं है, किन्तु कालात्ययापदिष्ट में प्रत्यक्षाभासान्य है और प्रत्यक्षाभास में कालात्ययापदिष्टान्य है । अतः प्रत्यक्षाभासप्रतियोगिक अन्योन्याभाव प्रत्यक्षाभास में न होने से प्रत्यक्षाभास में अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—यह कथन सिद्धान्त का अविरोधी नहीं है और न युक्त ही है, कारण अन्योन्याभाव के (तादात्म्य के) दोनों प्रतियोगी हैं और तादात्म्य का भेद विरोध है । अतः जिस रूप (तादात्म्य) से प्रतियोगी है, उस रूप से भेद नहीं है । अतः अन्योन्याभाव के अन्यान्य प्रतियोगी कैसे होंगे ? जिन घटत्व-पटत्वादि रूपों से भेद है, उन्हीं रूपों से वस्तु अन्योन्याभाव के प्रतियोगी ही नहीं हैं । समर्थन—उन घट-पटादि वस्तुओं में वास्तविक तादात्म्य है ही नहीं, फिर तादात्म्य से अन्योन्याभाव का प्रतियोगी कैसे होगा ? खण्डन—जैसे वस्तुतः घट भूतल-संसृष्ट नहीं है, तथापि संसर्गाभाव का भूतलसंसृष्टत्वरूप से घट प्रतियोगी होता है, वैसे ही