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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

४०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ द्वितीय ध्येयः, दर्शनविशेषं स्वीकुर्वता प्रथमं तद्दर्शनान्तर्निवेशिनः प्रतिबन्दीदूषणत्वादेस्तेन स्वीकारात्, पश्चात्तस्यैवास्वीकारः। तावेतौ स्वीकारास्वीकारावेकेनैकस्य व्याहताविति । यद्ययमपसिद्धान्तात्मैव व्याघातः, तदाऽपसिद्धान्तदूषणत्वेऽपि विप्रतिपन्नस्य विप्रतिपत्तिमभ्युदस्य नाभिधातुं युक्तः । अथ दूषणान्तरमयं व्याघातोऽपसिद्धान्त- मनुपजीव्य सम्भाव्यमानोद्भावनस्तदा सार्वत्रिकापसिद्धान्तोदाहरणेऽयमेवास्तु, किमपसिद्धान्तस्य दूषणत्वाङ्गीकारेण । किञ्चैवमपसिद्धान्त उद्भाविते पश्चात्तद्विप्रतिपत्तौ उपजातायामपसिद्धान्त- मुपेक्ष्य व्याघातलक्षणस्यास्य दोषान्तरस्याभिधाने प्रतिज्ञाहान्यापत्तेः । प्रतिज्ञाहानिः स्वीकृतोक्तत्याग इति । एवं प्रथमं किञ्चिद्दूषणमुक्त्वा तत्परिहारिणि दूषणान्तरा- भिधाने न प्रतिज्ञाहानिरिति गतं प्रतिज्ञाहान्यादिभिर्निग्रहैः ! प्राक् प्रतिज्ञातदोषनिर्वाहार्थमेव निग्रहान्तरकथनान्नैष दोष इति चेन्न । पूर्व- अभिधान करना चाहिए। देखिये—दर्शन (शास्त्र) के विषय के स्वीकर्ता वादी ने उस दर्शन के अन्तर्गत प्रतिबन्दी दूषण का प्रथम स्वीकार किया हो और पीछे वह उसका अस्वीकार करे, यह तो एक से एक का स्वीकार-अस्वीकार व्याहत है। खंडन—यदि व्याघात अपसिद्धान्तरूप ही है, तो जो अपसिद्धान्त को नहीं मानता, उसके प्रति अपसिद्धान्त का साधन न कर व्याघात का भी अभिधान नहीं कर सकते, कारण जो अपसिद्धान्त में विप्रतिपन्न है, वह तद्रूप व्याघात में भी विप्रतिपन्न ही है। अतः उसके प्रति व्याघात का अभिधान कैसे हो सकता है ? यदि अपसिद्धान्त की अपेक्षा न रखकर जिसके उद्भावन की सम्भावना हो, ऐसा व्याघात दूषणान्तर है, तो सर्वत्र अपसिद्धान्त के उदाहरण में उसीका उद्भावन करना चाहिए, अपसिद्धान्त व्यर्थ है। किञ्च—इस प्रकार अपसिद्धान्त का उद्भावन होने पर पीछे अपसिद्धान्त में विप्रतिपत्ति करने पर उस विप्रतिपत्ति का निरास न कर अपसिद्धान्त की उपेक्षा करते हुए यदि व्याघात का उद्भावन करें, तो प्रतिज्ञाहानि भी हो जायगी । स्वीकृत उक्त का परित्याग ही प्रतिज्ञाहानि है । इस प्रकार पहले किसी दूषण का कथन करें और फिर उसे त्यागकर अन्य दूषण का अभिधान करने पर भी यदि प्रतिज्ञाहानि न हो, तो कहीं भी प्रतिज्ञाहान्यादि न होने से वे (प्रतिज्ञाहान्यादि) सर्वथा व्यर्थ हो जायेंगे । समर्थन—प्रथम प्रतिज्ञात दोष के निर्वाहार्थ ही अन्य निग्रह का कथन किया है, अतः प्रतिज्ञाहानि नहीं होगी । खण्डन—यदि पूर्वनिग्रह अपसिद्धान्त का परिहार

४०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय तत्र कश्चिदाह—शास्त्रमनाश्रित्य कथारम्भानुपपत्तिः । यदा हि क्षणभङ्गसाधन- नप्रयोक्ता अस्फूर्तिमता स्थिरवादिना सिद्धसाधनमुद्भाव्य निगृह्यते तदा किं कुर्यात् । प्रथमविप्रतिपत्तिविरोधमुद्भावयेदिति चेत्; एवं तर्हि विप्रतिपत्त्यनुगुणप्रमेया- न्तरव्यतिक्रममप्युद्भावयेदेव । अन्यथा विप्रतिपत्तिव्यतिक्रममप्युपेक्षेत, न खलु तत्तदनुगुणव्यतिक्रमयोर्विरोधापत्तिं प्रति कश्चिद्विशेषः । न चैकपुरुषार्थानुगुणाङ्गाङ्गिभावव्यवस्थितपदार्थजातव्युत्पादनादन्यच्छास्त्रं विवेचन करने की सामर्थ्य न होने से उत्पन्न होने के साथ ही सिद्धान्त-विशेष का अवलम्बन न करनेवाले प्राणी को किस दुर्मति ने ये तत्तत् सिद्धान्त प्राप्त कराये ? अर्थात् कोई सिद्धान्त किसीका 'अपना सिद्धान्त' नहीं होता । फिर उसे त्यागने पर उसे अपसिद्धान्त कैसे कहा जाय ? अर्थात् आरंभ से रीते ही जन्मे व्यक्ति को बाद में सिद्धान्त-विशेष में रोकना भी दुर्मति ही है । यहाँ 'सिद्धान्तविषयग्रहाः' यह रूपक है । अर्थात् विषय याने ग्राम आदि जैसे राजा द्वारा किसीको प्राप्त होते हैं, वैसे सिद्धान्त किसी को प्राप्त नहीं होते, यह भाव है । समर्थन—यहाँ कोई ( श्रीउदयनाचार्य ) कहते हैं कि शास्त्र का आश्रयण न कर कथा का आरम्भ ही नहीं हो सकता । कारण जिस काल में क्षणभङ्ग के साधक अनुमान ( 'यत् सत् तत्क्षणिकम्, यथा जलधराः, सन्तश्चामी भावाः' ) प्रयोक्ता स्फूर्ति- रहित, स्थिरवादी नैयायिक द्वारा सिद्धसाधन का उद्भावन कर निगृहीत किया जाय, तो वह क्या करे ? क्षणिकत्व मानने से अपसिद्धान्त होगा, ऐसा वह कह नहीं सकता, क्योंकि अपसिद्धान्त को वह मानता ही नहीं ? यदि कहें कि प्रथम विप्रतिपत्ति ( 'विमतं क्षणिकम् अक्षणिकं वा' ) के विषय क्षणिकत्व का स्वीकार करने से वह व्याघात ही का उद्भावन करेगा, तब तो वह विप्रतिपत्ति के विषय के साधक अन्य प्रमेय ( प्रत्यभिज्ञा ) आदि के अस्वीकार का भी उद्भावन करेगा ही । कारण स्थिरवादी प्रत्यभिज्ञा का स्वीकार करता है, अतः उसे व्याघात होता है । यदि इस व्याघात के होते हुए भी उसका उद्भावन न करे, तो विप्रतिपत्ति के विषय स्थिरत्व के स्वीकार-अस्वीकाररूप व्याघात का भी उद्भावन नहीं करेगा, दोनों के उद्भावन में कोई विशेष नहीं है । एक पुरुषार्थ—( स्वर्ग या अपवर्ग ) के साधक उपकार्य-उपकारकभाव से युक्त पदार्थ-समूह का कथन ही शास्त्र है, इससे अन्य शास्त्र नहीं है । तस्मात् जो

