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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

३६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय नियामकभावे तर्हेतदीयदूषणत्वे सन्देहः पर्यवसित इति चेत्; अस्तु दोषत्व- सन्देहेऽपि भवदीयसाधनस्यासाधकत्वात् सन्दिग्धासिद्धवत् । किञ्च-यल्लक्षणवतोऽस्य दोषत्वसन्देहस्तल्लक्षणक एवायमन्यत्रापीति तत्राप्यसिद्ध्यादेरदूषणत्वमेव स्यादितीयं प्रतिबन्दी दुरुत्तरा प्रतिवादिनेति । नापि द्वितीयः ; तथाहि - उभयवादिसम्मतादूष्यत्वं धूमानुमानादिकं यदि प्रतिबन्दीकरोति परस्तदा तद्दर्शनेऽन्यत्र कचिदप्येतदसिद्ध्यादिकं नोद्भावनीयम्, परसाधनेषु तस्यैव धूमानुमानादेः प्रतिबन्द्या भयादित्येषा मयाऽपि सुग्रहैव तं प्रति प्रतिबन्दी । अत्रापि शक्यत एव पठितुम् - 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि । समर्थन—नियामक अर्थात् विशेष-दर्शन का अभाव होने से प्रकृत दोष में दोषत्व का सन्देह ही होगा । अर्थात् निश्चित दोषस्वरूप से आप भी उसका उद्- भावन नहीं कर सकते । खंडन-दोषत्व का सन्देह ही रहे, तो हानि क्या है । संदिग्ध असिद्धि के तुल्य दोष के सन्देह से ही आपका हेतु साधक नहीं होगा । किञ्च-जिस लक्षण से युक्त असिद्ध्यादि में प्रकृत स्थल में दोषत्व का सन्देह है, उस लक्षण से युक्त ही असिद्ध्यादि अन्यत्र भी हैं । अतः यदि असिद्ध्यादि को यहाँ दूषण न मानें, तो अन्यत्र भी असिद्ध्यादि दूषण न कहलायेंगे, यह प्रतिबन्दी प्रतिबन्दीवादी को भी दुरुत्तरणीय ही है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है । देखिये - 'वर्णा अनित्याः श्रावणत्वात् ध्वनिवत्' नैयायिक की इस अनुमिति में मीमांसक द्वारा उपान्त्य वर्ण में असिद्धि और शब्दत्व में अनैकान्तिकत्व दोष देने पर नैयायिक उभयमत में अदूष्य धूमानुमान को यदि प्रतिबन्दी करें (अर्थात् नैयायिक यह कहे कि यदि प्रस्तुत स्थल में असिद्धि और अनैकान्तिक दोष हों, तो वे दोष धूमानुमान में भी हो जायेंगे, कारण धूम भी आकाश में अनैकान्तिक है तथा आर्द्वेन्धन-संयुक्त प्रदेश अन्यत्र पर्वत में असिद्ध है ), तो नैयायिक-मत में कहीं भी धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्धि आदि का उद्भावन न हो सकेगा । भाव यह है कि यदि प्रस्तुत श्रावणत्वानुमान में धूमानुमानरूप प्रतिबन्दी के भय से असिद्ध्यादि दोष न कहलायें, तो उक्त प्रतिबन्दी के भय से कहीं भी असिद्ध्यादि दोष न कहलायेंगे—ऐसी प्रतिबन्दी नैयायिक पर भी हो सकती है । यहाँ भी 'यत्रोभयोः' इत्यादि श्लोक पढ़ ही सकते हैं ।

परिच्छेद ] प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ३६५ अथ यं विशेषमादाय प्रतिबन्दी स्यात् तन्मात्रस्यानुद्भावनम्, न तु सामान्यत एवेति चेन्न । तत्र विशेषे प्रतिबन्द्या त्याजितदुष्टत्वे गतत्वात्तल्लक्षणमेव नेति स्यात् । विशिष्य तद्विशेषत्याजने च तादृशस्य लक्षणस्यासिद्धिरेव स्यादिति कृतं प्रतिबन्द्या । अथ मद्दर्शनमात्राभ्युपगततादृश्यत्वं किञ्चित्पदार्थं प्रतिबन्दीकरोति तदैतदुक्तं तेन स्यात्—इह नेदं दूषणं वक्तव्यमित्यभिधानेऽनयैव युक्त्या तवेष्टभङ्गप्रसङ्गा- दिति । तन्न; इदमीह दूषणं वक्तव्यम्, अनभिधानेऽस्यैवानिष्टस्य परसिषाधयि- षितस्य सिद्धिप्रसङ्गादित्यभिधानानुकूलाया अपि प्रतिबन्द्याः सम्भवात् । नन्वेवमेवास्तु, तथाचाभिधानेऽनभिधाने चोभयतःपाशा प्रतिबन्दीरज्जुर्भवत समर्थन.—असिद्धि के जिस प्रकार-विशेष को लेकर प्रतिबन्दी करते हैं, उस दोष से विशिष्ट प्रकृत हेतु का उद्भावन नहीं होता । किन्तु सामान्यतः असिद्धि का उद्भावन तो होता ही है । खंडन—प्रतिबन्दी ने जिस (असिद्धि) विशेष में दोषत्व तो दूर कर दिया और असिद्धि का लक्षण है, उस स्थल में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन —असिद्धि आदि दोषों के लक्षण में 'प्रतिबन्दी से त्याजित दुष्टत्व से अन्य' ऐसा निवेश करने पर अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—यदि ऐसा है, तो प्रतिबन्दी का उद्भावन व्यर्थ है, असिद्धि के लक्षण का अभाव है, केवल इतना ही उद्भावन करना चाहिए । समर्थन —जहाँ 'प्रपञ्चः सत्यो व्यावहारिकत्वात्' इस नैयायिक के अनुमान में वेदान्ती असिद्धि का उद्भावन करे और उस पर नैयायिक ऐसी प्रतिबन्दी का उपन्यास करे कि “यदि मेरी अनुमिति में असिद्धि-दोष हो, तो 'प्रपञ्चो मिथ्या व्यावहारिकत्वात्' इस आपके अनुमान में भी असिद्धि हो जायगी", वहाँ उसका यही अभिप्राय है कि 'यहाँ इस दोष का अभिधान न करो, यदि करोगे, तो इसी दोष से तुम्हारे इष्ट का भी भङ्ग हो जायगा ।' खंडन—'यहाँ दोष अवश्य कहना चाहिए । यदि न कहेंगे, तो पर के सिषाधयिषित अनिष्ट का प्रसङ्ग हो जायगा', ऐसे अभिधान के अनुकूल प्रतिबन्दी भी सम्भव हो सकती है । समर्थन—ऐसा ही रहे, क्या हानि है ? यदि असिद्धि का अभिधान करते हैं, तो इसी दोष से मेरे अभीष्ट की असिद्धि होती है और यदि अभिधान नहीं करते,

