भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

३८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय प्रतिज्ञान्तर-लक्षण-खण्डनम् प्रतिज्ञाहान्यादीत्यादिपदेन च किं सङ्गृह्यते ? प्रतिज्ञान्तरादीति चेन्न । प्रतिज्ञान्तरमेव न निरूपयितुं शक्यते । तद्यथा—स्वोक्तस्य परदूषितस्य साध्यभागस्य पूर्वानुक्तविशेषणवतोऽभिधानं प्रतिज्ञान्तरमित्यल्लक्षणम् । तथा हि, यत्र वादिना प्रथमं सविशेषणः प्रतिज्ञाभागो- ऽभिहितः, परेण च निर्विशेषणोक्तभ्रमाद् दूषितः । ततो वादी प्रथमाभिहितं सविशेषणमेवोपन्यस्य 'ईदृशं मयोक्तम्, न तु निर्विशेषणमतो निरनुयोज्यानुयोगो भवतः' इति सदुत्तरमेव ब्रूते, तत्रापि गतत्वादतिव्यापकमेतत् । पूर्वानुक्तविशेषणवत्त्वं तत्र नास्ति, तत्कथमतिव्याप्तिरिति चेन्न । प्रथमोक्तेः प्रागभावस्य पूर्वं स्थितत्वात् । विशेष्योक्तिरपि तदा नाऽऽसीदिति चेत् ; किमायातं तावता विशेषणानुक्त्यतिप्रसङ्गस्य । प्रतिज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन प्रस्तुत परिच्छेद के आरम्भ में 'प्रतिज्ञाहान्यादि' यहाँ आदि पर से किसका ग्रहण करेंगे ? यदि कहें कि प्रतिज्ञान्तर आदि का ग्रहण करेंगे, तो वह ठीक नहीं । कारण प्रतिज्ञान्तर का निरूपण ही नहीं हो सकता । समर्थन—'स्व से उक्त और पर से दूषित साध्यभाग का पूर्वानुक्त विशेषण- युक्तत्व रूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है।' खण्डन—यह लक्षण युक्त नहीं, कारण जहाँ वादी ने सविशेषण ही साध्यभाग कहा, किन्तु प्रतिवादी विशेषणरहितत्व भ्रम- से उसे दूषित करता है। इसके बाद वादी पूर्वकथित सविशेषण प्रतिज्ञाभाग का उल्लेख कर यह कहे कि 'हमने ऐसा कहा है, निर्विशेषण नहीं कहा, अतः आपका दोष अयुक्त है', तो यह सत्-उत्तर ही है। किन्तु यहाँ आपके इस लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—यहाँ हमने प्रथम विशेषण देकर ही कहा है, अतः वह पूर्वानुक्त विशेषण नहीं है । एवञ्च लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—प्रथम विशेषण की उक्ति से पूर्व- काल में विशेषणोक्ति का अभाव है ही, अर्थात् पूर्वानुक्त इत्यादि शब्द का पूर्वकाल में विद्यमान जो प्रागभाव, तत्प्रतियोगी जो उक्ति, तद्विषय जो विशेषण, तादृश विशेषण- वत्त्वरूप से अर्थ है। उक्त स्थल में प्रथमोक्ति से पूर्व विद्यमान प्रागभाव का प्रतियोगी जो उक्ति, तद्विषयविशेषणवत्त्वरूप से अभिधान है, अतः अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । समर्थन—उस काल में विशेष्य की उक्ति भी नहीं है। खण्डन —इस कथन से

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