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४०६ नाम । तस्मात् क्षणिकत्वस्वीकारे तदनुगुणापोहादिसमस्तस्वीकारः, तदेकपरिहारे वा समस्ततदनुगुणपरिहार इति सर्वज्ञोऽपि नान्यथा प्रमातुं क्षमः । न च समस्ततदनुगुणपदार्थजातं कथारम्भे स्वशब्देनाभिधातुमुचितम्, तदैव शास्त्रप्रणयनप्रसङ्गात् , परिषदनपेक्षितत्वाच्च । न च तद्व्यतिक्रमोद्भावनाय समस्ततदनुगुणोहः परस्परस्य शास्त्रमनाश्रित्य शक्यः । न च तत्तदनुगुण- व्यतिक्रमे तदुपेक्षे वा तत्त्वप्रतिपत्तिजयाविति अकामेनापि तदधिकारप्रवृत्तं शास्त्रमेवाऽऽश्रयणीयमिति । तदेतदपेशलम् ; किं तदनुगुणं प्रमेयान्तरं यदनभ्युपगमे विरोधमुद्भावयेदि- त्युच्यते । द्वयमभ्युपगम्यं सम्भवति । एकं तावद्यदनभ्युपगमे कथैव प्रवर्तयितुमश- क्या, यथा प्रमाणादि सर्वकथकसिद्धम् । इतरत्तु प्रतिदर्शनसिद्धं किञ्चित्, यथा क्षणभङ्गेश्वरादि । तत्र यदि प्रथममभ्युपगम्यैव कथाप्रवृत्तिरिति तत्स्वीकारे क्षणिकत्व का स्वीकार करता हो, वह क्षणिकत्व के अनुगुण अपोह आदि सभीका स्वीकार करेगा । यदि वह एक क्षणिकत्व का अस्वीकार करेगा, तो उसके अनुगुण समस्त अपोहादि का भी अस्वीकार करना पड़ेगा । इसके अन्यथाकरण में परमेश्वर भी समर्थ नहीं है । क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि सम्पूर्ण पदार्थों का कथाकाल में अभिधान नहीं हो सकता, कारण यदि सम्पूर्ण पदार्थों का उसी काल में अभिधान करें, तो उसी काल में शास्त्र का प्रणयन हो जायगा। फिर सम्पूर्ण के अभिधान को परिषद् चाहती भी नहीं है । विरोध के उद्भावन के लिए सम्पूर्ण तदनुगुण की ऊहा शास्त्र के आश्रयण के बिना हो भी नहीं सकती और क्षणिकत्व के अनुगुण अपोहादि का विरोध होने पर क्षणिकवादी का और अपोहादि व्यतिक्रम की उपेक्षा करने पर स्थिरवादी का तत्त्वनिर्णय या विजय हो ही नहीं सकती । अतः न चाहते हुए भी क्षणिकत्वादि के साधन में प्रवृत्त शास्त्र अवश्य मानना होगा । खंडन—यह मत सुन्दर नहीं है । कहिये, तदनुगुण अन्य प्रमेय कौन हैं, जिनके अनभ्युपगम में अपसिद्धान्त का उद्भावन हम करेंगे—ऐसा आप कहते हैं । कथा में दो ही बातें स्वीकार्य होती हैं । एक तो यह, जिसके अनभ्युपगम से कथा की प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । जैसे—सब कथकों द्वारा सिद्ध प्रमाणादि । दूसरी प्रति- दर्शन से सिद्ध कुछ; जैसे क्षणभङ्ग, ईश्वर आदि । उनमें प्रथम प्रमाणादि के स्वीकार करने ५२

४१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय

पश्चात्तदनङ्गीकारोऽपसिद्धान्तः । तन्न ; स्वव्याघातकत्वेन तस्य भवद्भिरेव जातित्वाङ्गीकारात् । जातेश्च निरनुयोज्यानुयोगे निवेशात् । नापि द्वितीयः ; दर्शनभेदनियतं हि क्षणभङ्गादि यत्कथारम्भेऽभ्युपगन्तव्यं तत् किं तदभ्युपगमस्य प्रकृतसाध्यापोहाद्युपायतया, उत तन्नान्तरीकतया ? न प्रथमः ; क्षणभङ्गसाधनप्रस्तावे अपोहादि परित्यजतः सौगतस्यापसिद्धान्ताभावापत्तेः, तदभ्युपगमस्य तदनुपायत्वात् । अन्योन्याभ्युपगमोपायत्वे चान्योन्यविचारस्य निष्पत्तिरेव न स्यात् , विचारे सति प्रामाणिकत्वप्रतीतौ तदभ्युपगमः तदनभ्युपगमे च विचार इति । अभ्युपगतोपायत्यागविषय एवायमपसिद्धान्तो नान्यत्रेति चेन्न । यो हि यदुपायस्तमभ्युपगम्य विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव कुतः ? तस्योपायतया तेन विचारः प्रवर्तयितव्य इत्येव युक्तम् , न तु तदभ्युपगमोऽपि तावता तदुपायः स्यात् । तस्य च तदभ्युपगमस्य च पृथक्कारणत्वाभ्युपगमे प्रमाणस्योपदर्शयितु- पर ही कथा की प्रवृत्ति होती है, अतः उनको स्वीकार कर बाद में उनका अनङ्गीकार अपसिद्धान्त कहें, तो वह युक्त नहीं । कारण स्वव्याघातक होने से उसे आप ही जाति मानते हैं और जाति का निरनुयोज्यानुयोगरूप निग्रहस्थान में निवेश है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण दर्शन-विशेष में नियत क्षणभङ्गादि का जो कथा के आरम्भ में स्वीकार किया जाय, क्या वह इसलिए कि क्षणभङ्गादि का अभ्युपगम, प्रकृत साध्य अपोहादि के साधन का उपाय है या अपोह के नान्तरीयक ( व्याप्य ) होने से ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण क्षणभङ्ग के साधन की अवस्था में अपोहादि के त्यागनेवाले बौद्ध को अपसिद्धान्त नहीं होगा । अपोह का अभ्युपगम क्षणभङ्ग के साधन का उपाय नहीं है । अन्योन्य के अभ्युपगम को अन्योन्य का उपाय मानें, तो अन्योन्य के विचारों की निष्पत्ति ही नहीं होगी; कारण विचार होने पर प्रामाणिकत्व की प्रतीति होने पर अन्योन्य का अभ्युपगम होगा और अभ्युपगम होने पर विचार, इस तरह अन्योन्याश्रय है । समर्थन—अन्योन्य का अभ्युपगम स्वसूत्रकार के प्रामाण्य से होता है, विचार से नहीं, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है । खंडन—जो जिसका उपाय है, उसे मानकर ही विचार की प्रवृत्ति करनी चाहिए, यह कैसे हो सकता है । वह उपाय है, इसलिए उसीसे विचार करना चाहिए, यही युक्त है । एतावता उपाय का अभ्युपगम भी उसका उपाय

