भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

परिच्छेद ] प्रतिज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन ३८५ एतेन पूर्वमविशिष्टोक्तस्येति विशेषणं प्रक्षिप्तव्यमिति निरस्तम् । उत्तरकाल- वाक्यविशेषणकविशेष्यस्य प्रथममविशिष्टोक्तत्वसम्भवस्य दर्शितत्वात् । किञ्च—प्रथममविशिष्टमुक्त्वा भवता यदि विशेषणमिदं प्रक्षिप्यते, तदा हेत्वन्तरं भवतोऽपि स्यात्तथापि तदभावे वा ममापि कुतः प्रतिज्ञान्तरम् । अथ प्रथममेवेदं विशेषणमुपादाय ब्रवीषि; तथाप्यव्याप्तिः । प्रथमं सविशेषण- मुक्त्वा विशेषणवैय्यर्थ्यभ्रमेण झटिति संरम्भान्निर्विशेषणेऽभिहिते परेण च दूषिते पुनः सविशेषणमभिदधतः सैवं प्रतिज्ञान्तरं स्यादित्यव्याप्तिः, स्वपरसाध्यपूर्वपदानां विवेचने व्यक्तौ पतनादव्याप्तिश्च । प्रकरणादिलभ्यतया प्रागनुक्तस्य विशेषणस्य भ्रान्तपरदूषितस्य प्रकरणलभ्यविशेषणवत्तयाऽनुवदतोऽपि सद्वादे प्रसङ्गः । समर्थन—'पूर्वकाल में अविशिष्टत्व रूप से उक्त परदूषित साध्यभाग का विशेषण- वत्त्वरूप से अभिधान प्रतिज्ञान्तर है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'किससे पूर्वकाल में अविशिष्टत्व रूप से उक्त हो' यह विशेषरूप से नहीं कहा है । अतः यदि विशेष्योक्ति से पूर्वकाल का ग्रहण करें, तो जहाँ विशेष्य से उत्तर काल में विशेषण की उक्ति है, वहाँ विशेष्योक्ति से पूर्व अविशिष्टत्वरूप से अनुक्ति होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—प्रथम तो आपने 'पूर्वम् अविशिष्टतया उक्तस्य' यह विशेषण दिया नहीं, अब दे रहे हैं; अतः आपका 'हेत्वन्तर' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । फिर भी यदि हेत्वन्तर न हो, तो हमें भी प्रतिज्ञान्तर कैसे होगा ? यदि प्रथम से ही यह विशेषण देकर आप कहें, तब भी अव्याप्ति है । देखिये—जहाँ प्रथम से सविशेषण ही कहकर विशेषण के वैय्यर्थ्य के भ्रम से झटिति विशेषण का त्यागकर निर्विशेषण का ही अभिधान किया हो और फिर प्रतिवादी के दोष देने पर सविशेषण का अभिधान हो, वहाँ अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि लक्षणघटक स्वपर-साध्य-पद के अर्थ का विवेचन करते हैं, तो वह तत्-तत् व्यक्तिपरक होने से जिस व्यक्ति का स्वशब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—जहाँ प्रकरण से लभ्य होने से प्राक्काल में विशेषण अनुक्त है, परन्तु अज्ञानवश प्रतिवादी से दूषित है और वादी ने प्रकरणलभ्य विशेषण का अनुवादमात्र किया है, वहाँ सद्वाद में अतिव्याप्ति हो जायगी । ४६