३६६ सोनुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ द्वितीय एव दुर्निवारा स्यात् । मैवम्; मिथो विरुद्धायाः प्रतिबन्द्यास्तर्काभासत्वात्, मिथो विरुद्धत्वस्य तर्कदूषणत्वात् । सत्प्रतिपक्षानुमानवद् द्वयोरपि परस्परप्रति- क्षेपेणैव उपक्षीणत्वादिति । न्याय-द्वितीयाध्यायप्रथमाह्निकसूत्रे च 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' इत्यत्र आपादितदृष्टान्ताभावलक्षणदोषसाम्येन प्रत्यवस्थितं पूर्वपक्षवादिनं निराकर्तुमाचार्यः तो पर के सिषाधयिषित मेरे अनिष्ट की सिद्धि होती है—इस प्रकार उभयतः पाश- प्रतिबन्दी वेदान्ती पर ही होती है । खंडन—असिद्धि आदि दोषों के अभिधान- अनभिधान से मेरे पक्ष में दोष का आपादन आप करते हैं—यह तृतीय प्रतिबन्दी होती । है वह युक्त नहीं, कारण परस्पर विरुद्ध दो धर्मों में एक का आपादन तर्काभास हो जाता है, कारण मिथोविरोध तर्क का दोष है। आपके मत में प्रतिबन्दी को तर्क- विशेष ही माना गया है । सत्प्रतिपक्षानुमान के तुल्य यदि अभिधान पक्ष में दोष हो, तो अनभिधान पक्ष दोषयुक्त नहीं है और यदि अनभिधान पक्ष में दोष हो, तो अभिधान पक्ष में दोष नहीं है—इस प्रकार परस्पर के प्रतिक्षेप से दोनों पक्षों में दोष अनुपपन्न है । समर्थन—यदि इस तरह आप प्रतिबन्दी को दूषक न मानें, तो 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि वचन द्वारा भट्टपाद ने उसे जो दूषक बतलाया है, उससे विरोध हो जायगा । खंडन—भट्टपाद के उक्त वचन के साथ उद्योत- कर के वचन का विरोध होने से उसमें हमारा कोई आदर नहीं है। इसी बात को ग्रन्थकार के शब्दों में कहना हो, तो यों कहा जा सकता है कि 'न्यायदर्शन के द्वितीयाध्याय के प्रथम आह्निक के १६ वें सूत्र ( 'प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत्' ) के वार्तिक में आपादित दृष्टान्ताभावरूप दोषसाम्य द्वारा प्रत्यवस्थित पूर्वपक्षवादी का निराकरण करते हुए जिन आचार्य उद्योतकर ने 'समानमित्यनुत्तरमभ्युपगमात्' इत्यादि कहा है, उन्हींको भट्ट का प्रतिभट ( प्रतियोद्धा ) बना दीजिये।' अर्थात् उन्होंने भी भट्ट के इस वचन की उपेक्षा की है, अतः वे ही भट्ट से निपट लें । हम तो उद्योतकर का वह वचन प्रमाण मानकर प्रतिबन्दी को अदूषक ही मानेंगे, यह भाव है । उक्त सूत्र, भाष्य और वार्तिक का पूरा प्रसंग इस प्रकार है—शंका हुई कि चक्षु आदि प्रमेय होने से उनमें प्रमाणत्व कैसे रहेगा, क्योंकि प्रमाकरणत्वरूप प्रमाणत्व और

‘समानमित्युत्तरमभ्युपगमात्, अभ्युपगतं तावद्भवता नास्मत्पक्षे दृष्टान्तोऽस्तीति’ ब्रुवन्नुद्द्योतकरो ‘यत्रोभयोस्ति’त्यादि वदतो भङ्गस्य प्रतिभटीकर्तव्यः । अपसिद्धान्त-लक्षण-खण्डनम् तत् किं प्रतिबन्द्यादि दूषणं न भवत्येव ? नन्वेवं भवतोऽपसिद्धान्तः प्रमाविषयत्वरूप प्रमेयत्व परस्पर विरोधी होने से एक में दोनों नहीं रह सकते । इस पर समाधान करते हुए सूत्रकार ने कहा—‘प्रमेयता च तुलाप्रामाण्यवत् ।’ यहाँ ‘च’ शब्द का अर्थ ‘अपि’ ( भी ) है । एवञ्च जैसे तुला या तराजू प्रमेय होती हुई भी प्रमाण ( प्रमापक ) होती है । यहाँ भाष्यकार, वार्तिककार ने और भी उदाहरण देते हुए कहा है कि ‘जैसे एक ही वृक्षरूप पदार्थ में अनेक कारकत्व और अनेक कालयोगित्व का व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए । एक में अनेक कालसम्बन्धिता में प्रमाण कारण का कार्यानुगतत्व रूप में अनुभव ही है ।’ इस पर बौद्ध कहता है कि ‘यह ठीक नहीं, अननुगत ही कारण और अनन्वित ही कार्य हैं, क्योंकि क्षणिक पदार्थों में ही कार्य-कारणभाव हुआ करता है । एवञ्च कारण से कार्य अनुगत है, इसमें कोई प्रमाण नहीं ।’ इस पर नैयायिक कहता है कि ‘कारण से अननुगत ही कार्य होता है, इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ बौद्ध इसके उत्तर में कहता है—‘कार्य के ‘कारण से अनुगत होने में भी तो कोई दृष्टान्त नहीं है ।’ इस प्रकार प्रतिबन्दीरूप प्रश्न करने पर उसके समाधान में प्रयुक्त ‘समानमिति अनुत्तरमभ्युपगतत्वात्’ इस सूत्र के व्याख्यान में उद्योतकर ने इस बात को मान लिया है कि मेरे पक्ष में दृष्टान्त नहीं है, अतः स्वमत में दृष्टान्ताभाव को मानकर परपक्ष में दृष्टान्ताभावरूप दोष देनेवाले आपके प्रति मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान प्राप्त हुआ । अर्थात् यहाँ उद्योतकर ने स्पष्ट ही प्रतिबन्दी को दूषक मानकर प्रतिपक्षी को मतानुज्ञा नामक निग्रहस्थान से निगृहीत किया है । अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन प्रश्न—तब क्या प्रतिबन्दी आदि दूषण होते ही नहीं ? ऐसा मानने पर तो आपको अपसिद्धान्त दोष हो जायगा । कारण स्थान-स्थान पर शंकराचार्य प्रभृति ने प्रतिबन्दी को माना ही है । उत्तर—यदि ऐसा है, तो प्रकृत से सम्बद्ध होने के कारण ‘अपसिद्धान्त’ का ही लक्षण बतलाइये । लक्षण न कहकर केवल वचनमात्र से

स्यादिति चेत्; तर्हि दर्शय अपसिद्धान्तस्य लक्षणं प्रकृतसम्बद्धतया । वाङ्मात्रे- णापसिद्धान्ते भवतः किमिति नापसिद्धान्तः स्यात् । सिद्धान्तविपरीताभ्युपगमोऽपसिद्धान्तः । प्रतिबन्द्यादि च भवता सिद्धान्तत्वे- नाभ्युपेतम्, ' मयेदं दर्शनमाश्रित्याभिधेयमि' ति भवता दर्शनविशेषस्याभ्युपेतत्वात् । दर्शनस्य च तत्तत्पदार्थस्वीकारात्मकत्वात्, तेषु च पदार्थेषु प्रतिबन्दीदूषणादेः प्रविष्टत्वादिति चेन्न । लक्षणमेव तावदपसिद्धान्तस्य नोपपद्यते, मत्सिद्धान्तविप- रीतमभ्युपगच्छतो भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गात् । स्वसिद्धान्तस्तथाऽपेक्षित इति चेन्न । विशेषणपूरणमन्तरेण तदलाभात् । अन्यथा सर्वत्र विशेषणोपादानप्रयासवैयर्थ्यं स्यात् । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवाप- सिद्धान्तकृत्या निवृत्त्याऽऽपतेत् , त्वत्सिद्धान्ते शतशो हेत्वादौ विशेषणोपादान- यदि अपसिद्धान्त हो जाता हो, तो आपको ही अपसिद्धान्त क्यों नहीं है ? अर्थात् लक्षणाधीन ही लक्ष्य का ज्ञान होता है, अतः प्रथम अपसिद्धान्त का लक्षण ही कहिये । निर्वचन—'सिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम ( स्वीकार ) अपसिद्धान्त है।' आप प्रतिबन्दी आदि को सिद्धान्तरूप से मानते हैं, कारण 'हम अमुक दर्शन का आश्रयण कर कहेंगे' इस प्रकार कहकर आपने दर्शन ( शास्त्र )-विशेष को मान ही लिया है । दर्शन तत्तत् पदार्थों का स्वीकारात्मक है और उन पदार्थों में प्रतिबन्दी दूषण भी प्रविष्ट है । खण्डन—अपसिद्धान्त का यह लक्षण ही युक्त नहीं, कारण मेरे सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त का अभ्युपगम तो आप भी करते हैं, अतः आपके इस अभ्युपगम में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'स्वसिद्धान्त से विपरीत का अभ्युपगम अपसिद्धान्त है।' दूसरे के सिद्धान्त से विपरीत सिद्धान्त मानने में तो कहीं भी अपसिद्धान्त नहीं होता । खंडन—जबतक 'स्व' का विशेषण रूप से निवेश न हो, तबतक उक्त अर्थ का लाभ ही नहीं होगा । अन्यथा [ यदि विशेषण-प्रवेश के बिना ही विशेषण का लाभ हो जाता हो तो ] सर्वत्र विशेषण के उपादान का प्रयास ही व्यर्थ हो जायगा । क्षण- भर यह मान लें कि विशेषण देने में श्रम व्यर्थ ही है अर्थात् बिना विशेषण दिये ही सर्वत्र विशेषण का लाभ हो जाता है, तो अपसिद्धान्तरूप कृत्या लौटकर आप पर ही आ गिरेगी, कारण आपके शास्त्र में शतशः हेतु आदि में विशेषणों का उपादान

