भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

परिच्छेद ] प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन ३८१ विशेषणस्य प्रतिषेपेऽन्यत्र च प्रक्षेपे लक्षणैकताक्षतिः । कालं प्रति च प्रतिज्ञाहानि- रदोषत्वे तद्वदन्यत्राप्यदोषत्वापातः । यदैव स्वीकारस्तदैवास्वीकारासिद्धेश्च । तदेति तत्कथाकालो विवक्षित इति चेन्न । तच्छब्दस्यैकव्यक्तिपरत्वे लक्षणा- ननुगमः, वादादित्वेन साम्ये कदाचिदपि तद्विपरीतवादान्तराकरणप्रसङ्गः, एवं तथैव तस्यैवेत्यादिपदस्य द्रष्टव्यम् । उक्तेति पदस्य चापसिद्धान्तव्यवच्छेदकस्य विरुद्धन्यायेनासमर्थविशेषणत्वम् । एवं सर्वनिग्रहस्थानेषु द्रष्टव्यमिति सङ्क्षेपः । स्थलों के लक्षणों में 'तदा' विशेषण देंगे, एवञ्च कालस्थल में अव्याप्ति नहीं है, तो एक लक्षण न रहा, किन्तु लक्षण-भेद हुआ । यदि कहें कि कालस्थल में प्रतिज्ञाहानि दोष नहीं है, तो इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । यदि प्रमाण के बिना भी कालस्थल में प्रतिज्ञाहानि को दोष न मानें, तो अन्यत्र भी प्रतिज्ञाहानि दोष न होगा । किञ्च—जिस काल में स्वीकार हो, उसी काल में अस्वीकार हो भी नहीं सकता । समर्थन—'यदा-तदा' पद एकक्षणपरक नहीं, किन्तु तत्कथा-कालपरक हैं । एवञ्च एक कथा से उपलक्षित काल में क्षणभेद से स्वीकार-अस्वीकार हो सकता है, अतः असम्भव दोष नहीं है । खंडन—तत् शब्द एककथाव्यक्तिपरक है अथवा कथात्वपरक है, वादत्वादिरूप से कथामात्रपरक है या वादमात्रपरक ? प्रथम पक्ष में जिस कथा व्यक्ति का तत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । यदि तत्-शब्द को कथामात्रपरक मानें, तो मीमांसक होकर कदाचित् किसी वाद में शब्द- नित्यत्व स्वीकारकर, नैयायिक बनकर अन्य कथा में भी शब्द-नित्यत्व का अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि हो जायगी । इसी प्रकार 'तथा' शब्द को यदि एक प्रकारव्यक्तिपरक मानें, तो अन्य प्रकार से स्वीकार-अस्वीकार स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । यदि प्रकारमात्रपरक कहें, तो अस्तित्व से स्वीकृत का नित्यत्व से अस्वीकार प्रतिज्ञाहानि हो जायगी । इसी प्रकार 'तस्य, तेन' इत्यादि पदों में भी दोष जानने चाहिए । किञ्च—'स्वीकृत उक्त का परित्याग प्रतिज्ञाहानि है' इस लक्षण में अपसिद्धान्त का व्यवच्छेदक 'उक्त' पद, विरुद्ध के लक्षण में सव्यभिचार के व्यवच्छेदक नियम के तुल्य व्यर्थ है; कारण स्वीकृत का परित्यागमात्र दूषण में पर्याप्त है । संक्षेप में इसी प्रकार अन्य निग्रहस्थानों के लक्षणों में भी विशेषण का वैयर्थ्य जानना चाहिए ।