परिच्छेद ] अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ४११ मशक्यत्वात् । शक्यत्वेऽपि वा तत्रापि स्वाभ्युपगमः किमित्यभ्युपेयो वैयर्थ्यात्, उपायत्वादेव परस्य तथा प्रतीत्युपपत्तेः । अथोच्यते—उपेयमुपायेन साधयता उपेयवदुपायस्यापि सत्त्वमुपगन्तव्य- मिति । पश्चात्तदनुपगमेऽपसिद्धान्तोपन्यासः सावकाशः, असत उपायत्वानुपपत्तेः । तद्ध्युपायत्वेनोपन्यसनात् तत्सत्त्वाभ्युपगमः, तस्य साक्षादश्रुतोऽप्यसत्त्वेनाभ्यु- गम्यमानस्य उपायत्वस्वीकारानुपपत्त्या कल्पनीयः । कल्पितेन तेन श्रूयमाण- तत्सत्त्वानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोऽभिधेयः । एवञ्च सति सत्त्वानभ्युपगम एवोपायत्वानुपपत्तिप्रसङ्गो दूषणमुच्यतामुपजीव्यत्वात् , तदुपन्यासमन्तरेणाश्रूय- माणतदीयाभ्युपगमस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् कृतं तदुपजीविना पश्चात्तनेन अपसिद्धान्तेन । अत एव न द्वितीयः ; तन्नान्तरीयकाभ्युपगमोऽपि हि तत्सत्त्वानभ्युपगमे नहीं होगा, कारण उपाय और उपाय का अभ्युपगम दोनों की पृथक्-पृथक् कारणता में कोई प्रमाण नहीं दिखा सकते । उपाय के स्वीकार की कारणता में कोई प्रमाण दिखा सकें, तब भी उपाय का स्वीकार हम करें—यह व्यर्थ है, क्यों करें ? उपाय होने से ही वादी उसे मान लेगा । समर्थन—कारण से कार्य का साधन करनेवाला कार्य के तुल्य कारण की सत्ता भी अवश्य मानेगा । बाद में उसके न मानने पर वहाँ अपसिद्धान्त का अवकाश रहेगा ही, क्योंकि सर्वथा असत् कभी कारण ही नहीं होता । खण्डन—तब तो आप यही कहेंगे न कि असत्त्वरूप से स्वीकृत कारण नहीं होता और उसका कारणत्वरूप से कथन है; अतः कारणत्व की अनुपपत्ति से साक्षात् अश्रुत भी कारण को स्वीकार करना पड़ेगा । तथाच कल्पित कारण के स्वीकार से श्रूयमाण अस्वीकार का विरोध होने के कारण अपसिद्धान्त हो जायगा । यदि ऐसा ही है, तो सत्त्व का अस्वीकार होने पर कारणत्व की अनुपपत्ति को ही दूषण मानिये, क्योंकि अनुपपत्ति के कथन के बिना अश्रुत कारण का स्वीकार दिखा नहीं सकते । अतः वह ( अनुपपत्ति ) उपजीव्य है । एवञ्च अनुपपत्ति से जनित, पीछे होनेवाले अपसिद्धान्त का उद्भावन व्यर्थ है । ‘प्रकृत साध्य अपोह क्षणिकत्व का नान्तरीयक ( व्याप्य ) है, अतः उसके सत्त्व से क्षणिकत्व का अभ्युपगम है’ यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण क्षणिकत्व के सत्त्व का स्वीकार न करें, तो प्रकृत साध्य अपोह का अभाव हो जायगा । अतः

साध्यस्याभावापच्याऽनुमन्तव्यः । तथाच सैव दूषणमस्त्वनभ्युपगमे, कृतं तयाऽभ्यु- पगमं परिकल्प्य तेनानभ्युपगमविरोधादपसिद्धान्तोपन्यासेनेति । एवं निग्रहान्तरखण्डनमूहनीयम् । इति कवितार्किकचक्रवर्ति-श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये निग्रहानिरुक्तिर्नाम द्वितीयः परिच्छेदः

अपोह से व्यापक क्षणिकत्व का स्वीकार किया जाता है । तब तो व्यापक क्षणिकत्व के स्वीकार के अभाव में व्याप्य के सत्त्व की अनुपपत्ति ही दोष मानिये । उससे कल्पित क्षणिकत्व के स्वीकार से श्रुत क्षणिकत्व के अस्वीकार का विरोध होने से अपसिद्धान्त का कथन व्यर्थ है । इसी प्रकार अन्य निग्रहस्थानों का खण्डन भी स्वयं कर लेना चाहिए । द्वितीय परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त

अथ तृतीयः परिच्छेदः सर्वनामार्थ-खण्डनम् अथ यान्यवलम्ब्य बहुलं वाग्व्यवहारास्तेषां सर्वनाम्नामर्थाः कथं निर्वाच्याः । तथाहि—ईश्वरसद्भावे किं प्रमाणमिति ब्रुवाणः प्रतिवक्तव्यः, किं शब्दोऽयमाक्षे- पार्थो वा, कुत्सितार्थो वा, वितर्कार्थो वा प्रश्नार्थो वा स्यात् ? तत्र यदि प्रथमः पक्षः; तदेश्वरसद्भावे नास्ति प्रमाणमित्युक्तं स्यात् । तथाच सति न प्रतिज्ञामात्रा- त्साध्यसिद्धिरिति हेत्वादिकं वाच्यं भवति । तच्च भवता नाभ्यधायि, तस्मात् न्यूनत्वं दोषः । अत एव न द्वितीयः; ईश्वरसद्भावे कुत्सितं प्रमाणमित्यस्यापि प्रतिज्ञा- मात्रत्वात् । अपिच—साध्यासाधकत्वाद्। तत् कुत्स्यते भवता, अन्यथा वा ? अन्यथा चेदलं तदुद्भावनया, साध्यसिद्धेरप्रत्यूहत्वात् । नापि प्रथमः ; प्रमाणञ्च साध्यसा- धकञ्चेति व्याघातात् । सर्वनामार्थ का खंडन जिन सर्वनामों का अवलम्बनकर बहुत-से व्यवहार होते हैं, उनका क्या अर्थ है ? देखिये—'ईश्वरे किं प्रमाणम्' इस प्रश्न के कर्त्ता से पूछना चाहिए कि यहाँ किम्-शब्द का अर्थ निषेध है, कुत्सा है, वितर्क है या प्रश्न ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण प्रथम पक्ष में 'ईश्वर-सद्भाव में प्रमाण नहीं है' यह अर्थ हुआ । पर वह ठीक नहीं, क्योंकि प्रतिज्ञामात्र से साध्य की सिद्धि नहीं होती । अतः कुछ हेतु तो कहना ही होगा और उसे आपने कहा नहीं है, जिससे न्यूनत्व दोष हो जायगा । इसीलिए द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण 'ईश्वर में कुत्सित प्रमाण है' यह भी प्रतिज्ञामात्र है । किञ्च—आप प्रमाण की जो कुत्सा ( निन्दा ) करते हैं, वह उसके साध्य के असाधक होने से या अन्य किसी कारण से ? यदि अन्य किसी कारण करते हों, तो उसका उद्भावन व्यर्थ है, क्योंकि उसके बिना भी साध्य की सिद्धि हो ही जाती है । प्रथम कल्प भी युक्त नहीं है, कारण साध्य का असाधक हो और प्रमाण भी हो, यह वचन परस्पर व्याहत है ।