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ३६६ दर्शनात् । परसिद्धान्तहेतूनाञ्च अनुपात्तविशेषणानामनैकान्तिकीकृत्य त्वच्छास्त्रे बहुशो दूषितत्वात् । प्रथमं स्वशब्दं विशेषणमनुपादाय दूषणभयेनेदानीं तत्करणे च हेत्वन्तरं नाम निग्रहस्थानं भवतः । हेत्वन्तरं हि प्रथममविशेषणं साधकभागमभिधाय पश्चाद्विशेषणवत्तद्वचनम् । किञ्चैवं लक्षणमभिधानस्य भवतोऽप्राप्तकालतापातः । अप्राप्तकालोऽवयव- विपर्यास इति । लक्ष्यमभिधाय हि लक्षणाभिधानं युक्तम्, तस्य च भवता विपर्यासः कृतः । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवापसिद्धान्तापातात् । यस्तु प्रथमत एव स्वेतिविशेषणमुपादत्ते, तं प्रत्यनुपात्तविशेषणपक्षाभिहितो दोषो वक्तव्यः । मदीयो हि सिद्धान्तः स्वसिद्धान्त एव मम । अत्र वाक्येऽभ्युपगमपदश्रवणादभ्युपगन्ता लभ्यते, तस्य यः स्वकीयः स स्व- शब्दार्थः पर्यवस्यतीति चेन्न । ममाभ्युपगन्तृत्वात्, मयापि हि किञ्चिदभ्युपगम्यत एव । देखा जाता है तथा विशेषणरहित जो परसिद्धान्त के हेतु हैं, उन्हें आपके शास्त्र में शतशः अनैकान्तिक दोष से दूषित किया गया है । पहले स्वशब्दरूप विशेषण न देकर दूषण के भय से बाद में वह विशेषण दें, तो हेत्वन्तररूप निग्रहस्थान हो जायगा । 'प्रथम विशेषणरहित साधक भाग का अभिधान कर पीछे विशेषणयुक्त साधन का कथन' हेत्वन्तर है । किञ्च—'सिद्धान्त-विपरीताभ्युपगम अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करनेवाले आपके मत में 'अप्राप्तकालता' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । देखिये—अप्राप्तकाल 'अवयव का विपर्यास' है । लक्ष्य का अभिधान करके ही लक्षण का अभिधान करना उचित होता है, किन्तु आपने उसका विपर्यास किया है । यदि आप अप्राप्तकालता को दोष न मानें, तो आपको ही अपसिद्धान्त हो जायगा । जो वादी प्रथम ही स्व-विशेषण देकर लक्षण का उपादान करते हैं, उनके प्रति भी स्वपद के अनुपादान पक्ष का दोष कहना चाहिए, कारण मेरा सिद्धान्त भी मेरा स्वसिद्धान्त ही है और उसके विपरीत का आप अभ्युपगम करते हैं । अतः आपका अभ्युपगम भी अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—इस वाक्य में 'अभ्युपगम' पद का श्रवण है, अतः अभ्युपगन्ता का भी लाभ होता है । उसका जो स्वकीय हो वही यहाँ 'स्व' शब्द का अर्थ होगा । खण्डन—मैं भी अभ्युपगन्ता ही हूँ, कारण मैं भी कुछ तो मानता ही हूँ ।

विपरीताभ्युपगन्ताऽपेक्षित इति चेन्न । अविशेषात् । सिद्धान्तविपरीताऽभ्युपगन्ता विपरीताभ्युपगन्तेति चेन्न । तथाप्यविशेषात्, ममापि त्वत्सिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्तृत्वात् । स्वसिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्ता तथाऽपेक्षित इति चेन्न । नूनमतिप्राज्ञोऽसि, यत् स्वपदमभ्युपगन्त्रा विशेषयितुं प्रवृत्तोऽभ्युपगन्तारमेव स्वपदद्वारा विशेषयसि, परस्पराश्रयादपि न बिभेषि, स्वपदेऽपि साधारण्यप्रत्यवस्थानं परोक्तं पुनस्तद- वस्थमेवेति च न प्रतिसन्धत्से । यस्य यः सिद्धान्तस्तेन तत्परित्यागोऽपसिद्धान्तस्तदीय इति चेत् । मैवम्; यस्य यः सिद्धान्त इति पुरुषव्यक्तिविशेषसिद्धान्तव्यक्तिविशेषपरत्वे असाधा- रण्यादव्यापकत्वं लक्षणदोषः । यस्येति सिद्धान्तसम्बन्धिन इत्यर्थे तेनेति सिद्धान्तसम्बन्धिनेत्यर्थे च भवतोऽपसिद्धान्तात् । तथाहि—सिद्धान्तसम्बन्धिनो मम यः सिद्धान्तः, तस्य सिद्धान्तान्तरसम्बन्धिना भवता त्यागोऽस्त्येव । समर्थन—विपरीत का अभ्युपगन्ता स्वशब्द का अपेक्षित अर्थ है। खण्डन— इसमें भी कुछ विशेष नहीं है, कारण मैं भी आपके विपरीत का अभ्युपगन्ता ही हूँ । समर्थन—सिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन—तब भी कुछ विशेष नहीं हुआ, कारण हम भी आपके सिद्धान्त के विपरीत के अभ्युपगन्ता हैं ही। समर्थन—स्वसिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन— निश्चय ही आप अति बुद्धिमान् हैं, कारण स्वपद को अभ्युपगन्ता से विशिष्ट करने के लिए प्रवृत्त होकर अभ्युपगन्ता को ही स्वपद से विशिष्ट करते हैं और अन्योन्याश्रय से नहीं डरते । अभ्युपगन्ता के विशेषण स्वशब्द में भी परोक्त प्रश्न वैसा ही है, इसका भी ध्यान नहीं करते । समर्थन—'जिसका जो सिद्धान्त हो, उसका उसके द्वारा त्याग अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यहाँ । 'यत्-तत्' शब्द पुरुष-व्यक्ति के विशेष-सिद्धान्त व्यक्तिविशेष का यदि ग्रहण करें, तो असाधारण ( एकव्यक्तिवृत्ति ) होने से जिस व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'यत्-तत्' शब्द को सिद्धान्तसम्बन्धीपरक मानें, तो आप पर ही अपसिद्धान्त हो जायगा। देखिये—सिद्धान्तसम्बन्धी मेरा जो सिद्धान्त, उसका अन्य सिद्धान्त- सम्बन्धी आप द्वारा त्याग है ही।

