भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

विशेष्योक्तिकाले विशेषणानुक्तिर्विवक्षितेति चेन्न । एककर्तृकाया वाचो गपदसम्भवेन सर्वत्र तथाभावस्यैव भावात् । विशेष्योक्तेरनन्तरकाल इति चेन्न । नीलोत्पलमित्यादौ पूर्वनिपातिविशेषणे ऽदभावात् । विशेष्योक्तेरव्यवहितपूर्वकाल इति चेन्न । 'उत्पलं नीलमित्यादौ ऽदभावात् । अव्यवहित इति चेन्न । बहुविशेषणके विशेष्ये तदभावात् । विशेषणाभिधानोचितकाल इति चेन्न । नानाविशेषणके विशेष्ये क्रमवृत्ति- वाद्वाचः क्रमेणाभिधीयमाने य एकविशेषणाभिधानकालः सोऽपरेषामपि विशे- वेशेषगुणानुक्ति का जो अतिप्रसङ्ग है, उसमें क्या लाभ हुआ । अर्थात् वह अतिसङ्ग ज्यों-का-त्यों बना ही रहा । समर्थन—‘विशेष्योक्ति के काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा कहेंगे। अनुदित विशेषण की तो तदानीं अनुक्ति नहीं है, अतः अतिप्रसंग नहीं है । खण्डन—एक पुरुष द्वारा उच्चरित वचन में एक काल में विशेष्य और विशेषण दोनों की उक्ति नहीं हो सकती, कारण वह क्रमभावी है । अतः सविशेषण वाक्य में सर्वत्र विशेष्योक्ति-काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से अभिधान हो जाने से अतिव्याप्ति हो ही जायगी । समर्थन—‘विशेष्योक्ति के उत्तर काल में अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्व रूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा निवेश करने पर जहाँ विशेष्योक्ति से पूर्वकाल में विशेषणोक्ति है, वहाँ अर्थात् ‘नीलमुत्पलम्’ इस स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘विशेष्योक्ति से अव्यवहित पूर्वकाल में अनुक्त जो विशेषण’ इत्यादि निवेश करें, तो ‘उत्पलंन्नीलम्’ यहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि ‘विशेष्योक्ति से अव्यवहित काल में अनुक्त जो विशेषण’ इत्यादि निवेश करें, तो बहु- विशेषणवाले ‘सुरभि नीलम् उत्पलं विकासिमनोहरम्’ वाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘विशेषण के अभिधान के लिए उचित जो काल, उसमें अनुक्त जो विशेषण, तादृश विशेषणवत्त्वरूप से स्वोक्त परदूषित साध्यभाग का अभिधान प्रतिज्ञान्तर है’ ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च ‘सुरभि नीलमुत्पलम्’ इत्यादि पूर्वोक्त वाक्यों में अतिव्याप्ति नहीं है, कारण उक्त वाक्यों में विशेषणोक्ति-काल में सभी विशेषण उक्त ही हैं, अनुक्त नहीं । खंडन—नाना विशेषणवाले विशेष्य में वचन क्रमवृत्तिक होने से जहाँ क्रमशः विशेषण का अभिधान है, वहाँ एक विशेषण का जो अभिधान-काल है, वही