खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 440, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः परिच्छेदः भावत्व-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि भावात्मके तस्मिन्नीश्वरे विधायकं किञ्चित्प्रमाणं वक्तव्यमिति चेत् ; किं पुनर्भावत्वम् ? , विधित्वमिति चेन्न । पर्यायप्रश्नात् । स्वरूपसत्त्वमिति चेत् ; अभावस्यापि तथाभावात् , प्रतिस्वं व्यावृतत्वेनाननुगतत्वापत्तेश्च । अस्तीति प्रतीतिविषयत्वमिति चेन्न । 'अभावो घटस्यास्ती'ति प्रत्ययसम्भवेन अभावस्यापि तथात्वप्रसङ्गात् । नास्तीति प्रतीतिविषयत्वेऽपि च घटादेर्भावत्वा- निवृत्तेः । भावत्व-लक्षण का खंडन 'यद्यपि किम्-शब्दार्थ का निर्वचन न होने से ईश्वर के सद्भाव में प्रमाण का प्रश्न ही नहीं उठ सकता, तो भी भावरूप ईश्वर में विधायक कुछ प्रमाण अवश्य कहना चाहिए'—यदि ऐसा कहें, तो वह भावत्व क्या वस्तु है, अर्थात् निर्वचन न होने से भावत्व अनिर्वचनीय है । उसमें प्रमाण का कोई प्रयोजन ही नहीं है । निर्वचन—विधि ही भाव है । खण्डन—हम पर्याय नहीं, लक्षण पूछते हैं, अतः आपको भाव का लक्षण कहना चाहिए । समर्थन—'स्वरूप से जो सत् हो, वह भाव है ।' खंडन—अभाव भी स्वरूप से सत् है, अतः अभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—स्वरूपसत्त्व प्रतिव्यक्ति पृथक्-पृथक् होने से उसे लक्षण मानने में उक्त लक्षण से लक्ष्य का अनुगम नहीं होगा । समर्थन—"अस्ति' इस प्रतीति का विषय भाव है ।" खण्डन—'घटस्य अभावो- ऽस्ति' ऐसी प्रतीति होती है, अतः 'अस्ति' इस प्रतीति का विषय होने से अभाव में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—यदि 'अस्ति' इस प्रतीति के विषय को भाव कहें, तो 'घटाभावो नास्ति' इस प्रतीति के विषय होने से घट में भावत्व की निवृत्ति होनी चाहिए ।