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०१ त्याग एव तस्य नास्ति, मया परिगृहीतविषयत्वात् त्यागस्येति चेन्न । यदि त्यागोऽस्वीकारस्तदा न परिगृहीतविषयतानियमः । अथ स्वीकृतस्यास्वीकार- स्तदा मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारो भवत्येव तथेति विशेषो नास्ति । अथ तेनैव स्वीकृतस्य तेनैवास्वीकारः । सोऽपि न; तेनेति स्वीकृत्यर्थे ममापि स्वीकृतृत्वेन मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारे तवापसिद्धान्तापातः । एकेनैकस्य स्वीकृतस्यास्वीकारोऽपसिद्धान्त इति चेन्न । एकेनेति यद्येकसङ्ख्या- योगिनेति, तदा मम यथैकसङ्ख्यायोगित्वं तथा तवापीति स एवापसिद्धान्ता- पातः । अथैकेनेति अभिन्नेनेति; तथापि स्वस्मादभिन्नत्वं तव च मम च समानम् । अन्यस्मादभिन्नत्वं न मम, न वा तवेत्यपसिद्धान्तविषयोच्छेदः । अथ स्वीकृतु- रस्त्वीकर्तृ तो न भिन्नत्वं तदाऽयमर्थः स्यात् —'स्वीकर्तृ तो न भिन्नेनैकस्य स्वीकृत- स्यास्वीकारोऽपसिद्धान्तः।' तथाच स एव भवतोऽपसिद्धान्तः, मया यदीयाङ्गी- समर्थन—हमारे द्वारा आपके सिद्धान्त का त्याग ही नहीं है, कारण परिगृहीत का ही त्याग होता है और हमने उसका ग्रहण ही कहाँ किया है ? खण्डन—यदि त्याग शब्द का अस्वीकार अर्थ है, तो स्वीकृत का ही त्याग होता है, यह नियम नहीं रहा । यदि स्वीकृत का अस्वीकार ही त्याग है, तब भी कोई हानि नहीं, कारण मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार भी त्याग है ही । अतः इस कथन से भी कोई विशेष लाभ नहीं । समर्थन—'उसके द्वारा स्वीकृत का उसीके द्वारा अस्वीकार त्याग है', अतः यह दोष नहीं है । खण्डन—यहाँ तद्-शब्द का स्वीकर्ता अर्थ मानें, तो मैं भी स्वीकर्ता हूँ । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार होने से आपका पुनः अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—'एक व्यक्ति द्वारा एक के स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'एक' शब्द का यदि एकत्वसंख्यायोगी अर्थ करें, तो जैसे हम एकत्वसंख्या से युक्त हैं, वैसे ही आप भी एकत्वयोगी हैं । अतः आप पर भी वही अपसिद्धान्त है । यदि एक शब्द का अभिन्न अर्थ करें, तो भी 'स्व' से अभिन्न आप भी हैं और हम भी । अन्य से अभिन्नत्व न हममें है, न आपमें ही । अतः अपसिद्धान्त के विषय का ही उच्छेद हो जायगा । यदि स्वीकर्ता में अस्वीकर्ता से अभिन्नत्व की विवक्षा करें, तो यह अर्थ हुआ कि 'स्वीकर्ता से अभिन्न एक द्वारा स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है,' तो वही अपसिद्धान्त आपके प्रति हुआ । देखिये—मैंने ५१

कारः किञ्चित्स्वीकर्तुरभिन्नस्य भवतस्तदीयास्वीकर्तृत्वात् । एतेन—एकस्यैकेन स्वीकारास्वीकारावपसिद्धान्त इत्यपास्तम् । मिलितयो- रेवाऽऽवयोरपसिद्धान्तापातात् । अथ तत्स्वीकर्तुरेव तदस्वीकर्तुरभिन्नत्वमेकशब्देनाभिमतम्; तदाऽपि यदि स्वीकारविषयाभिन्नत्वं तच्छब्देनोच्यते अस्वीकारविषयस्य, तदा स्वीकर्त्रन्तरस्वीकार- विषयस्य भवता किञ्चित्स्वीकर्त्रभिन्नेनास्वीकारविषयतया स्वीकारकर्तृविषया- भिन्नत्वस्वीकारेण भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् । एकेन स्वीकर्त्रा, न तु भिन्नेन स्वीकारास्वीकारौ विवक्षिताविति चेन्न । एकेन स्वीकर्त्रेत्येतदेव विवेचयन् भूयस्तदेवाऽऽकर्षन्नभिहितदूषणगणाव्यावृत्त्यापत्त्या जिसका अङ्गीकार किया है, कुछ स्वीकार करने वाले आप द्वारा उसका अस्वीकार है ही । समर्थन—'एक वस्तु का एक पुरुष द्वारा स्वीकार-अस्वीकार दोनों मिलकर अप- सिद्धान्त है।' खण्डन—मिलित हम दोनों के प्रति अपसिद्धान्त हो जायगा । अर्थात् दोनों एक संख्यायोगी होने से एक हैं । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का तुम्हारे द्वारा अस्वीकार करने पर भी स्वीकारों के एकनिष्ठ होने से दोनों को अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—तत्स्वीकर्ता से तदस्वीकर्ता का अभेद एक शब्द का अर्थ है। खंडन— 'तत्' शब्द से यदि अस्वीकार के विषय से स्वीकार के विषय का अभिन्नत्व अभिप्रेत है, तो स्वीकर्ता के अन्य स्वीकार का विषय ( अनिर्वचनीयत्व आदि ) भी कुछ स्वीकार करनेवाले से अभिन्न आपके अस्वीकार का विषय होने से स्वीकर्ता के स्वीकार के विषय में अभिन्नत्व है, अतः आपके प्रति अपसिद्धान्त दुर्वार है। समर्थन—'एक स्वीकर्त्ता द्वारा ( भिन्न से नहीं ) जो स्वीकार-अस्वीकार है, वह अपसिद्धान्त है।' खण्डन—'एकेन स्वीकर्त्रा' इसका विचार करते हुए आप फिर भी उसी एक 'अभिन्न' शब्द का आकर्षण करते हैं, अर्थात् निरस्त विशेषण का पुनः उपादान करते हैं । एवञ्च कथित दूषण-समूहों की व्यावृत्ति न होने से कहिये, आप सान्द्र वर्षाकाल के आगमन से प्रादुर्भूत चञ्चलतर तरंगोंवाली नदी की धारा की जलवृद्धि से उत्पन्न भँवरों ( भ्रमि-समूहों ) से बुरी तरह फेके जानेवाले तृणसमूह की विडम्बना का अनुभव क्यों न करेंगे ? सारांश यह कि 'एकेन स्वीकर्त्रा' यहाँ 'एकत्वसंख्यायोगित्व क्या है ?' इसके विवेचन के लिए प्रवृत्त आप उसका निर्वचन किये बिना ही पुनः 'एकेन' यह विशेषण देते हैं, तो वह उचित नहीं है । कारण

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०३ कथय कथं न घनघनाघनसमय-समागमोदीयमान-तरलतरतरङ्गिणीवेणिजलविवर्त- निर्वर्तितावर्तचक्रचङ्क्रम्यमाण-तृणकदम्वविडम्बनामनुभविष्यसि । स्वीकृत्यास्वीकारः स इति चेन्न । क्त्वार्थविवेचनेन उक्तबाधापातात् , अस्वीकृत्य स्वीकारे च तदभावापत्तेः । किञ्च—सिद्धान्तपरित्यक्तरि यदपसिद्धान्तोद्भावनं तत् किं स्वीकृतदर्शनानु- मतापसिद्धान्तदूषणाभावे वादिनि, उतानेवम्भूते । आद्ये पूर्वसिद्धान्तवदपसिद्धान्ते- ऽप्यनेन व्युत्थातुं शक्यते तत्र किं वक्तव्यम् ? न तावन्न वक्तव्यमेव किञ्चित् पूर्वसिद्धान्तत्यागादेवापसिद्धान्तेन निगृहीतत्वा- दिति युक्तम्; अपसिद्धान्ते तत्परिहारस्य तद्दूषणत्वान्यतरासिद्धेस्तेनाभिहितत्वात् । एक-शब्द का निर्वचन सिद्ध होने पर ही विशिष्ट लक्षण सिद्ध होगा । उसके सिद्ध होने पर उक्त अतिप्रसंग का परिहार सिद्ध होगा और वह सिद्ध होने पर एकवचन का निर्वचन सिद्ध हो सकेगा, इस तरह चक्रक हो जायगा । समर्थन—'स्वीकृत्य ( स्वीकार करके ) अस्वीकार अपसिद्धान्त है ।' खण्डन— यह भी अयुक्त है, कारण 'क्त्वा' का अर्थ एककर्तृकत्व भी है । अतः एक शब्द के अर्थ का विवेचन करने पर पुनः उक्त दोष आ ही जायेंगे । सिवा इसके शब्द नित्यत्ववादी पहले उसे अनित्य न मानता हुआ भी बाद में मान लें, तो उस अपसिद्धान्त में अव्याप्ति हो जायगी । कारण 'स्वीकृत्य' यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय का अर्थ स्वीकारपूर्वक अस्वीकार ही अर्थ होता है और वैसा अस्वीकार वहाँ नहीं है । किञ्च—सिद्धान्त को त्यागनेवाले वादी के प्रति आप जो अपसिद्धान्त देते हैं, वह किस वादी के प्रति, क्या जिसके दर्शन (शास्त्र) में अपसिद्धान्त दूषण मान्य है, उसके प्रति या जिसके दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण अनुमंत नहीं है, उसके प्रति ? प्रथम पक्ष में वह वादी पूर्व-सिद्धान्त के तुल्य अपसिद्धान्त का भी अस्वीकार कर सकता है, वहाँ आप क्या कहेंगे ? समर्थन—वहाँ कुछ नहीं कहेंगे, कारण पूर्वसिद्धान्त के त्यागने से अपसिद्धान्त- रूप निग्रहस्थान से ही वह निगृहीत ( पराजित ) है । मृत का मारण अयुक्त ही है । खंडन—यदि वह अपसिद्धान्त दूषण को स्वीकार करता, तो अपसिद्धान्त से निगृहीत अवश्य होता । किन्तु वह अपसिद्धांत को निग्रहस्थान मानता ही नहीं, अतः उसने अप- सिद्धांत-दूषण का अस्वीकाररूप परिहार या अपसिद्धांत का परिहार इन दोनों में से

