खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअस्तीति चास्त्यर्थो वा शब्दो वा विवक्षितः ? नाद्यः; तस्यानिरुक्तेः । सत्ता तदर्थ इति चेन्न । सामान्यादीनां तदभावादभावत्वापत्तेः । स्वरूपसत्त्वञ्च निरस्तम् । नापि द्वितीयः ; अभावोऽस्तीति प्रतीतेरुक्तत्वात् । वर्तत इत्याद्याकारेण च प्रतीयमानस्याभावत्वप्रसङ्गात् । सोऽप्यस्तिपर्याय इति चेन्न । उभयसाधारणैकार्थनिर्वचनमन्तरेण पर्यायत्वस्य प्रतिपादयितुमशक्यत्वात् । यत्रैकस्यास्तिपदप्रयोगः, तत्रैवापरस्य वर्तत इति प्रयोगात् सामान्येन तावत् किञ्च—'अस्ति' से अर्थ अभिप्रेत है या शब्द ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है; कारण अबतक अस्ति के अर्थ की निरुक्ति हुई ही नहीं है। यदि सत्ता को अस्ति का अर्थ मानें, तो सामान्य आदि में सत्ता का अभाव होने से उनमें लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। यदि स्वरूपतः सत्त्व को अस्ति का अर्थ मानें, तो वह अभाव में भी होने से लक्षण की अतिव्याप्ति होगी । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, कारण द्वितीय पक्ष में अस्ति-शब्द से जिसका उल्लेख होता हो, ऐसी प्रतीति का विषय भाव है, ऐसा लक्षण हुआ । उसकी 'अभावोऽस्ति' इस प्रतीति के विषय अभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि केवल अस्ति-शब्द के उल्लेखवाली प्रतीति के विषय को ही भाव मानें, तो 'घटो वर्तते', 'घटो भवति' इत्यादि प्रतीतियों का विषय घट अभाव हो जायगा । अर्थात् उसमें भावत्व का लक्षण न जाने से अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अस्ति-पर्याय का उल्लेख करनेवाली प्रतीति का विषय भाव है', ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च अस्ति के पर्याय 'भवति, वर्तते' भी हैं, अतः भवति, वर्तते का उल्लेख करनेवाली प्रतीति के विषय में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—एक अर्थ के वाचक को ही पर्याय कहते हैं। अतः जबतक भावरूप एक अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक पर्यायघटित इस लक्षण का ज्ञान ही नहीं हो सकता । समर्थन—जिस अर्थ में एक पुरुष 'अस्ति' का प्रयोग करता है, उसी अर्थ में अन्य पुरुष 'भवति, वर्तते' का भी प्रयोग करता है। अतः सामान्यरूप से भावत्व के निर्वचन के बिना भी पर्यायत्व का ज्ञान हो सकता है। खण्डन—एक अर्थ में प्रयुक्त