खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय स्वीकारपूर्वकोऽस्वीकारस्त्यागः । न च रूपान्तरेण तत्र तत्स्वीकारः । ततस्त्याग एवासौ न भवतीति नातिप्रसङ्ग इति चेन्न । स्वीकारस्यापि परित्यागपदार्थान्तर्भावे स्वीकृतेति व्यर्थम्, तत्यागेऽपि च नाद्यद्वितीयौ, अस्तित्वेनेष्टस्य रूपान्तरेण सर्वत्रैवानिष्टत्वसम्भवात् । संयोगाद्यव्याप्यवृत्तितावादिपक्षे चैकस्यैव संयोगस्यास्तित्वनास्तित्वाभ्या- मभ्युपगम्यमानत्वात् । एवञ्च कालदेशादिभेदेन सत्त्वासत्त्वाभ्युपगमेऽपि प्रसङ्गो द्रष्टव्यः । तस्यैव तदैव तत्रैव तेनैव तथैवेष्टत्वानिष्टत्वे विवक्षिते अत्रेति चेत्; एवं तर्हि कालमभ्युपगम्यानभ्युपगच्छतः प्रतिज्ञाहानिर्न स्यात् । तत्र तदेत्युक्तविशेषां- शस्यासंभवात् । नहि कालः कालान्तरं स्वात्मानमेव वाऽध्यास्ते । काले तदेति यदि कहें कि "स्वीकारपूर्वक अस्वीकार त्याग है', नित्यत्वरूप से शब्द का 'स्वीकार' नहीं है, अतः उस रूप से अस्वीकार त्याग ही नहीं है, एवञ्च अतिव्याप्ति नहीं है", तो स्वीकार त्यागपद के अर्थ में अन्तर्भूत होने से 'स्वीकृत' विशेषण व्यर्थ हो जायगा । स्वीकृत विशेषण न भी दें, तब भी दोनों पक्ष युक्त नहीं, कारण 'अस्तित्व' रूप से इष्ट का अन्य रूप (नित्यत्व आदि) से त्याग सर्वत्र शब्दादि स्थल में है, अतः अतिव्याप्ति हो जायगी । जो लोग संयोग आदि को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में वृक्ष में अस्तित्व से इष्ट संयोग नास्तित्व रूप से भी इष्ट है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। इसी प्रकार देश और कालभेद से मीमांसक के अनुयायी बनकर जो शब्द का नित्यत्व मान चुके हैं, वे ही यदि इस देश-काल में नैयायिक बनकर शब्दानित्यत्व का त्याग करें, तो उसमें भी अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जिस देश-काल में जिस पुरुष ने जिस रूप से जिस पदार्थ का अस्वीकार किया हो, उस देश-काल में उस पुरुष का उस रूप से उस पदार्थ का अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि है' ऐसा लक्षण करेंगे । अतः देश-काल, पुरुष या प्रकार-भेद से स्वीकृत के अस्वीकार में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कालोऽस्ति' ऐसा मानकर 'कालो नास्ति' ऐसा कहने पर भी प्रतिज्ञाहानि नहीं होगी । अर्थात् वहाँ प्रतिज्ञाहानि के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी; कारण काल अन्य काल में या अपने में नहीं रहता, अतः वहाँ 'तदा' यह विशेषण नहीं है । यदि कहें कि कालस्थल के लक्षण में 'तदा' यह विशेषण नहीं देंगे और अन्य