भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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कारः किञ्चित्स्वीकर्तुरभिन्नस्य भवतस्तदीयास्वीकर्तृत्वात् । एतेन—एकस्यैकेन स्वीकारास्वीकारावपसिद्धान्त इत्यपास्तम् । मिलितयो- रेवाऽऽवयोरपसिद्धान्तापातात् । अथ तत्स्वीकर्तुरेव तदस्वीकर्तुरभिन्नत्वमेकशब्देनाभिमतम्; तदाऽपि यदि स्वीकारविषयाभिन्नत्वं तच्छब्देनोच्यते अस्वीकारविषयस्य, तदा स्वीकर्त्रन्तरस्वीकार- विषयस्य भवता किञ्चित्स्वीकर्त्रभिन्नेनास्वीकारविषयतया स्वीकारकर्तृविषया- भिन्नत्वस्वीकारेण भवतोऽपसिद्धान्तप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् । एकेन स्वीकर्त्रा, न तु भिन्नेन स्वीकारास्वीकारौ विवक्षिताविति चेन्न । एकेन स्वीकर्त्रेत्येतदेव विवेचयन् भूयस्तदेवाऽऽकर्षन्नभिहितदूषणगणाव्यावृत्त्यापत्त्या जिसका अङ्गीकार किया है, कुछ स्वीकार करने वाले आप द्वारा उसका अस्वीकार है ही । समर्थन—'एक वस्तु का एक पुरुष द्वारा स्वीकार-अस्वीकार दोनों मिलकर अप- सिद्धान्त है।' खण्डन—मिलित हम दोनों के प्रति अपसिद्धान्त हो जायगा । अर्थात् दोनों एक संख्यायोगी होने से एक हैं । अतः मेरे द्वारा स्वीकृत का तुम्हारे द्वारा अस्वीकार करने पर भी स्वीकारों के एकनिष्ठ होने से दोनों को अपसिद्धान्त हो जायगा । समर्थन—तत्स्वीकर्ता से तदस्वीकर्ता का अभेद एक शब्द का अर्थ है। खंडन— 'तत्' शब्द से यदि अस्वीकार के विषय से स्वीकार के विषय का अभिन्नत्व अभिप्रेत है, तो स्वीकर्ता के अन्य स्वीकार का विषय ( अनिर्वचनीयत्व आदि ) भी कुछ स्वीकार करनेवाले से अभिन्न आपके अस्वीकार का विषय होने से स्वीकर्ता के स्वीकार के विषय में अभिन्नत्व है, अतः आपके प्रति अपसिद्धान्त दुर्वार है। समर्थन—'एक स्वीकर्त्ता द्वारा ( भिन्न से नहीं ) जो स्वीकार-अस्वीकार है, वह अपसिद्धान्त है।' खण्डन—'एकेन स्वीकर्त्रा' इसका विचार करते हुए आप फिर भी उसी एक 'अभिन्न' शब्द का आकर्षण करते हैं, अर्थात् निरस्त विशेषण का पुनः उपादान करते हैं । एवञ्च कथित दूषण-समूहों की व्यावृत्ति न होने से कहिये, आप सान्द्र वर्षाकाल के आगमन से प्रादुर्भूत चञ्चलतर तरंगोंवाली नदी की धारा की जलवृद्धि से उत्पन्न भँवरों ( भ्रमि-समूहों ) से बुरी तरह फेके जानेवाले तृणसमूह की विडम्बना का अनुभव क्यों न करेंगे ? सारांश यह कि 'एकेन स्वीकर्त्रा' यहाँ 'एकत्वसंख्यायोगित्व क्या है ?' इसके विवेचन के लिए प्रवृत्त आप उसका निर्वचन किये बिना ही पुनः 'एकेन' यह विशेषण देते हैं, तो वह उचित नहीं है । कारण