खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०३ कथय कथं न घनघनाघनसमय-समागमोदीयमान-तरलतरतरङ्गिणीवेणिजलविवर्त- निर्वर्तितावर्तचक्रचङ्क्रम्यमाण-तृणकदम्वविडम्बनामनुभविष्यसि । स्वीकृत्यास्वीकारः स इति चेन्न । क्त्वार्थविवेचनेन उक्तबाधापातात् , अस्वीकृत्य स्वीकारे च तदभावापत्तेः । किञ्च—सिद्धान्तपरित्यक्तरि यदपसिद्धान्तोद्भावनं तत् किं स्वीकृतदर्शनानु- मतापसिद्धान्तदूषणाभावे वादिनि, उतानेवम्भूते । आद्ये पूर्वसिद्धान्तवदपसिद्धान्ते- ऽप्यनेन व्युत्थातुं शक्यते तत्र किं वक्तव्यम् ? न तावन्न वक्तव्यमेव किञ्चित् पूर्वसिद्धान्तत्यागादेवापसिद्धान्तेन निगृहीतत्वा- दिति युक्तम्; अपसिद्धान्ते तत्परिहारस्य तद्दूषणत्वान्यतरासिद्धेस्तेनाभिहितत्वात् । एक-शब्द का निर्वचन सिद्ध होने पर ही विशिष्ट लक्षण सिद्ध होगा । उसके सिद्ध होने पर उक्त अतिप्रसंग का परिहार सिद्ध होगा और वह सिद्ध होने पर एकवचन का निर्वचन सिद्ध हो सकेगा, इस तरह चक्रक हो जायगा । समर्थन—'स्वीकृत्य ( स्वीकार करके ) अस्वीकार अपसिद्धान्त है ।' खण्डन— यह भी अयुक्त है, कारण 'क्त्वा' का अर्थ एककर्तृकत्व भी है । अतः एक शब्द के अर्थ का विवेचन करने पर पुनः उक्त दोष आ ही जायेंगे । सिवा इसके शब्द नित्यत्ववादी पहले उसे अनित्य न मानता हुआ भी बाद में मान लें, तो उस अपसिद्धान्त में अव्याप्ति हो जायगी । कारण 'स्वीकृत्य' यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय का अर्थ स्वीकारपूर्वक अस्वीकार ही अर्थ होता है और वैसा अस्वीकार वहाँ नहीं है । किञ्च—सिद्धान्त को त्यागनेवाले वादी के प्रति आप जो अपसिद्धान्त देते हैं, वह किस वादी के प्रति, क्या जिसके दर्शन (शास्त्र) में अपसिद्धान्त दूषण मान्य है, उसके प्रति या जिसके दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण अनुमंत नहीं है, उसके प्रति ? प्रथम पक्ष में वह वादी पूर्व-सिद्धान्त के तुल्य अपसिद्धान्त का भी अस्वीकार कर सकता है, वहाँ आप क्या कहेंगे ? समर्थन—वहाँ कुछ नहीं कहेंगे, कारण पूर्वसिद्धान्त के त्यागने से अपसिद्धान्त- रूप निग्रहस्थान से ही वह निगृहीत ( पराजित ) है । मृत का मारण अयुक्त ही है । खंडन—यदि वह अपसिद्धान्त दूषण को स्वीकार करता, तो अपसिद्धान्त से निगृहीत अवश्य होता । किन्तु वह अपसिद्धांत को निग्रहस्थान मानता ही नहीं, अतः उसने अप- सिद्धांत-दूषण का अस्वीकाररूप परिहार या अपसिद्धांत का परिहार इन दोनों में से