खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ३६१ मात्रं विवक्षितम्, उत यस्त्वया तत्र समाधिरभिधेयः, स मयाऽप्यभिप्रायेण स्वपक्षे समाधिः ? न तावदाद्यः ; अप्रस्तुतत्वात् । परोक्तदोषानुद्धारे तावतैव कथायास्तदर्थस्य वा पर्यवसानात्, निग्रहापरिहागावधित्वान्नयोः । द्वितीये तु स एवाभिधीयताम्, का नो हानिः ? भवांस्तावदभिधत्तां कस्तत्र समाधिः, ततो मयाप्यभिधेय इति चेन्न । मया तदभिधानस्य साम्प्रतमप्रस्तुतत्वात् । नहि मया स्वपक्षसाधनं त्वया च तद्दूषणं प्रकृते वक्तुमारब्धमस्ति । किन्तु त्वया स्वपक्षो निर्वाह्यः, तद्दूषणञ्च मयाऽभिधा- नोयमिति कथा प्रस्तुता वर्तते । ईदृशि च कथाविभागे मत्पक्षसमाधानाय मां पर्यनुयोक्तुं भवतः कुतोऽधिकारः ? अथ विशेषतस्तन्निराङ्कने किं प्रयोजनम्, अस्ति तावदेतादृशि चोद्ये परिहारो करें, तो नैयायिक आदि भी प्रतिज्ञाहान्यादि के लक्षणों का खण्डनकर प्रतिज्ञाहान्यादि का निवारण कर ही सकते हैं । अर्थात् प्रतिबन्दी उत्तर दे सकते हैं । खंडन — क्या आप अन्य पक्ष में दोष के आपादन द्वारा प्रतिबन्दीरूप दोष देकर केवल परपक्ष में दोष का आपादनमात्र चाहते हैं या जो परपक्ष में दोष है, वह दोष मेरे पक्ष में भी है, इस अभिप्राय से स्वपक्ष में समाधि ( समाधान ) चाहते हैं । अर्थात् दोष- सामान्य विवक्षित है या परिहारसाम्य ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण सम्प्रति परपक्ष में दोष प्रस्तुत ही नहीं है । स्वपक्ष में परोक्त दोष का उद्धार न होने से ही वितण्डारूप कथा तथा वादजल्परूप कथा का अर्धभाग समाप्त हो जाता है, कारण निग्रहस्थान का अपरिहार ही उनकी अवधि है । द्वितीय पक्ष में उस समाधि को ही कहिये, मेरी क्या हानि है ? समर्थन — पहले आप ही कहिये कि आपके पक्ष में क्या समाधि है, पीछे हम भी अपने पक्ष में समाधि कहेंगे । खंडन — हमारे पक्ष में समाधान सम्प्रति अप्रस्तुत है, कारण हमने स्वपक्ष में समाधान कहने और आपने हमारे पक्ष में दूषण कहने का आरम्भ नहीं किया । किन्तु आप अपने पक्ष का निर्वाह करें और हम आपके पक्ष में दोष दें, ऐसी कथा प्रस्तुत है । इस कथा में मेरे पक्ष में समाधान के लिए मुझे प्रेरणा करने में आपका अधिकार कैसे हो सकता है ? समर्थन — विशेषरूप से अपने पक्ष में समाधान देने से क्या लाभ है, इस दोष