४१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ तृतीय गौणोऽयं प्रमाणशब्द इति चेन्न । प्रमाणत्वयोगिनि यद्ययं प्रमाणशब्द- प्रयोगस्तदा गौणत्वव्याघातो मुख्यत्वात् । अथ प्रमाणाभासे, तदा अलं तदुद्भावनया । ईश्वरसद्भावे यः प्रमाणाभासः कुत्सित इत्यत्र परस्यापि सम्प्रतिपन्नत्वात् । ईश्वरसद्भाव इति च विशेषोपादानं व्यर्थं स्यात्, अन्यत्रापि हि विषये प्रमाणाभासः कुत्सित एव, साध्यासाधकत्वात् । नापि तृतीयः ; तथा सति हि वितर्कस्य पक्षान्तरसापेक्षत्वेन पक्षान्तरमपि वचनीयं भवति—ईश्वरसद्भावे किमेतत् प्रमाणमुत अन्यदिति । तच्च भवता नाभ्यधायि, ततो न्यूनत्वं दोषः । नापि चतुर्थः; प्रश्नार्थात् खलु किंशब्दात्कस्यचित् पदार्थस्य जिज्ञास्यमानता प्रतीयते । सा चेह प्रमाणपदसमभिव्याहारात् प्रमाणविषयिणी प्रतीयते । यद्विषयश्च प्रश्नस्तदुत्तरवादिनाऽभिधेयम् । तदयं प्रश्न ईश्वरसद्भावे प्रमाण- सामान्यविषयस्तद्विशेषविषयो वाऽभिप्रेतः ? आद्यश्चेत् ; ईश्वरसद्भावे प्रमाणमित्ये- समर्थन—यहाँ 'प्रमाण' शब्द गौण है । खंडन—यदि प्रमाण में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग हो, तो उसे गौण कहना व्याहत है, क्योंकि वह मुख्य ही हुआ। यदि प्रमाणा- भास में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग है, तो उसमें कुत्सितत्व का उद्भावन व्यर्थ है, कारण ईश्वर में जो प्रमाणाभास है वह कुत्सित है, यह प्रतिवादी भी मानता है । किञ्च—'ईश्वरसद्भाव'रूप विषय-विशेष का कथन व्यर्थ हो जायगा, कारण अन्य विषयों में भी साध्य का असाधक होने से प्रमाणाभास कुत्सित है ही । इसीलिए तृतीय पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण वितर्क अन्य पक्ष में सापेक्ष होने से उसे भी कहना चाहिए । अर्थात् 'ईश्वर-सद्भाव में यह प्रमाण है या यह ?' ऐसा कहना चाहिए । किन्तु आपने वैसा नहीं कहा, अतः न्यूनत्व दोष हो जायगा । चतुर्थ पक्ष भी युक्त नहीं, कारण प्रश्नार्थक किम्-शब्द से किसी पदार्थ की जिज्ञासा प्रतीत होती है । प्रकृत में प्रमाण पद का सन्निधान होने से वह जिज्ञासा प्रमाणविषयक प्रतीत होती है । साथ ही जिस विषय में प्रश्न हो, उत्तरवादी को उसी- को कहना चाहिए। ऐसी स्थिति में यह पूछा जा सकता है कि क्या ईश्वर-सद्भाव में यह जो प्रश्न है, वह प्रमाणसामान्यविषयक है या प्रमाण-विशेषविषयक ? यदि प्रथम पक्ष है, तो 'ईश्वरसद्भावे प्रमाणम्' यही उत्तर ठीक है, कारण जिस विषय में

[परिच्छेद ] सर्वनामार्थ का खण्डन ४१५

वोत्तरमापद्येत । यद्विषयो हि प्रश्नस्तदभिधेयम् । प्रमाणसामान्यविषयश्च प्रश्नः, तच्च प्रमाणशब्देनाभिधीयत एव । अथ द्वितीयः ; तथापीश्वरसद्भावे प्रमाणमित्येवोत्तरमापद्येत । यथा प्रश्नवाक्ये प्रमाणशब्दो विशेषपरस्तथोत्तरवाक्येऽपि । कोऽसौ विशेष इति चेन्न । पूर्ववदुत्तरत्वात् । अस्यापि प्रश्नस्य विशेषो विषयः, किंशब्दस्य विशेषशब्देन सामानाधिकरण्यात् । तथाच सति विशेष इत्येवोत्तरं स्यात् । स्यादेतत्—विशेषशब्देन न विशेषमात्रमनिर्धारितमत्र विवक्षितम्, किन्त्व- साधारणी व्यक्तिस्तत्र विशेषशब्दस्य तात्पर्यम् । तस्मात् काऽसावसाधारणी प्रमाणव्यक्तिरिति प्रश्नार्थः । तत्र च तादृश्याः प्रमाणव्यक्तेरभिधानमुत्तरं युक्तम्, नैवंविधाः प्रलापा इति । नैतदेवम् ; यतोऽत्रापि विशेष इत्येवोत्तरम्, यथा प्रश्नवाक्यगतस्य विशेषशब्दस्य सर्वतो व्यावृत्तस्वरूपायां प्रमाणव्यक्तौ तात्पर्यं तथोत्तरवाक्यस्थितस्यापि । एवञ्च सति यत्र विषये भवदीयस्य प्रश्नवाक्यस्य तात्पर्यं तदेवास्माकमुत्तरवाक्येन प्रतिपादितमिति युक्तमुक्तम् । प्रश्न हो, उसीका कथन करना चाहिए। यहाँ प्रमाण-सामान्यविषयक प्रश्न है और उस ( प्रमाण-सामान्य ) का 'प्रमाण' शब्द से कथन हुआ ही है । यदि द्वितीय पक्ष है, तब भी 'ईश्वर प्रमाण है' यही उत्तर ठीक होता है, कारण प्रश्नवाक्य में जैसे प्रमाणशब्द विशेषपरक होगा, वैसे ही उत्तर-वाक्य में भी प्रमाणशब्द विशेषपरक हो जायगा । प्रश्न—वह विशेष कौन है ? उत्तर—इस प्रश्न का उत्तर भी पूर्व के तुल्य ही जानना चाहिए । इस प्रश्न का किंशब्द से सामानाधिकरण्य होने से विशेष ही विषय है, यदि ऐसा है, तो 'विशेष' यही उत्तर युक्त है । प्रश्न—यहाँ प्रश्न-वाक्य में 'विशेष' शब्द से अनिश्चित केवल विशेष विवक्षित नहीं, किन्तु असाधारण (एक) व्यक्ति में किंशब्द का तात्पर्य है । अतः वह असाधारण व्यक्ति कौन है, यह प्रश्न का तात्पर्य है । यहाँ उस असाधारण व्यक्ति का अभिधान ही उत्तर होगा, ऐसा प्रलाप नहीं । उत्तर—इस आशय में भी 'विशेष' यही उत्तर युक्त है । जैसे प्रश्नवाक्यगत विशेषशब्द का सर्वतः व्यावृत्त व्यक्ति में तात्पर्य है, वैसे ही उत्तर-वाक्यगत विशेषशब्द का भी सर्वतः व्यावृत्त व्यक्ति में तात्पर्य होगा । ऐसा होने पर आपके प्रश्न-वाक्य का जिस विषय में तात्पर्य है, वही हमारे उत्तर-वाक्य द्वारा प्रतिपादित होता है । अतः युक्त ही उत्तर है ।

