खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३६२ | सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य | [ द्वितीय |
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यतस्त्वयाऽपि स्वपक्षेऽसौ स्वीकार्य इत्याशयस्ते । सोऽपि न युक्तः ; न हि मत्पक्षे चेत्समाधिरस्ति तावता स्वपक्षेऽपि तेन भवितव्यमित्यत्र किञ्चिदपि प्रमाणमस्ति । साम्यादेवेमिति चेन्न । वैषम्यस्यावश्याभ्युपेयत्वात् । यदि तद्गतमसाधारणं स्वरूपमादाय मद्दर्शनं प्रतितन्त्रसिद्धान्तं वा तत्र समाधिः स्यात् । अत्र च स्वपक्षे तदभावान्न स्यात् , तथा सति साम्यमात्रात्कथं समाधिरसावत्रापीति निश्चेतुं शक्यते । कोऽसौ तत्र विशेष इति चेन्न । मया साम्प्रतं तदभिधानस्याप्रस्तुतत्व- मित्युक्तत्वात् । चोद्यसाम्यात् समाधिसाम्यमिति चेन्न । दूष्यगतविशेषाभावाभावविशेषि- तत्त्वादिनापि तद्वैषम्यसम्भवात् । यथा-सद्व्यवहारस्य सत्तास्वीकारत्वे तुल्येऽपि का समाधान है ही, कारण आप भी अपने पक्ष में उस समाधान को स्वीकार करते हैं। खण्डन—आपका यह आशय युक्त नहीं, है, कारण मेरे पक्ष में समाधान होने से आपके पक्ष में भी समाधान हो, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । समर्थन—दोष तुल्य होने से समाधान भी तुल्य है, ऐसा अनुमान हो ही सकता है । अर्थात् 'प्रत्यक्षदोषाः परिहारवन्तः एकदोषत्वात्, स्वमस्थदोषवत्' यह अनुमान हो ही सकता है। खण्डन—समाधेय की व्यक्तिगत विशेषता को लेकर तथा स्वदर्शन-प्रतिदर्शन के सिद्धान्तों का आश्रयण कर समाधान में वैषम्य अवश्य मानना ही पड़ेगा । देखिये—जहाँ नैयायिक द्रव्य में सद्व्यवहारविषयत्व से सत्ता की सिद्धि करता हो और 'यदि सत्ता की सिद्धि सद्व्यवहारविषयत्व से ही हो, तो सत्ता में भी सद्व्यवहारविषयत्व से सत्ता की सिद्धि क्यों न हो?' ऐसी प्रतिबन्दी मीमांसक देता हो, वहाँ समाधेय व्यक्ति सत्ता और द्रव्य भी विशेष हैं तथा सत्ता में सद्व्यवहार स्वरूपसत्त्व को विषय करता है, ऐसा नैयायिकदर्शन, प्रतिदर्शन (मीमांसा) सिद्धान्तरूप समाधि है और तुम्हारे पक्ष में द्रव्य में वह समाधान नहीं है । अतः दोष के साम्यमात्र से यहाँ भी वही समाधि है, यह निश्चय कैसे हो सकता है ? समर्थन—दोष तुल्य होने पर भी समाधि में वैषम्य का प्रयोजक विशेष क्या है ? खण्डन—मैं विशेष का अभिधान करूँ, यह अप्रस्तुत है—यह कह ही आया हूँ । अर्थान्तर के भय से मैं उसे कह नहीं सकता । समर्थन—फिर भी जब प्रश्न सम है, तब समाधि भी सम ही होनी चाहिए । अर्थात् तुम्हारे पक्ष में जो समाधि है, उसीका हम यहाँ साधन नहीं करते । किन्तु