खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय नियामकभावे तर्हेतदीयदूषणत्वे सन्देहः पर्यवसित इति चेत्; अस्तु दोषत्व- सन्देहेऽपि भवदीयसाधनस्यासाधकत्वात् सन्दिग्धासिद्धवत् । किञ्च-यल्लक्षणवतोऽस्य दोषत्वसन्देहस्तल्लक्षणक एवायमन्यत्रापीति तत्राप्यसिद्ध्यादेरदूषणत्वमेव स्यादितीयं प्रतिबन्दी दुरुत्तरा प्रतिवादिनेति । नापि द्वितीयः ; तथाहि - उभयवादिसम्मतादूष्यत्वं धूमानुमानादिकं यदि प्रतिबन्दीकरोति परस्तदा तद्दर्शनेऽन्यत्र कचिदप्येतदसिद्ध्यादिकं नोद्भावनीयम्, परसाधनेषु तस्यैव धूमानुमानादेः प्रतिबन्द्या भयादित्येषा मयाऽपि सुग्रहैव तं प्रति प्रतिबन्दी । अत्रापि शक्यत एव पठितुम् - 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि । समर्थन—नियामक अर्थात् विशेष-दर्शन का अभाव होने से प्रकृत दोष में दोषत्व का सन्देह ही होगा । अर्थात् निश्चित दोषस्वरूप से आप भी उसका उद्- भावन नहीं कर सकते । खंडन-दोषत्व का सन्देह ही रहे, तो हानि क्या है । संदिग्ध असिद्धि के तुल्य दोष के सन्देह से ही आपका हेतु साधक नहीं होगा । किञ्च-जिस लक्षण से युक्त असिद्ध्यादि में प्रकृत स्थल में दोषत्व का सन्देह है, उस लक्षण से युक्त ही असिद्ध्यादि अन्यत्र भी हैं । अतः यदि असिद्ध्यादि को यहाँ दूषण न मानें, तो अन्यत्र भी असिद्ध्यादि दूषण न कहलायेंगे, यह प्रतिबन्दी प्रतिबन्दीवादी को भी दुरुत्तरणीय ही है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है । देखिये - 'वर्णा अनित्याः श्रावणत्वात् ध्वनिवत्' नैयायिक की इस अनुमिति में मीमांसक द्वारा उपान्त्य वर्ण में असिद्धि और शब्दत्व में अनैकान्तिकत्व दोष देने पर नैयायिक उभयमत में अदूष्य धूमानुमान को यदि प्रतिबन्दी करें (अर्थात् नैयायिक यह कहे कि यदि प्रस्तुत स्थल में असिद्धि और अनैकान्तिक दोष हों, तो वे दोष धूमानुमान में भी हो जायेंगे, कारण धूम भी आकाश में अनैकान्तिक है तथा आर्द्वेन्धन-संयुक्त प्रदेश अन्यत्र पर्वत में असिद्ध है ), तो नैयायिक-मत में कहीं भी धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्धि आदि का उद्भावन न हो सकेगा । भाव यह है कि यदि प्रस्तुत श्रावणत्वानुमान में धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्ध्यादि दोष न कहलायें, तो उक्त प्रतिबन्दी के भय से कहीं भी असिद्ध्यादि दोष न कहलायेंगे—ऐसी प्रतिबन्दी नैयायिक पर भी हो सकती है । यहाँ भी 'यत्रोभयोः' इत्यादि श्लोक पढ़ ही सकते हैं ।