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परिच्छेद ] सर्वनामार्थ का खण्डन ४१७ यथार्थश्चेत्; तर्हि तेनैव ज्ञानेन स्वकीयो विषयः प्रमाणमुपस्थाप्यते, विषये प्रमाणप्रवृत्तिमन्तरेण तदीययथार्थत्वस्य वक्तुमशक्यत्वात् । तेनापि प्रमाणेन स्वगोचर ईश्वरसद्भाव उपस्थाप्यत इत्यनायासेनैव सिद्धोऽस्माकमीश्वरसिद्धि- मनोरथः । अथाऽयथार्थम् ; तत्रास्मिन्नयथार्थज्ञानविषये यद्यस्माभिरयथार्थमेव ज्ञान- मुत्पादनीयमिति भवतः पृच्छतो वाञ्छितं तदा केयं स्वाधीनेऽर्थे परापेक्षा ? भवानेव अयथार्थज्ञानोत्पादनकुशलो यथैकं तत्र मिथ्याज्ञानमजीजनत्, तथा परमप्युत्पादयतु । वयं पुनर्यथार्थज्ञानस्योत्पादयितारो मिथ्याज्ञाने सर्वथैवा- कृतिनः किमिह नियुज्येमहीति । अथ मदीयस्यायथार्थज्ञानस्य यो विषयः स मदीययथार्थज्ञानविषयो भवता क्रियतामिति त्वदीयं वाञ्छितम्; तदा व्याघातादीदृश‍्यर्थे भवतः प्रवृत्तिरेवानुपपन्ना । 'शुक्तिका रजतत्वेन मम यथार्थज्ञानविषयो भवत्वि'त्येतदर्थं प्रेक्षावान् कथङ्कारं प्रयतेत ? येन रूपेणायथार्थज्ञानविषयत्वं तेनैव रूपेण यथार्थज्ञानविषयत्वे व्याघातात् । यदि यथार्थ कहें, तो वही ज्ञान स्वविषय प्रमाण की भी उपस्थिति करेगा, कारण विषय में प्रमाण की प्रवृत्ति के बिना प्रमाणविषयक ज्ञान की यथार्थता का निश्चय नहीं हो सकता । फिर वह प्रमाण भी स्वविषय ईश्वर के सद्भाव की उपस्थिति कर ही देगा । इस तरह बिना परिश्रम के ही हमारा ईश्वरसद्भावरूप मनोरथ सिद्ध हो गया ! यदि आप यह चाहते हों कि अयथार्थ ज्ञान का विषय प्रमाण हममें अयथार्थ ज्ञान ही उत्पन्न करे, तो स्वाधीन अर्थ में दूसरे की अपेक्षा क्यों ? यथार्थ ज्ञान के उत्पादन में तो आप ही कुशल हैं । जैसे उस विषय में एक मिथ्याज्ञान को उत्पन्न किया है, वैसे ही और भी अयथार्थ ज्ञान का उत्पादन कर लें । हम तो यथार्थ ज्ञान के उत्पादक हैं और मिथ्याज्ञान के उत्पादन में सर्वथा अकुशल हैं । फिर इस विषय में हमें क्यों प्रेरित करते हैं ? समर्थन—मेरे अयथार्थ ज्ञान के विषय को मेरे यथार्थ का ज्ञान विषय आप करें । खण्डन—यदि ऐसी आपकी इच्छा है, तो व्याघात होने से इस विषय में आपकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । 'शुक्तिका रजतत्वरूप से मेरे यथार्थ ज्ञान का विषय हो' इसके लिए कोई भी बुद्धिमान् किस तरह प्रवृत्त होगा ? जो पदार्थरूप से यथार्थ ज्ञान का विषय हो, उसी रूप से वह अयथार्थ ज्ञान का भी विषय हो, इसमें व्याघात है । ५३

४१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ तृतीय अथ मन्यसे—स्वसिद्धान्तमनुरुन्धानेन भवता यथार्थज्ञानं तत्रोत्पादनीयम् , अतस्तदर्थं भवाननुयुज्यत इति । मैवम्; य ईश्वरसद्भावविषयो भवता प्रमाणा- भासः प्रमाणतया भ्रान्त्या प्रतीतः, तस्य प्रमाणत्वमस्माभिर्व्युत्पादनीयमिति नास्माकमीदृशः सिद्धान्तः । प्रत्युतेश्वरसद्भावविषयं यत्प्रमाणं भवता प्रमाणा- भासत्वेन भ्रान्त्या प्रतीतमस्ति तत्प्रमाणनीयमिति । स्यान्मतमीश्वरसद्भावविषयस्य प्रमाणस्य भवता ज्ञापनमात्रं क्रियतामि- त्यभिमतं पृच्छतामस्माकम् , न तु प्रमाणेनाऽप्रमाणेनेति विशेषोऽप्यभिमत इति । न; ज्ञापनमात्रस्याप्रमाणज्ञानमादायाऽप्युपपत्तेः । तत्र स्वाधीने केयं परा- पेक्षेत्याद्युक्तमनुषञ्जनीयम् । स्यादेतत्—येयमीश्वरसद्भावविषया प्रमाणप्रतीतिरस्माकमुत्पन्ना सा व्यभि- चारिणी सत्या वेति संशयोऽत्रास्माकम् । तेनैकपक्षनिर्धारणाधीनं यदिदं दूषण- मवादि भवता, तन्निरवकाशमिति । नैतदस्ति; एवं हि तस्यां प्रतीतौ यथार्थत्वा- समर्थन—अपने सिद्धान्त के अनुसार आप ईश्वरविषयक प्रमाण में यथार्थ ज्ञान का उत्पादन करें, इसीलिए हम आपको प्रेरित कर रहे हैं । खंडन—यदि प्रश्न का यही आशय हो, तो वह ठीक नहीं । कारण ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाणाभास ( अनुमानादि ) को आप भ्रमवश प्रमाण मानते हैं । हम उस प्रमाणाभास के प्रमाणत्व का प्रतिपादन करें—यह हमारा सिद्धान्त नहीं । प्रत्युत हमारा यही सिद्धान्त है कि ईश्वरसद्भावविषयक प्रमाण ( वेद ) को आपने भ्रमवश प्रमाणाभास मान रखा है, उस (वेद) के प्रमाणत्व का प्रतिपादन करें । समर्थन—प्रश्नकर्ता का यही आशय है कि आप ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाण का बोधनमात्र करें, प्रमाण से ही बोधन करें या अप्रमाण से ही—ऐसा कोई विशेष अभिमत नहीं है । खण्डन—आपका यह मत भी युक्त नहीं है, कारण केवल बोधन अप्रमाण से भी हो सकता है और अयथार्थ ज्ञान के उत्पादन में आप स्वाधीन ही हैं । उसमें दूसरे की अपेक्षा व्यर्थ है, अतः पूर्वोक्त खण्डन की अनुवृत्ति ही कर लेनी चाहिए । समर्थन—ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाण का जो ज्ञान हमें हुआ है, वह यथार्थ या अयथार्थ है, ऐसा इस विषय में हमें सन्देह है । अतः एककोटि यथार्थत्व या अयथार्थत्व का निश्चय कर जो दूषण आपने दिया है, वह युक्त नहीं है ।