४०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय अन्यथा स्वाभिप्रायेणासिद्धिमुद्भाव्यैव कथं विच्छिन्दानो विजयेत परासिद्धिपरिहारं नापेक्षेतेति अनसिद्धावप्यसिद्धिमुद्भाव्य परं पराजित्याप्रत्यूहं गृहान् प्रतिष्ठेत । निगृहीतस्य तस्यापरमभिधानमनादरणीयमेवेति चेन्न । अन्यतरासिद्ध्या निग्रहपरिहारस्यैव तेनाभिधीयमानत्वात् । तथाऽप्यनादरगोऽनसिद्धावसिद्धिमुद्भाव्य पराभिधीयमानमसिद्धिपरिहारमनादृत्य विजयेतैवेत्युक्तम् । अथ मन्यसे—मध्यस्थेनैतद्विचारणीयं किमनसिद्धावनेनासिद्धिरुक्ता, अनप- सिद्धान्ते वाऽपसिद्धान्तः । एतद्विचार्य तेनैव जयपराजयोवधारणीयौ । तदर्थमेव मध्यस्थोपस्थापनमिति । न; तर्हि वादिना साधनेऽभिहिते दुष्टमेतदित्यभिधायैव प्रतिवादिना निवर्तनीयम् । मध्यस्थस्तु परमार्थतो दुष्टत्वमदुष्टत्वं वा तस्य साधनस्य विचार्य जयपराजयोवधारयिष्यति । सोऽयं प्रसूय निर्वृत्तीभूतपिकदाम्पत्यापत्य- अपसिद्धान्त-दूषण का अस्वीकाररूप अपसिद्धान्त का परिहार कर ही दिया, फिर वह निगृहीत कैसे होगा ? अन्यथा ( यदि अपसिद्धांत को स्वीकार न करके भी अपसिद्धांत से निगृहीत हो तो ) अपने अभिप्राय से रचित असिद्ध का उद्भावन कर कथा का विच्छेद करनेवाला भी विजय प्राप्त कर सकता है । वह वादी-कृत असिद्ध-परिहार की अपेक्षा भी नहीं करेगा । अतः वह जहाँ असिद्ध नहीं है, वहाँ भी असिद्ध का उद्भावन कर वादी को पराजित मानकर निर्विघ्न अपने घर प्रस्थान करेगा। समर्थन—वह हार गया है, अतः उसका बाद में कुछ कहना आदरणीय ही न होगा । खण्डन—उसने अपसिद्धान्त का अस्वीकार कर उसीका परिहार किया है, वह हारा नहीं है । फिर भी यदि उसके वचन का आदर न करे, तो जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ भी असिद्धि का उद्भावन कर प्रतिवादी द्वारा किये गये असिद्धि- परिहार का आदर न करते हुए विजय का लाभ कर लें । समर्थन—मध्यस्थ को यह विचारना चाहिए कि जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ यह असिद्धि उद्भावित हुई है; जहाँ अपसिद्धान्त नहीं है, वहाँ यह अपसिद्धान्त उद्भावित हुआ है और इस प्रकार विचारकर उसीको जय-पराजय की व्यवस्था करनी चाहिए । इसीलिए तो वाद में मध्यस्थ होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो वादी द्वारा साधन (हेतु) कहने पर प्रतिवादी को 'यह दुष्ट है' इतना ही कहकर निवृत्त हो जाना चाहिए, कारण मध्यस्थ ही उस साधन के परमार्थतः दुष्टत्व या अदुष्टत्व का विचारकर जय-पराजय की व्यवस्था कर लेगा । तुम्हारी ऐसी कुत्सित मन्त्रणा से बेचारा

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०५ पोषणकृतमहायासवायसव्यसनं समासादयिष्यति मध्यस्थो वराकस्तावकदुष्परा- मर्शप्रकर्षेण । अथोच्यते—सम्प्रति विप्रतिपद्यतां नामापसिद्धान्तेऽप्यसौ किमेतावता, पूर्वं स्वीकृतापसिद्धान्तदूषणभावस्य दर्शनस्य तावत्तेन स्वीकरणमकारि। तदेवाऽऽदा- यापसिद्धान्तोपन्यासो युक्त इति । मैवम्; यदीदानीन्तन्त्यननुमतिरस्य नाद्रियते, अस्यामुपजातायामपि प्राक्तनानुमतिमादायैव च दूषणप्रवृत्तिस्तदाऽपसिद्धान्तस्यापि कुतोऽवकाशः। स हि पूर्वानुमतस्येदानीमननुमतिमाश्रित्यैव प्रवर्तते, नान्यथा । तस्मात् स्वीकृता- प्रसिद्धान्तदूषणभावमपि वादिनं प्रति विप्रतिपत्तिकाल साधनीयमपसिद्धान्तस्य दोषत्वमिति द्वितीयानवकाशः। यस्य तु सौगतादेर्मतेऽपसिद्धान्तो न दूषणं तं प्रत्यवश्यं साधनीयमेवास्य दूषणत्वम् । न च वाच्यं योऽपसिद्धान्ते विप्रतिपत्तिं करोति तं प्रति व्याघात एवाभि- मध्यस्थ स्वयं उत्पन्न कर निवृत्त हुए कोकिल के अपत्य के पालन में महान् परिश्रम करनेवाले काक के दुःख को पायेगा। समर्थन—सम्प्रति वह अपसिद्धान्त को न मानता हो, तो उससे हानि क्या हुई, जिस दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण स्वीकृत है, उस दर्शन का तो वह स्वीकार करता ही है। इसीसे उस पर अपसिद्धान्तरूप निग्रह का उपन्यास हो सकता है। खण्डन—यदि प्रतिवादी की वर्तमानकालिक अनुमति के अभाव का आदर न करें, अर्थात् वर्तमान काल में अस्वीकार होने पर भी भूतकालिक स्वीकार का ग्रहण करके ही दूषण की प्रवृत्ति हो, तो अपसिद्धान्त ही कैसे होगा, कारण वह पूर्वानुमत का ही वर्तमान काल में अस्वीकार करता है, अन्यथा नहीं करता और वर्तमान अस्वीकार का आप आदर ही करते नहीं। तस्मात् जो वादी अपसिद्धान्त-दूषण को स्वीकार न करता हो, उसके प्रति विप्रतिपत्ति-काल में अपसिद्धान्त-दूषण का साधन अवश्य करना होगा। अतः इस विषय में मध्यस्थ का अवकाश ही नहीं। अर्थात् अपसिद्धान्त है या नहीं, इसका निर्णय मध्यस्थ करेगा, इत्यादि आपका कथन युक्त नहीं है। साथ ही सौगत आदि अपसिद्धान्त को दूषण न मानें, तो उनके प्रति भी अपसिद्धान्त दूषण का साधन करना होगा। समर्थन—जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करते हों, उनके प्रति व्याघात का ही

