खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०१ त्याग एव तस्य नास्ति, मया परिगृहीतविषयत्वात् त्यागस्येति चेन्न । यदि त्यागोऽस्वीकारस्तदा न परिगृहीतविषयतानियमः । अथ स्वीकृतस्यास्वीकार- स्तदा मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारो भवत्येव तथेति विशेषो नास्ति । अथ तेनैव स्वीकृतस्य तेनैवास्वीकारः । सोऽपि न; तेनेति स्वीकृत्यर्थे ममापि स्वीकृतृत्वेन मया स्वीकृतस्य भवताऽस्वीकारे तवापसिद्धान्तापातः । एकेनैकस्य स्वीकृतस्यास्वीकारोऽपसिद्धान्त इति चेन्न । एकेनेति यद्येकसङ्ख्या- योगिनेति, तदा मम यथैकसङ्ख्यायोगित्वं तथा तवापीति स एवापसिद्धान्ता- पातः । अथैकेनेति अभिन्नेनेति; तथापि स्वस्मादभिन्नत्वं तव च मम च समानम् । अन्यस्मादभिन्नत्वं न मम, न वा तवेत्यपसिद्धान्तविषयोच्छेदः । अथ स्वीकृतु- रस्त्वीकर्तृ तो न भिन्नत्वं तदाऽयमर्थः स्यात् —'स्वीकर्तृ तो न भिन्नेनैकस्य स्वीकृत- स्यास्वीकारोऽपसिद्धान्तः।' तथाच स एव भवतोऽपसिद्धान्तः, मया यदीयाङ्गी- समर्थन—हमारे द्वारा आपके सिद्धान्त का त्याग ही नहीं है, कारण परिगृहीत का ही त्याग होता है और हमने उसका ग्रहण ही कहाँ किया है ? खण्डन—यदि त्याग शब्द का अस्वीकार अर्थ है, तो स्वीकृत का ही त्याग होता है, यह नियम नहीं रहा । यदि स्वीकृत का अस्वीकार ही त्याग है, तब भी कोई हानि नहीं, कारण मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार भी त्याग है ही । अतः इस कथन से भी कोई विशेष लाभ नहीं । समर्थन—'उसके द्वारा स्वीकृत का उसीके द्वारा अस्वीकार त्याग है', अतः यह दोष नहीं है । खण्डन—यहाँ तद्-शब्द का स्वीकर्ता अर्थ मानें, तो मैं भी स्वीकर्ता हूँ । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का आप द्वारा अस्वीकार होने से आपका पुनः अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—'एक व्यक्ति द्वारा एक के स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—'एक' शब्द का यदि एकत्वसंख्यायोगी अर्थ करें, तो जैसे हम एकत्वसंख्या से युक्त हैं, वैसे ही आप भी एकत्वयोगी हैं । अतः आप पर भी वही अपसिद्धान्त है । यदि एक शब्द का अभिन्न अर्थ करें, तो भी 'स्व' से अभिन्न आप भी हैं और हम भी । अन्य से अभिन्नत्व न हममें है, न आपमें ही । अतः अपसिद्धान्त के विषय का ही उच्छेद हो जायगा । यदि स्वीकर्ता में अस्वीकर्ता से अभिन्नत्व की विवक्षा करें, तो यह अर्थ हुआ कि 'स्वीकर्ता से अभिन्न एक द्वारा स्वीकृत का अस्वीकार अपसिद्धान्त है,' तो वही अपसिद्धान्त आपके प्रति हुआ । देखिये—मैंने ५१