परिच्छेद ] सर्वनामार्थ का खण्डन ४१६ यथार्थत्वसंशयेन तस्याः प्रतोतेर्गोचरो यत्प्रमाणं तस्यापि योऽसौ विषय ईश्वर- सद्भावस्तत्र सर्वत्रैव संशयानस्य भवतः प्रश्नोऽयम् , न तु विप्रतिपन्नस्येति स्यात् । तथाच स्वीकुरु शिष्यभावम्, प्रसादय चिरं चरणशुश्रूषाभिरस्मान्, च्छेत्स्यामस्ते संशयमिति । विप्रतिपन्ना एव वयम्, आहार्यः संशयोऽस्माकमिति चेत्; तर्ह्यवधृतैककोटय एव, वयं कार्यानुरोधात्तु संशयमालम्बामह इत्युक्तं स्यात् । एवं तर्हि तदेव कोट्यवधारणं भवतां यथार्थमयथार्थं वेति विकल्पोक्तयुक्त्या दूषणीयम् । एतेन—अनध्यवसायेन¹ तदस्माभिः प्रतिपन्नमित्यपि निरस्तं वेदितव्यम् । व्यभिचारिविषयमव्यभिचारिविषयं वा तदिति विकल्पाभ्यां तस्यापि ग्रस्तत्वात् खंडन—प्रश्न का यह आशय हो नहीं सकता । कारण ऐसा मानने पर अर्थात् प्रमाण की प्रतीति में यथार्थत्व-अयथार्थत्व का सन्देह होने पर उस प्रतीति का विषय जो प्रमाण है, उसके भी विषय ईश्वर-सद्भाव में तुम्हें सन्देह ही है । अतः संशय से ही तुम यह प्रश्न करते हो, विप्रतिपन्न नहीं हो । तब तो हमारे शिष्य बनो, चरण-शुश्रूषा कर हमें प्रसन्न करो । हम तुम्हारे सन्देह का छेदन कर देंगे । समर्थन—हम विप्रतिपन्न ही हैं और हमारा संशय भी आहार्य ( इच्छा से ही जन्य ) है । खंडन—तब ऐसा कहिये कि एक कोटि अर्थात् अभाव का हमें निश्चय है। विजय की इच्छा से हम सन्देह का अवलम्बन करते हैं—यह आपके प्रश्न का आशय हुआ । एवञ्च आपका वह एककोटि का ज्ञान भ्रम है या यथार्थ, ऐसा विकल्प कर उक्त युक्ति से खण्डनीय है । समर्थन—वैशेषिकाभिमत अनध्यवसाय अविद्यारूप ज्ञान से ईश्वर-सद्भाव में प्रमाण ज्ञात होने के कारण उसमें प्रश्न हो सकता है । खंडन—वह अविद्यारूप ज्ञान भी यथार्थ है या अयथार्थ, इस विकल्प से ग्रस्त होने से उक्त आशय भी खण्डनीय है । यथार्थत्व-अयथार्थत्व ये दोनों कोटियाँ परस्पर विरुद्ध हैं । अतः एक कोटि के न होने पर अन्य द्वितीय कोटि की ही प्राप्ति होती है । दोनों से अन्य तृतीय कोटि की प्राप्ति नहीं होती । भाव यह है कि निर्विकल्पकात्मक उक्त ज्ञान भ्रम-प्रमा से बहिर्भूत १. 'किं स्विन्' इत्याकारक विशेषरूप से कोटिद्वय का अनुल्लेखी ज्ञान, जो विशेषतः विरुद्ध कोटिद्वयं के उल्लेखक संशयात्मक ज्ञान से विलक्षण है, 'अनध्यवसायात्मक ज्ञान' कहा जाता है, जिसके विषय में 'न्यायलीलावती' में विशेष रूप से विचार किया गया है ।

४२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं 'परस्परविरोधे हि न प्रकारान्तरस्थितिः' इति न्यायात् । एवमीश्वराभिसन्ध्यादावपि तत्तत्स्थाने तिष्ठत्सर्वनामान्तरखण्डनमत्र द्रष्टव्यम् । इति कवितार्किकचक्रवर्ति--श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये सर्वनामार्थानिरुक्तिर्नाम तृतीयः परिच्छेदः । नहीं है, भ्रमभिन्नत्वरूप प्रमात्व का आश्रय होने से अनित्य प्रमा में ही गुण की अपेक्षा होती है । इसी प्रकार 'ईश्वराभिसन्धि' नामक ग्रन्थ के तत्-तत् प्रकरण में किया गया अन्य सर्वनाम-शब्दों का खण्डन यहाँ भी समझ लेना चाहिए । अतः उनका यहाँ खण्डन न करने से कोई न्यूनता नहीं है । तृतीय परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त ।

चतुर्थः परिच्छेदः भावत्व-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि भावात्मके तस्मिन्नीश्वरे विधायकं किञ्चित्प्रमाणं वक्तव्यमिति चेत् ; किं पुनर्भावत्वम् ? , विधित्वमिति चेन्न । पर्यायप्रश्नात् । स्वरूपसत्त्वमिति चेत् ; अभावस्यापि तथाभावात् , प्रतिस्वं व्यावृतत्वेनाननुगतत्वापत्तेश्च । अस्तीति प्रतीतिविषयत्वमिति चेन्न । 'अभावो घटस्यास्ती'ति प्रत्ययसम्भवेन अभावस्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । नास्तीति प्रतीतिविषयत्वेऽपि च घटादेर्भावत्वा- निवृत्तेः । भावत्व-लक्षण का खंडन 'यद्यपि किम्-शब्दार्थ का निर्वचन न होने से ईश्वर के सद्भाव में प्रमाण का प्रश्न ही नहीं उठ सकता, तो भी भावरूप ईश्वर में विधायक कुछ प्रमाण अवश्य कहना चाहिए'—यदि ऐसा कहें, तो वह भावत्व क्या वस्तु है, अर्थात् निर्वचन न होने से भावत्व अनिर्वचनीय है । उसमें प्रमाण का कोई प्रयोजन ही नहीं है । निर्वचन—विधि ही भाव है । खण्डन—हम पर्याय नहीं, लक्षण पूछते हैं, अतः आपको भाव का लक्षण कहना चाहिए । समर्थन—'स्वरूप से जो सत् हो, वह भाव है ।' खंडन—अभाव भी स्वरूप से सत् है, अतः अभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—स्वरूपसत्त्व प्रतिव्यक्ति पृथक्-पृथक् होने से उसे लक्षण मानने में उक्त लक्षण से लक्ष्य का अनुगम नहीं होगा । समर्थन—"अस्ति' इस प्रतीति का विषय भाव है ।" खण्डन—'घटस्य अभावो- ऽस्ति' ऐसी प्रतीति होती है, अतः 'अस्ति' इस प्रतीति का विषय होने से अभाव में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि 'अस्ति' इस प्रतीति के विषय को भाव कहें, तो 'घटाभावो नास्ति' इस प्रतीति के विषय होने से घट में भावत्व की निवृत्ति होनी चाहिए ।