४०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ द्वितीय ध्येयः, दर्शनविशेषं स्वीकुर्वता प्रथमं तद्दर्शनान्तर्निवेशिनः प्रतिबन्दीदूषणत्वादेस्तेन स्वीकारात्, पश्चात्तस्यैवास्वीकारः। तावेतौ स्वीकारास्वीकारावेकेनैकस्य व्याहताविति । यद्ययमपसिद्धान्तात्मैव व्याघातः, तदाऽपसिद्धान्तदूषणत्वेऽपि विप्रतिपन्नस्य विप्रतिपत्तिमभ्युदस्य नाभिधातुं युक्तः । अथ दूषणान्तरमयं व्याघातोऽपसिद्धान्त- मनुपजीव्य सम्भाव्यमानोद्भावनस्तदा सार्वत्रिकापसिद्धान्तोदाहरणेऽयमेवास्तु, किमपसिद्धान्तस्य दूषणत्वाङ्गीकारेण । किञ्चैवमपसिद्धान्त उद्भाविते पश्चात्तद्विप्रतिपत्तौ उपजातायामपसिद्धान्त- मुपेक्ष्य व्याघातलक्षणस्यास्य दोषान्तरस्याभिधाने प्रतिज्ञाहान्यापत्तेः । प्रतिज्ञाहानिः स्वीकृतोक्तत्याग इति । एवं प्रथमं किञ्चिद्दूषणमुक्त्वा तत्परिहारिणि दूषणान्तरा- भिधाने न प्रतिज्ञाहानिरिति गतं प्रतिज्ञाहान्यादिभिर्निग्रहैः ! प्राक् प्रतिज्ञातदोषनिर्वाहार्थमेव निग्रहान्तरकथनान्नैष दोष इति चेन्न । पूर्व- अभिधान करना चाहिए। देखिये—दर्शन (शास्त्र) के विषय के स्वीकर्ता वादी ने उस दर्शन के अन्तर्गत प्रतिबन्दी दूषण का प्रथम स्वीकार किया हो और पीछे वह उसका अस्वीकार करे, यह तो एक से एक का स्वीकार-अस्वीकार व्याहत है। खंडन—यदि व्याघात अपसिद्धान्तरूप ही है, तो जो अपसिद्धान्त को नहीं मानता, उसके प्रति अपसिद्धान्त का साधन न कर व्याघात का भी अभिधान नहीं कर सकते, कारण जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपन्न है, वह तद्रूप व्याघात में भी विप्रतिपन्न ही है। अतः उसके प्रति व्याघात का अभिधान कैसे हो सकता है ? यदि अपसिद्धान्त की अपेक्षा न रखकर जिसके उद्भावन की सम्भावना हो, ऐसा व्याघात दूषणान्तर है, तो सर्वत्र अपसिद्धान्त के उदाहरण में उसीका उद्भावन करना चाहिए, अपसिद्धान्त व्यर्थ है। किञ्च—इस प्रकार अपसिद्धान्त का उद्भावन होने पर पीछे अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करने पर उस विप्रतिपत्ति का निरास न कर अपसिद्धान्त की उपेक्षा करते हुए यदि व्याघात का उद्भावन करें, तो प्रतिज्ञाहानि भी हो जायगी । स्वीकृत उक्त का परित्याग ही प्रतिज्ञाहानि है । इस प्रकार पहले किसी दूषण का कथन करें और फिर उसे त्यागकर अन्य दूषण का अभिधान करने पर भी यदि प्रतिज्ञाहानि न हो, तो कहीं भी प्रतिज्ञाहान्यादि न होने से वे (प्रतिज्ञाहान्यादि) सर्वथा व्यर्थ हो जायेंगे । समर्थन—प्रथम प्रतिज्ञात दोष के निर्वाहार्थ ही अन्य निग्रह का कथन किया है, अतः प्रतिज्ञाहानि नहीं होगी । खण्डन—यदि पूर्वनिग्रह अपसिद्धान्त का परिहार

४०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय तत्र कश्चिदाह—शास्त्रमनाश्रित्य कथारम्भानुपपत्तिः । यदा हि क्षणभङ्गसाधन- नप्रयोक्ता अस्फूर्तिमता स्थिरवादिना सिद्धसाधनमुद्भाव्य निगृह्यते तदा किं कुर्यात् । प्रथमविप्रतिपत्तिविरोधमुद्भावयेदिति चेत्; एवं तर्हि विप्रतिपत्त्यनुगुणप्रमेया- न्तरव्यतिक्रममप्युद्भावयेदेव । अन्यथा विप्रतिपत्तिव्यतिक्रममप्युपेक्षेत, न खलु तत्तदनुगुणव्यतिक्रमयोर्विरोधापत्तिं प्रति कश्चिद्विशेषः । न चैकपुरुषार्थानुगुणाङ्गाङ्गिभावव्यवस्थितपदार्थजातव्युत्पादनादन्यच्छास्त्रं विवेचन करने की सामर्थ्य न होने से उत्पन्न होने के साथ ही सिद्धान्त-विशेष का अवलम्बन न करनेवाले प्राणी को किस दुर्मति ने ये तत्तत् सिद्धान्त प्राप्त कराये ? अर्थात् कोई सिद्धान्त किसीका 'अपना सिद्धान्त' नहीं होता । फिर उसे त्यागने पर उसे अपसिद्धान्त कैसे कहा जाय ? अर्थात् आरंभ से रीते ही जन्मे व्यक्ति को बाद में सिद्धान्त-विशेष में रोकना भी दुर्मति ही है । यहाँ 'सिद्धान्तविषयग्रहाः' यह रूपक है । अर्थात् विषय याने ग्राम आदि जैसे राजा द्वारा किसीको प्राप्त होते हैं, वैसे सिद्धान्त किसी को प्राप्त नहीं होते, यह भाव है । समर्थन—यहाँ कोई ( श्रीउदयनाचार्य ) कहते हैं कि शास्त्र का आश्रयण न कर कथा का आरम्भ ही नहीं हो सकता । कारण जिस काल में क्षणभङ्ग के साधक अनुमान ( 'यत् सत् तत्क्षणिकम्, यथा जलधराः, सन्तश्चामी भावाः' ) प्रयोक्ता स्फूर्ति- रहित, स्थिरवादी नैयायिक द्वारा सिद्धसाधन का उद्भावन कर निगृहीत किया जाय, तो वह क्या करे ? क्षणिकत्व मानने से अपसिद्धान्त होगा, ऐसा वह कह नहीं सकता, क्योंकि अपसिद्धान्त को वह मानता ही नहीं ? यदि कहें कि प्रथम विप्रतिपत्ति ( 'विमतं क्षणिकम् अक्षणिकं वा' ) के विषय क्षणिकत्व का स्वीकार करने से वह व्याघात ही का उद्भावन करेगा, तब तो वह विप्रतिपत्ति के विषय के साधक अन्य प्रमेय ( प्रत्यभिज्ञा ) आदि के अस्वीकार का भी उद्भावन करेगा ही । कारण स्थिरवादी प्रत्यभिज्ञा का स्वीकार करता है, अतः उसे व्याघात होता है । यदि इस व्याघात के होते हुए भी उसका उद्भावन न करे, तो विप्रतिपत्ति के विषय स्थिरत्व के स्वीकार-अस्वीकाररूप व्याघात का भी उद्भावन नहीं करेगा, दोनों के उद्भावन में कोई विशेष नहीं है । एक पुरुषार्थ—( स्वर्ग या अपवर्ग ) के साधक उपकार्य-उपकारकभाव से युक्त पदार्थ-समूह का कथन ही शास्त्र है, इससे अन्य शास्त्र नहीं है । तस्मात् जो

