भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 425

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०५ पोषणकृतमहायासवायसव्यसनं समासादयिष्यति मध्यस्थो वराकस्तावकदुष्परा- मर्शप्रकर्षेण । अथोच्यते—सम्प्रति विप्रतिपद्यतां नामापसिद्धान्तेऽप्यसौ किमेतावता, पूर्वं स्वीकृतापसिद्धान्तदूषणभावस्य दर्शनस्य तावत्तेन स्वीकरणमकारि। तदेवाऽऽदा- यापसिद्धान्तोपन्यासो युक्त इति । मैवम्; यदीदानीन्तन्त्यननुमतिरस्य नाद्रियते, अस्यामुपजातायामपि प्राक्तनानुमतिमादायैव च दूषणप्रवृत्तिस्तदाऽपसिद्धान्तस्यापि कुतोऽवकाशः। स हि पूर्वानुमतस्येदानीमननुमतिमाश्रित्यैव प्रवर्तते, नान्यथा । तस्मात् स्वीकृता- प्रसिद्धान्तदूषणभावमपि वादिनं प्रति विप्रतिपत्तिकाल साधनीयमपसिद्धान्तस्य दोषत्वमिति द्वितीयानवकाशः। यस्य तु सौगतादेर्मतेऽपसिद्धान्तो न दूषणं तं प्रत्यवश्यं साधनीयमेवास्य दूषणत्वम् । न च वाच्यं योऽपसिद्धान्ते विप्रतिपत्तिं करोति तं प्रति व्याघात एवाभि- मध्यस्थ स्वयं उत्पन्न कर निवृत्त हुए कोकिल के अपत्य के पालन में महान् परिश्रम करनेवाले काक के दुःख को पायेगा। समर्थन—सम्प्रति वह अपसिद्धान्त को न मानता हो, तो उससे हानि क्या हुई, जिस दर्शन में अपसिद्धान्त दूषण स्वीकृत है, उस दर्शन का तो वह स्वीकार करता ही है। इसीसे उस पर अपसिद्धान्तरूप निग्रह का उपन्यास हो सकता है। खण्डन—यदि प्रतिवादी की वर्तमानकालिक अनुमति के अभाव का आदर न करें, अर्थात् वर्तमान काल में अस्वीकार होने पर भी भूतकालिक स्वीकार का ग्रहण करके ही दूषण की प्रवृत्ति हो, तो अपसिद्धान्त ही कैसे होगा, कारण वह पूर्वानुमत का ही वर्तमान काल में अस्वीकार करता है, अन्यथा नहीं करता और वर्तमान अस्वीकार का आप आदर ही करते नहीं। तस्मात् जो वादी अपसिद्धान्त-दूषण को स्वीकार न करता हो, उसके प्रति विप्रतिपत्ति-काल में अपसिद्धान्त-दूषण का साधन अवश्य करना होगा। अतः इस विषय में मध्यस्थ का अवकाश ही नहीं। अर्थात् अपसिद्धान्त है या नहीं, इसका निर्णय मध्यस्थ करेगा, इत्यादि आपका कथन युक्त नहीं है। साथ ही सौगत आदि अपसिद्धान्त को दूषण न मानें, तो उनके प्रति भी अपसिद्धान्त दूषण का साधन करना होगा। समर्थन—जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करते हों, उनके प्रति व्याघात का ही