अस्तीति चास्त्यर्थो वा शब्दो वा विवक्षितः ? नाद्यः; तस्यानिरुक्तेः । सत्ता तदर्थ इति चेन्न । सामान्यादीनां तदभावादभावत्वापत्तेः । स्वरूपसत्त्वञ्च निरस्तम् । नापि द्वितीयः ; अभावोऽस्तीति प्रतीतेरुक्तत्वात् । वर्तत इत्याद्याकारेण च प्रतीयमानस्याभावत्वप्रसङ्गात् । सोऽप्यस्तिपर्याय इति चेन्न । उभयसाधारणैकार्थनिर्वचनमन्तरेण पर्यायत्वस्य प्रतिपादयितुमशक्यत्वात् । यत्रैकस्यास्तिपदप्रयोगः, तत्रैवापरस्य वर्तत इति प्रयोगात् सामान्येन तावत् किञ्च—'अस्ति' से अर्थ अभिप्रेत है या शब्द ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण अबतक अस्ति के अर्थ की निरुक्ति हुई ही नहीं है। यदि सत्ता को अस्ति का अर्थ मानें, तो सामान्य आदि में सत्ता का अभाव होने से उनमें लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। यदि स्वरूपतः सत्त्व को अस्ति का अर्थ मानें, तो वह अभाव में भी होने से लक्षण की अतिव्याप्ति होगी । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण द्वितीय पक्ष में अस्ति-शब्द से जिसका उल्लेख होता हो, ऐसी प्रतीति का विषय भाव है, ऐसा लक्षण हुआ । उसकी 'अभावोऽस्ति' इस प्रतीति के विषय अभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि केवल अस्ति-शब्द के उल्लेखवाली प्रतीति के विषय को ही भाव मानें, तो 'घटो वर्तते', 'घटो भवति' इत्यादि प्रतीतियों का विषय घट अभाव हो जायगा । अर्थात् उसमें भावत्व का लक्षण न जाने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अस्ति-पर्याय का उल्लेख करनेवाली प्रतीति का विषय भाव है', ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च अस्ति के पर्याय 'भवति, वर्तते' भी हैं, अतः भवति, वर्तते का उल्लेख करनेवाली प्रतीति के विषय में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—एक अर्थ के वाचक को ही पर्याय कहते हैं। अतः जबतक भावरूप एक अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक पर्यायघटित इस लक्षण का ज्ञान ही नहीं हो सकता । समर्थन—जिस अर्थ में एक पुरुष 'अस्ति' का प्रयोग करता है, उसी अर्थ में अन्य पुरुष 'भवति, वर्तते' का भी प्रयोग करता है। अतः सामान्यरूप से भावत्व के निर्वचन के बिना भी पर्यायत्व का ज्ञान हो सकता है। खण्डन—एक अर्थ में प्रयुक्त

परिच्छेद ] भावत्व-लक्षण का खण्डन ४२३ पर्यायत्वं शक्याधिगममिति चेन्न । प्रमेयाभिधेयादिशब्दानां तथात्वे- ऽप्यपर्यायत्वात् । यत्रेत्यस्य प्रवृत्तिनिमित्तार्थत्वे च तन्निर्वचनप्रसङ्गस्तदवस्थः, स एवार्थो भावत्वमुच्यताम्, किं शब्दोल्लेखगवेषणया । अपरप्रतिषेधात्मकत्वं भावत्वमिति चेन्न । व्यवच्छेद्यासम्भवेन परपदवैयर्थ्यात्, भावाभावयोः परस्परप्रतिषेधात्मकतास्वीकाराच्च । तथापि ‘भावो नास्ती’त्यभावप्रतिपत्तिवत् ‘अभावो नास्ती’ति भावस्या- प्रतीतिरिति चेन्न । तावतापि लक्षणानिरुक्तेः । अपरप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्वमेव भावत्वमिति चेन्न । चक्षुरादिभिर्भावत्वा- होने पर भी ‘प्रमेय’ और ‘अभिधेय’ शब्द पर्याय नहीं हैं, अतः एक अर्थ में प्रयोग होने से पर्यायत्व का सामान्यतः ज्ञान नहीं हो सकता । समर्थन—जिन दो अर्थों का एक प्रवृत्तिनिमित्त हो, वे दोनों आपस में पर्याय हैं। प्रमेय और अभिधेय शब्दों के प्रमाविषयत्व और अभिधाविषयत्वरूप दो प्रवृत्तिनिमित्त हैं, अतः उनमें पर्यायत्व नहीं है। खण्डन—जबतक अस्ति-शब्द के प्रवृत्तिनिमित्त का ज्ञान न हो, तबतक प्रवृत्तिनिमित्तत्वघटित पर्यायत्व का भी ज्ञान न होने से पर्यायत्वघटित उक्त लक्षण का भी ज्ञान नहीं हो सकेगा । अतः उस ‘अस्ति’ के प्रवृत्ति- निमित्त का ही निर्वचन कीजिये । ‘अस्ति’ शब्द के उल्लेख का अन्वेषण व्यर्थ है । समर्थन—‘जो पर का प्रतिषेधरूप न हो, वह भाव है’, ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—‘अप्रतिषेधरूप भाव है’ इतना ही कहने में कोई दोष तो है नहीं, फिर कोई व्यवच्छेद्य न होने से ‘पर’ पद का निवेश व्यर्थ है। किञ्च—भाव भी अभाव का ‘प्रतिषेधरूप है, अतः उक्त लक्षण का असम्भव हो जायगा । समर्थन—जैसे ‘भावो नास्ति’ इस तरह अभाव की प्रतिषेधरूप से प्रतीति होती है, वैसे ‘अभावो नास्ति’ इस तरह भाव की प्रतिषेधरूप से प्रतीति नहीं होती । अतः असंभव नहीं है। खण्डन—इस कथन से भी लक्षण की निरुक्ति तो नहीं हुई । अर्थात् एतादृश प्रतीति न होने पर भी भाव में स्वाभावाभावत्व का तो आप भी अपलाप नहीं कर सकते । एवञ्च पूर्वोक्त असंभव बना ही हुआ है । समर्थन—‘पर के प्रतिषेधरूप से जो अप्रतीयमान हो, वह भाव है’, ऐसा लक्षण

४२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ग्रहणप्रसङ्गात् । नहि प्रतीयमानत्वं चक्षुरादिग्राह्यम् । 'अभावो नास्ती'ति प्रतीते- र्निर्विषयत्वप्रसङ्गाच्च । नहीयं भावविषया, भवत्पक्षे परप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्वात् । नाप्यभावविषयैव, तन्निषेधार्थत्वात् । नैवं प्रतीतिरेव स्यादिति चेन्न । शाब्द्याः प्रतीतेः सम्भवात् । आकाङ्क्षादिमद्भिः पदैः प्रतिस्वं संसर्गबोधनात् । 'अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्दः करोति हि ।' प्रत्यक्षप्रतीतेस्तथा विवक्षितत्वादयमदोष इति चेन्न । सर्वस्य भावस्य प्रत्यक्षत्वानङ्गीकारात् । सेश्वरपक्षे सर्वं प्रत्यक्षमिति चेन्न । तेन तेषामपरप्रतिषेधा- त्मतया ग्रहणे प्रमाणाभावात् । तेषां विधिरूपतया तथैव ग्रहणमिति चेन्न । विधिरूपत्वस्यानवधारणात् । करेंगे । वही भाव की विशेषता है । एवञ्च अब असंभव न होगा । खण्डन — प्रतीति- घटित उक्त भावत्व का चक्षु से प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण प्रतीति का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता । किञ्च 'अभावो नास्ति' यह प्रतीति निर्विषयक हो जायगी । देखिये—यह प्रतीति भावविषयक नहीं है, कारण आपके मत में वह पर के प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान है । अभावविषयक भी नहीं है, कारण अभाव के प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान है । ऐसी प्रतीति ही नहीं होती, यह भी नहीं कह सकते; कारण आकाङ्क्षादियुक्त पदों से प्रतिपदार्थों का परस्पर संसर्ग-बोध होने से शब्दजन्य ऐसी प्रतीति हो सकती है । जब 'शशशृङ्गं नास्ति' इस शब्द-प्रयोगस्थल में अत्यन्त असत् अर्थ का भी शब्द से बोध होता है, तब प्रकृत स्थल में जहाँ सत् अर्थ है, वहाँ शब्द से प्रतीति क्यों नहीं होगी ? समर्थन—'अपर-प्रतिषेधमुख से जायमान जो प्रत्यक्ष, उसका विषय भाव है।' 'घटाभावो नास्ति' ऐसी प्रतीति होने पर भी घटादि का प्रत्यक्ष प्रतिषेधरूप से नहीं होता; अतः उसमें अव्याप्ति नहीं है । खण्डन—देश, काल और स्वरूप से विप्रकृष्ट भावों का प्रत्यक्ष न होने से सभी भावों का प्रत्यक्ष होता हो, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि कहें कि ईश्वर और योगी को सब वस्तुओं का प्रत्यक्ष होता है, तब भी उन्हें अपरप्रतिषेधरूप से ही प्रत्यक्ष होता हो, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन—घटादि विधि अपरप्रतिषेध है, अतः उसी रूप से ग्रहण होता है । खंडन—अद्यावधि घटादि के विधि (अपर-प्रतिषेध) रूपत्व का अवधारण ही नहीं हुआ है ।