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०६ नाम । तस्मात् क्षणिकत्वस्वीकारे तदनुगुणापोहादिसमस्तस्वीकारः, तदेकपरिहारे वा समस्ततदनुगुणपरिहार इति सर्वज्ञोऽपि नान्यथा प्रमातुं क्षमः । न च समस्ततदनुगुणपदार्थजातं कथारम्भे स्वशब्देनाभिधातुमुचितम्, तदैव शास्त्रप्रणयनप्रसङ्गात् , परिषदनपेक्षितत्वाच्च । न च तद्व्यतिक्रमोद्भावनाय समस्ततदनुगुणोहः परस्परस्य शास्त्रमनाश्रित्य शक्यः । न च तत्तदनुगुण- व्यतिक्रमे तदुपेक्षे वा तत्त्वप्रतिपत्तिजयाविति अकामेनापि तदधिकारप्रवृत्तं शास्त्रमेवाऽऽश्रयणीयमिति । तदेतदपेशलम् ; किं तदनुगुणं प्रमेयान्तरं यदनभ्युपगमे विरोधमुद्भावयेदि- त्युच्यते । द्वयमभ्युपगम्यं सम्भवति । एकं तावद्यदनभ्युपगमे कथैव प्रवर्तयितुमश- क्या, यथा प्रमाणादि सर्वकथकसिद्धम् । इतरत्तु प्रतिदर्शनसिद्धं किञ्चित्, यथा क्षणभङ्गेश्वरादि । तत्र यदि प्रथममभ्युपगम्यैव कथाप्रवृत्तिरिति तत्स्वीकारे क्षणिकत्व का स्वीकार करता हो, वह क्षणिकत्व के अनुगुण अपोह आदि सभीका स्वीकार करेगा । यदि वह एक क्षणिकत्व का अस्वीकार करेगा, तो उसके अनुगुण समस्त अपोहादि का भी अस्वीकार करना पड़ेगा । इसके अन्यथाकरण में परमेश्वर भी समर्थ नहीं है । क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि सम्पूर्ण पदार्थों का कथाकाल में अभिधान नहीं हो सकता, कारण यदि सम्पूर्ण पदार्थों का उसी काल में अभिधान करें, तो उसी काल में शास्त्र का प्रणयन हो जायगा। फिर सम्पूर्ण के अभिधान को परिषद् चाहती भी नहीं है । विरोध के उद्भावन के लिए सम्पूर्ण तदनुगुण की ऊहा शास्त्र के आश्रयण के बिना हो भी नहीं सकती और क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि का विरोध होने पर क्षणिकवादी का और अपोहादि व्यतिक्रम की उपेक्षा करने पर स्थिरवादी का तत्त्वनिर्णय या विजय हो ही नहीं सकती । अतः न चाहते हुए भी क्षणिकत्वादि के साधन में प्रवृत्त शास्त्र अवश्य मानना होगा । खंडन—यह मत सुन्दर नहीं है । कहिये, तदनुगुण अन्य प्रमेय कौन हैं, जिनके अनभ्युपगम में अपसिद्धान्त का उद्भावन हम करेंगे—ऐसा आप कहते हैं । कथा में दो ही बातें स्वीकार्य होती हैं । एक तो यह, जिसके अनभ्युपगम से कथा की प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । जैसे—सब कथकों द्वारा सिद्ध प्रमाणादि । दूसरी प्रति- दर्शन से सिद्ध कुछ; जैसे क्षणभङ्ग, ईश्वर आदि । उनमें प्रथम प्रमाणादि के स्वीकार करने ५२

४१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय

पश्चात्तदनङ्गीकारोऽपसिद्धान्तः । तन्न ; स्वव्याघातकत्वेन तस्य भवद्भिरेव जातित्वाङ्गीकारात् । जातेश्च निरनुयोज्यानुयोगे निवेशात् । नापि द्वितीयः ; दर्शनभेदनियतं हि क्षणभङ्गादि यत्कथारम्भेऽभ्युपगन्तव्यं तत् किं तदभ्युपगमस्य प्रकृतसाध्यापोहाद्युपायतया, उत तन्नान्तरीकतया ? न प्रथमः ; क्षणभङ्गसाधनप्रस्तावे अपोहादि परित्यजतः सौगतस्यापसिद्धान्ताभावापत्तेः, तदभ्युपगमस्य तदनुपायत्वात् । अन्योन्याभ्युपगमोपायत्वे चान्योन्यविचारस्य निष्पत्तिरेव न स्यात् , विचारे सति प्रामाणिकत्वप्रतीतौ तदभ्युपगमः तदनभ्युपगमे च विचार इति । अभ्युपगतोपायत्यागविषय एवायमपसिद्धान्तो नान्यत्रेति चेन्न । यो हि यदुपायस्तमभ्युपगम्य विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव कुतः ? तस्योपायतया तेन विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव युक्तम् , न तु तदभ्युपगमोऽपि तावता तदुपायः स्यात् । तस्य च तदभ्युपगमस्य च पृथक्कारणत्वाभ्युपगमे प्रमाणस्योपदर्शयितु- पर ही कथा की प्रवृत्ति होती है, अतः उनको स्वीकार कर बाद में उनका अनङ्गीकार अपसिद्धान्त कहें, तो वह युक्त नहीं । कारण स्वव्याघातक होने से उसे आप ही जाति मानते हैं और जाति का निरनुयोज्यानुयोगरूप निग्रहस्थान में निवेश है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण दर्शन-विशेष में नियत क्षणभङ्गादि का जो कथा के आरम्भ में स्वीकार किया जाय, क्या वह इसलिए कि क्षणभङ्गादि का अभ्युपगम, प्रकृत साध्य अपोहादि के साधन का उपाय है या अपोह के नान्तरीयक ( व्याप्य ) होने से ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण क्षणभङ्ग के साधन की अवस्था में अपोहादि के त्यागनेवाले बौद्ध को अपसिद्धान्त नहीं होगा । अपोह का अभ्युपगम क्षणभङ्ग के साधन का उपाय नहीं है । अन्योन्य के अभ्युपगम को अन्योन्य का उपाय मानें, तो अन्योन्य के विचारों की निष्पत्ति ही नहीं होगी; कारण विचार होने पर प्रामाणिकत्व की प्रतीति होने पर अन्योन्य का अभ्युपगम होगा और अभ्युपगम होने पर विचार, इस तरह अन्योन्याश्रय है । समर्थन—अन्योन्य का अभ्युपगम स्वसूत्रकार के प्रामाण्य से होता है, विचार से नहीं, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खंडन—जो जिसका उपाय है, उसे मानकर ही विचार की प्रवृत्ति करनी चाहिए, यह कैसे हो सकता है । वह उपाय है, इसलिए उसीसे विचार करना चाहिए, यही युक्त है । एतावता उपाय का अभ्युपगम भी उसका उपाय

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४११ मशक्यत्वात् । शक्यत्वेऽपि वा तत्रापि स्वाभ्युपगमः किमित्यभ्युपेयो वैयर्थ्यात्, उपायत्वादेव परस्य तथा प्रतीत्युपपत्तेः । अथोच्यते—उपेयमुपायेन साधयता उपेयवदुपायस्यापि सत्त्वमुपगन्तव्य- मिति । पश्चात्तदनुपगमेऽपसिद्धान्तोपन्यासः सावकाशः, असत उपायत्वानुपपत्तेः । तद्ध्युपायत्वेनोपन्यसनात् तत्सत्त्वाभ्युपगमः, तस्य साक्षादश्रुतोऽप्यसत्त्वेनाभ्यु- गम्यमानस्य उपायत्वस्वीकारानुपपत्त्या कल्पनीयः । कल्पितेन तेन श्रूयमाण- तत्सत्त्वानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोऽभिधेयः । एवञ्च सति सत्त्वानभ्युपगम एवोपायत्वानुपपत्तिप्रसङ्गो दूषणमुच्यतामुपजीव्यत्वात् , तदुपन्यासमन्तरेणाश्रूय- माणतदीयाभ्युपगमस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् कृतं तदुपजीविना पश्चात्तनेन अपसिद्धान्तेन । अत एव न द्वितीयः ; तन्नान्तरीयकाभ्युपगमोऽपि हि तत्सत्त्वानभ्युपगमे नहीं होगा, कारण उपाय और उपाय का अभ्युपगम दोनों की पृथक्-पृथक् कारणता में कोई प्रमाण नहीं दिखा सकते । उपाय के स्वीकार की कारणता में कोई प्रमाण दिखा सकें, तब भी उपाय का स्वीकार हम करें—यह व्यर्थ है, क्यों करें ? उपाय होने से ही वादी उसे मान लेगा । समर्थन—कारण से कार्य का साधन करनेवाला कार्य के तुल्य कारण की सत्ता भी अवश्य मानेगा । बाद में उसके न मानने पर वहाँ अपसिद्धान्त का अवकाश रहेगा ही, क्योंकि सर्वथा असत् कभी कारण ही नहीं होता । खण्डन—तब तो आप यही कहेंगे न कि असत्त्वरूप से स्वीकृत कारण नहीं होता और उसका कारणत्वरूप से कथन है; अतः कारणत्व की अनुपपत्ति से साक्षात् अश्रुत भी कारण को स्वीकार करना पड़ेगा । तथाच कल्पित कारण के स्वीकार से श्रूयमाण अस्वीकार का विरोध होने के कारण अपसिद्धान्त हो जायगा । यदि ऐसा ही है, तो सत्त्व का अस्वीकार होने पर कारणत्व की अनुपपत्ति को ही दूषण मानिये, क्योंकि अनुपपत्ति के कथन के बिना अश्रुत कारण का स्वीकार दिखा नहीं सकते । अतः वह ( अनुपपत्ति ) उपजीव्य है । एवञ्च अनुपपत्ति से जनित, पीछे होनेवाले अपसिद्धान्त का उद्भावन व्यर्थ है । ‘प्रकृत साध्य अपोह क्षणिकत्व का नान्तरीयक ( व्याप्य ) है, अतः उसके सत्त्व से क्षणिकत्व का अभ्युपगम है’ यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण क्षणिकत्व के सत्त्व का स्वीकार न करें, तो प्रकृत साध्य अपोह का अभाव हो जायगा । अतः

