भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

४०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय अन्यथा स्वाभिप्रायेणासिद्धिमुद्भाव्यैव कथं विच्छिन्दानो विजयेत परासिद्धिपरिहारं नापेक्षेतेति अनसिद्धावप्यसिद्धिमुद्भाव्य परं पराजित्याप्रत्यूहं गृहान् प्रतिष्ठेत । निगृहीतस्य तस्यापरमभिधानमनादरणीयमेवेति चेन्न । अन्यतरासिद्ध्या निग्रहपरिहारस्यैव तेनाभिधीयमानत्वात् । तथाऽप्यनादरगोऽनसिद्धावसिद्धिमुद्भाव्य पराभिधीयमानमसिद्धिपरिहारमनादृत्य विजयेतैवेत्युक्तम् । अथ मन्यसे—मध्यस्थेनैतद्विचारणीयं किमनसिद्धावनेनासिद्धिरुक्ता, अनप- सिद्धान्ते वाऽपसिद्धान्तः । एतद्विचार्य तेनैव जयपराजयोवधारणीयौ । तदर्थमेव मध्यस्थोपस्थापनमिति । न; तर्हि वादिना साधनेऽभिहिते दुष्टमेतदित्यभिधायैव प्रतिवादिना निवर्तनीयम् । मध्यस्थस्तु परमार्थतो दुष्टत्वमदुष्टत्वं वा तस्य साधनस्य विचार्य जयपराजयोवधारयिष्यति । सोऽयं प्रसूय निर्वृत्तीभूतपिकदाम्पत्यापत्य- अपसिद्धान्त-दूषण का अस्वीकाररूप अपसिद्धान्त का परिहार कर ही दिया, फिर वह निगृहीत कैसे होगा ? अन्यथा ( यदि अपसिद्धांत को स्वीकार न करके भी अपसिद्धांत से निगृहीत हो तो ) अपने अभिप्राय से रचित असिद्ध का उद्भावन कर कथा का विच्छेद करनेवाला भी विजय प्राप्त कर सकता है । वह वादी-कृत असिद्ध-परिहार की अपेक्षा भी नहीं करेगा । अतः वह जहाँ असिद्ध नहीं है, वहाँ भी असिद्ध का उद्भावन कर वादी को पराजित मानकर निर्विघ्न अपने घर प्रस्थान करेगा। समर्थन—वह हार गया है, अतः उसका बाद में कुछ कहना आदरणीय ही न होगा । खण्डन—उसने अपसिद्धान्त का अस्वीकार कर उसीका परिहार किया है, वह हारा नहीं है । फिर भी यदि उसके वचन का आदर न करे, तो जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ भी असिद्धि का उद्भावन कर प्रतिवादी द्वारा किये गये असिद्धि- परिहार का आदर न करते हुए विजय का लाभ कर लें । समर्थन—मध्यस्थ को यह विचारना चाहिए कि जहाँ असिद्धि नहीं है, वहाँ यह असिद्धि उद्भावित हुई है; जहाँ अपसिद्धान्त नहीं है, वहाँ यह अपसिद्धान्त उद्भावित हुआ है और इस प्रकार विचारकर उसीको जय-पराजय की व्यवस्था करनी चाहिए । इसीलिए तो वाद में मध्यस्थ होता है । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो वादी द्वारा साधन (हेतु) कहने पर प्रतिवादी को 'यह दुष्ट है' इतना ही कहकर निवृत्त हो जाना चाहिए, कारण मध्यस्थ ही उस साधन के परमार्थतः दुष्टत्व या अदुष्टत्व का विचारकर जय-पराजय की व्यवस्था कर लेगा । तुम्हारी ऐसी कुत्सित मन्त्रणा से बेचारा