भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 426

४०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ द्वितीय ध्येयः, दर्शनविशेषं स्वीकुर्वता प्रथमं तद्दर्शनान्तर्निवेशिनः प्रतिबन्दीदूषणत्वादेस्तेन स्वीकारात्, पश्चात्तस्यैवास्वीकारः। तावेतौ स्वीकारास्वीकारावेकेनैकस्य व्याहताविति । यद्ययमपसिद्धान्तात्मैव व्याघातः, तदाऽपसिद्धान्तदूषणत्वेऽपि विप्रतिपन्नस्य विप्रतिपत्तिमभ्युदस्य नाभिधातुं युक्तः । अथ दूषणान्तरमयं व्याघातोऽपसिद्धान्त- मनुपजीव्य सम्भाव्यमानोद्भावनस्तदा सार्वत्रिकापसिद्धान्तोदाहरणेऽयमेवास्तु, किमपसिद्धान्तस्य दूषणत्वाङ्गीकारेण । किञ्चैवमपसिद्धान्त उद्भाविते पश्चात्तद्विप्रतिपत्तौ उपजातायामपसिद्धान्त- मुपेक्ष्य व्याघातलक्षणस्यास्य दोषान्तरस्याभिधाने प्रतिज्ञाहान्यापत्तेः । प्रतिज्ञाहानिः स्वीकृतोक्तत्याग इति । एवं प्रथमं किञ्चिद्दूषणमुक्त्वा तत्परिहारिणि दूषणान्तरा- भिधाने न प्रतिज्ञाहानिरिति गतं प्रतिज्ञाहान्यादिभिर्निग्रहैः ! प्राक् प्रतिज्ञातदोषनिर्वाहार्थमेव निग्रहान्तरकथनान्नैष दोष इति चेन्न । पूर्व- अभिधान करना चाहिए। देखिये—दर्शन (शास्त्र) के विषय के स्वीकर्ता वादी ने उस दर्शन के अन्तर्गत प्रतिबन्दी दूषण का प्रथम स्वीकार किया हो और पीछे वह उसका अस्वीकार करे, यह तो एक से एक का स्वीकार-अस्वीकार व्याहत है। खंडन—यदि व्याघात अपसिद्धान्तरूप ही है, तो जो अपसिद्धान्त को नहीं मानता, उसके प्रति अपसिद्धान्त का साधन न कर व्याघात का भी अभिधान नहीं कर सकते, कारण जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपन्न है, वह तद्रूप व्याघात में भी विप्रतिपन्न ही है। अतः उसके प्रति व्याघात का अभिधान कैसे हो सकता है ? यदि अपसिद्धान्त की अपेक्षा न रखकर जिसके उद्भावन की सम्भावना हो, ऐसा व्याघात दूषणान्तर है, तो सर्वत्र अपसिद्धान्त के उदाहरण में उसीका उद्भावन करना चाहिए, अपसिद्धान्त व्यर्थ है। किञ्च—इस प्रकार अपसिद्धान्त का उद्भावन होने पर पीछे अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करने पर उस विप्रतिपत्ति का निरास न कर अपसिद्धान्त की उपेक्षा करते हुए यदि व्याघात का उद्भावन करें, तो प्रतिज्ञाहानि भी हो जायगी । स्वीकृत उक्त का परित्याग ही प्रतिज्ञाहानि है । इस प्रकार पहले किसी दूषण का कथन करें और फिर उसे त्यागकर अन्य दूषण का अभिधान करने पर भी यदि प्रतिज्ञाहानि न हो, तो कहीं भी प्रतिज्ञाहान्यादि न होने से वे (प्रतिज्ञाहान्यादि) सर्वथा व्यर्थ हो जायेंगे । समर्थन—प्रथम प्रतिज्ञात दोष के निर्वाहार्थ ही अन्य निग्रह का कथन किया है, अतः प्रतिज्ञाहानि नहीं होगी । खण्डन—यदि पूर्वनिग्रह अपसिद्धान्त का परिहार