साध्यस्याभावापच्याऽनुमन्तव्यः । तथाच सैव दूषणमस्त्वनभ्युपगमे, कृतं तयाऽभ्यु- पगमं परिकल्प्य तेनानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोपन्यासेनेति । एवं निग्रहान्तरखण्डनमूहनीयम् । इति कवितार्किकचक्रवर्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये निग्रहानिरुक्तिर्नाम द्वितीयः परिच्छेदः

अपोह से व्यापक क्षणिकत्व का स्वीकार किया जाता है । तब तो व्यापक क्षणिकत्व के स्वीकार के अभाव में व्याप्य के सत्त्व की अनुपपत्ति ही दोष मानिये । उससे कल्पित क्षणिकत्व के स्वीकार से श्रुत क्षणिकत्व के अस्वीकार का विरोध होने से अपसिद्धान्त का कथन व्यर्थ है । इसी प्रकार अन्य निग्रहस्थानों का खण्डन भी स्वयं कर लेना चाहिए । द्वितीय परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त

अथ तृतीयः परिच्छेदः सर्वनामार्थ-खण्डनम् अथ यान्यवलम्ब्य बहुलं वाग्व्यवहारास्तेषां सर्वनाम्नामर्थाः कथं निर्वाच्याः । तथाहि—ईश्वरसद्भावे किं प्रमाणमिति ब्रुवाणः प्रतिवक्तव्यः, किं शब्दोऽयमाक्षे- पार्थो वा, कुत्सितार्थो वा, वितर्कार्थो वा प्रश्नार्थो वा स्यात् ? तत्र यदि प्रथमः पक्षः; तदेश्वरसद्भावे नास्ति प्रमाणमित्युक्तं स्यात् । तथाच सति न प्रतिज्ञामात्रा- त्साध्यसिद्धिरिति हेत्वादिकं वाच्यं भवति । तच्च भवता नाभ्यधायि, तस्मात् न्यूनत्वं दोषः । अत एव न द्वितीयः; ईश्वरसद्भावे कुत्सितं प्रमाणमित्यस्यापि प्रतिज्ञा- मात्रत्वात् । अपिच—साध्यासाधकत्वाद्। तत् कुत्स्यते भवता, अन्यथा वा ? अन्यथा चेदलं तदुद्भावनया, साध्यसिद्धेरप्रत्यूहत्वात् । नापि प्रथमः ; प्रमाणञ्च साध्यसा- धकञ्चेति व्याघातात् । सर्वनामार्थ का खंडन जिन सर्वनामों का अवलम्बनकर बहुत-से व्यवहार होते हैं, उनका क्या अर्थ है ? देखिये—'ईश्वरे किं प्रमाणम्' इस प्रश्न के कर्त्ता से पूछना चाहिए कि यहाँ किम्-शब्द का अर्थ निषेध है, कुत्सा है, वितर्क है या प्रश्न ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण प्रथम पक्ष में 'ईश्वर-सद्भाव में प्रमाण नहीं है' यह अर्थ हुआ । पर वह ठीक नहीं, क्योंकि प्रतिज्ञामात्र से साध्य की सिद्धि नहीं होती । अतः कुछ हेतु तो कहना ही होगा और उसे आपने कहा नहीं है, जिससे न्यूनत्व दोष हो जायगा । इसीलिए द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण 'ईश्वर में कुत्सित प्रमाण है' यह भी प्रतिज्ञामात्र है । किञ्च—आप प्रमाण की जो कुत्सा ( निन्दा ) करते हैं, वह उसके साध्य के असाधक होने से या अन्य किसी कारण से ? यदि अन्य किसी कारण करते हों, तो उसका उद्भावन व्यर्थ है, क्योंकि उसके बिना भी साध्य की सिद्धि हो ही जाती है । प्रथम कल्प भी युक्त नहीं है, कारण साध्य का असाधक हो और प्रमाण भी हो, यह वचन परस्पर व्याहत है ।

४१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ तृतीय गौणोऽयं प्रमाणशब्द इति चेन्न । प्रमाणत्वयोगिनि यद्ययं प्रमाणशब्द- प्रयोगस्तदा गौणत्वव्याघातो मुख्यत्वात् । अथ प्रमाणाभासे, तदा अलं तदुद्भावनया । ईश्वरसद्भावे यः प्रमाणाभासः कुत्सित इत्यत्र परस्यापि सम्प्रतिपन्नत्वात् । ईश्वरसद्भाव इति च विशेषोपादानं व्यर्थं स्यात्, अन्यत्रापि हि विषये प्रमाणाभासः कुत्सित एव, साध्यासाधकत्वात् । नापि तृतीयः ; तथा सति हि वितर्कस्य पक्षान्तरसापेक्षत्वेन पक्षान्तरमपि वचनीयं भवति—ईश्वरसद्भावे किमेतत् प्रमाणमुत अन्यदिति । तच्च भवता नाभ्यधायि, ततो न्यूनत्वं दोषः । नापि चतुर्थः; प्रश्नार्थात् खलु किंशब्दात्कस्यचित् पदार्थस्य जिज्ञास्यमानता प्रतीयते । सा चेह प्रमाणपदसमभिव्याहारात् प्रमाणविषयिणी प्रतीयते । यद्विषयश्च प्रश्नस्तदुत्तरवादिनाऽभिधेयम् । तदयं प्रश्न ईश्वरसद्भावे प्रमाण- सामान्यविषयस्तद्विशेषविषयो वाऽभिप्रेतः ? आद्यश्चेत् ; ईश्वरसद्भावे प्रमाणमित्ये- समर्थन—यहाँ 'प्रमाण' शब्द गौण है । खंडन—यदि प्रमाण में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग हो, तो उसे गौण कहना व्याहत है, क्योंकि वह मुख्य ही हुआ। यदि प्रमाणा- भास में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग है, तो उसमें कुत्सितत्व का उद्भावन व्यर्थ है, कारण ईश्वर में जो प्रमाणाभास है वह कुत्सित है, यह प्रतिवादी भी मानता है । किञ्च—'ईश्वरसद्भाव'रूप विषय-विशेष का कथन व्यर्थ हो जायगा, कारण अन्य विषयों में भी साध्य का असाधक होने से प्रमाणाभास कुत्सित है ही । इसीलिए तृतीय पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण वितर्क अन्य पक्ष में सापेक्ष होने से उसे भी कहना चाहिए । अर्थात् 'ईश्वर-सद्भाव में यह प्रमाण है या यह ?' ऐसा कहना चाहिए । किन्तु आपने वैसा नहीं कहा, अतः न्यूनत्व दोष हो जायगा । चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं, कारण प्रश्नार्थक किम्-शब्द से किसी पदार्थ की जिज्ञासा प्रतीत होती है । प्रकृत में प्रमाण पद का सन्निधान होने से वह जिज्ञासा प्रमाणविषयक प्रतीत होती है । साथ ही जिस विषय में प्रश्न हो, उत्तरवादी को उसी- को कहना चाहिए। ऐसी स्थिति में यह पूछा जा सकता है कि क्या ईश्वर-सद्भाव में यह जो प्रश्न है, वह प्रमाणसामान्यविषयक है या प्रमाण-विशेषविषयक ? यदि प्रथम पक्ष है, तो 'ईश्वरसद्भावे प्रमाणम्' यही उत्तर ठीक है, कारण जिस विषय में