परिच्छेद ] भावत्व-लक्षण का खण्डन ४२५ यदपरप्रतिषेधात्मकतया शब्देनापि बोध्यते, तत्तावत् भावरूपमिति चेन्न । परपदवैयर्थ्यात् । तत्यागेऽप्यचाक्षुषत्वापत्तेः । 'सुरभि चन्दनमि'त्यादाविव अन्योपनीतभागवत् तत्र चाक्षुषत्वं भविष्यतीति चेन्न । तथाविधविषयेण विशिष्टाया बुद्धेर्विषयविशेषणताग्रहे स्वाश्रयोऽप्यंशतः स्यात् । तेनोपलक्षितायास्तथात्वे चाभावविशिष्टभावग्रहाथेस्याभावस्य तथात्वापत्तेः। तेन यदेवंविधं तद्भावरूपमिति च ब्रुवता एवंविधत्वाद्भावत्वमन्यद्वाच्यम्, अभेदे च यदेवंविधं तद्भावरूपमिति नियमानुपपत्तेः । अस्योपलक्षणत्वे चोप- लक्ष्यस्यान्यस्य वाच्यत्वात् । समर्थन —'जो अपरप्रतिषेधरूप से शब्द द्वारा भी बोधित हो, वह भाव है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन —पूर्वोक्त रीति से 'पर' पद का वैयर्थ्य हो जायगा । यदि 'पर' पद का लक्षण में निवेश न भी करें, तब भी बोध-घटित होने से उक्त भावत्व का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होगा । समर्थन—जैसे 'सुरभि चन्दनम्' यहाँ सौरभ का तथा 'ज्ञातो घटः' यहाँ ज्ञान का ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति से भान होता है, वैसे ही उक्त लक्षणरूप भावत्व का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो जायगा । खण्डन —अपरप्रतिषेधरूप जो विषय, उससे विशिष्ट बुद्धि को यदि लक्षण-प्रविष्ट विषय का विशेषण मानें, तो विषय-विशिष्ट बुद्धि के विषय में वृत्ति होने से बुद्धि द्वारा विषय भी विषयवृत्ति हुआ, अतः आत्माश्रय हो जायगा । यदि अपरप्रतिषेधरूप विषय को बुद्धि में और उससे उपलक्षित बुद्धि को विषय में उपलक्षण मानें, तो अपर भूतल पर विषय से उपलक्षित 'घटाभाववद् भूतलं' इत्याकारक बुद्धि से उपलक्षित घटाभावरूप विषयत्व घटाभाव में भी है । अतः लक्षण की घटाभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च —'अपरप्रतिषेधरूप से प्रतीयमान भाव है' ऐसा आप कहते हैं, तो लक्षण से अन्य भावत्वरूप लक्ष्यतावच्छेदक का भी निर्वचन करना होगा । कारण लक्षण और लक्ष्यतावच्छेदक को एक मानें, तो 'जो ऐसा हो वह भाव है' यह कथन नहीं बनेगा। यदि लक्षण को उपलक्षण मानें, तो भी उपलक्ष्यता का उपलक्षण से अन्य कोई अवच्छेदक कहना ही होगा । ५४

४२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अस्यैव भावार्थत्वे चाभावो नास्तीति कृत्वा प्रतीयमानस्य भावस्य भावत्वा- भावप्रसङ्गात् । भिन्नञ्च भावत्वं न सम्भवति, षट्पदार्थव्यतिरेकप्रसङ्गात् । यच्च किञ्चिद्भावत्वं तत्स्वात्मन्यस्ति नो वा ? अस्ति चेदात्मनि वृत्तिविरोधः, नास्ति चेत्स्वस्यान्यप्रतिषेधमुखेन चाप्रतीयमानस्याभावत्वप्रसङ्ग इति । अभावत्व-लक्षण-खण्डनम् नन्वेवमीश्वरे प्रमाणानुपदर्शनात्तदभाव एवाऽऽपद्यत इति चेत्, अभावत्वं किमभिधीयते ? निषेधात्मकत्वमिति चेत्, तद्यदि प्रतिक्षेपात्मकत्वं तदा भावेऽप्यस्ति, भावा- भावयोर्द्वयोरपि परस्परप्रतिक्षेपात्मकत्वस्वीकारात् । अथाभावत्वमेव, तदा न निवृत्तः पर्यनुयोगः । यदि किसी प्रकार ‘अपरप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्व’रूप लक्षण को ही लक्ष्य का अवच्छेदक मानें, तो ‘अभावो नास्ति’ इस प्रकार प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान घटादि भाव लक्ष्य न कहलायेगा । फिर, उस लक्षण से अन्य भावत्व सम्भव भी नहीं है, कारण तब उसे द्रव्यादि षट्-पदार्थों से अन्य पदार्थ मानना पड़ेगा । किञ्च—जो कुछ भी भावत्व कहें, वह भावत्व के लक्षण में रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो स्व में स्व का वृत्तित्व हो जायगा, जो विरुद्ध है । यदि नहीं रहता, तो लक्षण में परप्रतिषेधरूप से अप्रतीयमान होने पर भी अभावत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । अभावत्व-लक्षण का खण्डन प्रश्न—इस प्रकार प्रश्न में प्रश्न कर ईश्वर में प्रमाण नहीं दिखा सके, तो ईश्वर का अभाव होने लगेगा । उत्तर—अभाव ही क्या वस्तु है ? अर्थात् निर्वचन न हो सकने से वह भी अनिर्वचनीय है, अतः ईश्वर का अभाव नहीं होगा । निर्वचन—‘जो निषेधरूप हो, वह अभाव है’ ऐसा लक्षण कर ही सकते हैं । खंडन—यदि निषेध प्रतिक्षेपरूप है, तो भाव में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण भाव और अभाव दोनों परस्पर प्रतिक्षेपरूप हैं । यदि निषेध अभाव ही है, तो प्रश्न निवृत्त नहीं हुआ, अर्थात् प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ ।