भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

विपरीताभ्युपगन्ताऽपेक्षित इति चेन्न । अविशेषात् । सिद्धान्तविपरीताऽभ्युपगन्ता विपरीताभ्युपगन्तेति चेन्न । तथाप्यविशेषात्, ममापि त्वत्सिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्तृत्वात् । स्वसिद्धान्तविपरीताभ्युपगन्ता तथाऽपेक्षित इति चेन्न । नूनमतिप्राज्ञोऽसि, यत् स्वपदमभ्युपगन्त्रा विशेषयितुं प्रवृत्तोऽभ्युपगन्तारमेव स्वपदद्वारा विशेषयसि, परस्पराश्रयादपि न बिभेषि, स्वपदेऽपि साधारण्यप्रत्यवस्थानं परोक्तं पुनस्तद- वस्थमेवेति च न प्रतिसन्धत्से । यस्य यः सिद्धान्तस्तेन तत्परित्यागोऽपसिद्धान्तस्तदीय इति चेत् । मैवम्; यस्य यः सिद्धान्त इति पुरुषव्यक्तिविशेषसिद्धान्तव्यक्तिविशेषपरत्वे असाधा- रण्यादव्यापकत्वं लक्षणदोषः । यस्येति सिद्धान्तसम्बन्धिन इत्यर्थे तेनेति सिद्धान्तसम्बन्धिनेत्यर्थे च भवतोऽपसिद्धान्तात् । तथाहि—सिद्धान्तसम्बन्धिनो मम यः सिद्धान्तः, तस्य सिद्धान्तान्तरसम्बन्धिना भवता त्यागोऽस्त्येव । समर्थन—विपरीत का अभ्युपगन्ता स्वशब्द का अपेक्षित अर्थ है। खण्डन— इसमें भी कुछ विशेष नहीं है, कारण मैं भी आपके विपरीत का अभ्युपगन्ता ही हूँ । समर्थन—सिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन—तब भी कुछ विशेष नहीं हुआ, कारण हम भी आपके सिद्धान्त के विपरीत के अभ्युपगन्ता हैं ही। समर्थन—स्वसिद्धान्त के विपरीत का अभ्युपगन्ता स्व-शब्द का अर्थ है। खण्डन— निश्चय ही आप अति बुद्धिमान् हैं, कारण स्वपद को अभ्युपगन्ता से विशिष्ट करने के लिए प्रवृत्त होकर अभ्युपगन्ता को ही स्वपद से विशिष्ट करते हैं और अन्योन्याश्रय से नहीं डरते । अभ्युपगन्ता के विशेषण स्वशब्द में भी परोक्त प्रश्न वैसा ही है, इसका भी ध्यान नहीं करते । समर्थन—'जिसका जो सिद्धान्त हो, उसका उसके द्वारा त्याग अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यहाँ । 'यत्-तत्' शब्द पुरुष-व्यक्ति के विशेष-सिद्धान्त व्यक्तिविशेष का यदि ग्रहण करें, तो असाधारण ( एकव्यक्तिवृत्ति ) होने से जिस व्यक्ति का यत् शब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्यत्र लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'यत्-तत्' शब्द को सिद्धान्तसम्बन्धीपरक मानें, तो आप पर ही अपसिद्धान्त हो जायगा। देखिये—सिद्धान्तसम्बन्धी मेरा जो सिद्धान्त, उसका अन्य सिद्धान्त- सम्बन्धी आप द्वारा त्याग है ही।