भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ३६६ दर्शनात् । परसिद्धान्तहेतूनाञ्च अनुपात्तविशेषणानामनैकान्तिकीकृत्य त्वच्छास्त्रे बहुशो दूषितत्वात् । प्रथमं स्वशब्दं विशेषणमनुपादाय दूषणभयेनेदानीं तत्करणे च हेत्वन्तरं नाम निग्रहस्थानं भवतः । हेत्वन्तरं हि प्रथममविशेषणं साधकभागमभिधाय पश्चाद्विशेषणवत्तद्वचनम् । किञ्चैवं लक्षणमभिधानस्य भवतोऽप्राप्तकालतापातः । अप्राप्तकालोऽवयव- विपर्यास इति । लक्ष्यमभिधाय हि लक्षणाभिधानं युक्तम्, तस्य च भवता विपर्यासः कृतः । एवमेवाभ्युपगमे भवत एवापसिद्धान्तापातात् । यस्तु प्रथमत एव स्वेतिविशेषणमुपादत्ते, तं प्रत्यनुपात्तविशेषणपक्षाभिहितो दोषो वक्तव्यः । मदीयो हि सिद्धान्तः स्वसिद्धान्त एव मम । अत्र वाक्येऽभ्युपगमपदश्रवणादभ्युपगन्ता लभ्यते, तस्य यः स्वकीयः स स्व- शब्दार्थः पर्यवस्यतीति चेन्न । ममाभ्युपगन्तृत्वात्, मयापि हि किञ्चिदभ्युपगम्यत एव । देखा जाता है तथा विशेषणरहित जो परसिद्धान्त के हेतु हैं, उन्हें आपके शास्त्र में शतशः अनैकान्तिक दोष से दूषित किया गया है । पहले स्वशब्दरूप विशेषण न देकर दूषण के भय से बाद में वह विशेषण दें, तो हेत्वन्तररूप निग्रहस्थान हो जायगा । 'प्रथम विशेषणरहित साधक भाग का अभिधान कर पीछे विशेषणयुक्त साधन का कथन' हेत्वन्तर है । किञ्च—'सिद्धान्त-विपरीताभ्युपगम अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करनेवाले आपके मत में 'अप्राप्तकालता' नामक निग्रहस्थान हो जायगा । देखिये—अप्राप्तकाल 'अवयव का विपर्यास' है । लक्ष्य का अभिधान करके ही लक्षण का अभिधान करना उचित होता है, किन्तु आपने उसका विपर्यास किया है । यदि आप अप्राप्तकालता को दोष न मानें, तो आपको ही अपसिद्धान्त हो जायगा । जो वादी प्रथम ही स्व-विशेषण देकर लक्षण का उपादान करते हैं, उनके प्रति भी स्वपद के अनुपादान पक्ष का दोष कहना चाहिए, कारण मेरा सिद्धान्त भी मेरा स्वसिद्धान्त ही है और उसके विपरीत का आप अभ्युपगम करते हैं । अतः आपका अभ्युपगम भी अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—इस वाक्य में 'अभ्युपगम' पद का श्रवण है, अतः अभ्युपगन्ता का भी लाभ होता है । उसका जो स्वकीय हो वही यहाँ 'स्व' शब्द का अर्थ होगा । खण्डन—मैं भी अभ्युपगन्ता ही हूँ, कारण मैं भी कुछ तो मानता ही हूँ ।