भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 610 में से

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पृष्ठ 442

परिच्छेद ] भावत्व-लक्षण का खण्डन ४२३ पर्यायत्वं शक्याधिगममिति चेन्न । प्रमेयाभिधेयादिशब्दानां तथात्वे- ऽप्यपर्यायत्वात् । यत्रेत्यस्य प्रवृत्तिनिमित्तार्थत्वे च तन्निर्वचनप्रसङ्गस्तदवस्थः, स एवार्थो भावत्वमुच्यताम्, किं शब्दोल्लेखगवेषणया । अपरप्रतिषेधात्मकत्वं भावत्वमिति चेन्न । व्यवच्छेद्यासम्भवेन परपदवैयर्थ्यात्, भावाभावयोः परस्परप्रतिषेधात्मकतास्वीकाराच्च । तथापि ‘भावो नास्ती’त्यभावप्रतिपत्तिवत् ‘अभावो नास्ती’ति भावस्या- प्रतीतिरिति चेन्न । तावतापि लक्षणानिरुक्तेः । अपरप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्वमेव भावत्वमिति चेन्न । चक्षुरादिभिर्भावत्वा- होने पर भी ‘प्रमेय’ और ‘अभिधेय’ शब्द पर्याय नहीं हैं, अतः एक अर्थ में प्रयोग होने से पर्यायत्व का सामान्यतः ज्ञान नहीं हो सकता । समर्थन—जिन दो अर्थों का एक प्रवृत्तिनिमित्त हो, वे दोनों आपस में पर्याय हैं। प्रमेय और अभिधेय शब्दों के प्रमाविषयत्व और अभिधाविषयत्वरूप दो प्रवृत्तिनिमित्त हैं, अतः उनमें पर्यायत्व नहीं है। खण्डन—जबतक अस्ति-शब्द के प्रवृत्तिनिमित्त का ज्ञान न हो, तबतक प्रवृत्तिनिमित्तत्वघटित पर्यायत्व का भी ज्ञान न होने से पर्यायत्वघटित उक्त लक्षण का भी ज्ञान नहीं हो सकेगा । अतः उस ‘अस्ति’ के प्रवृत्ति- निमित्त का ही निर्वचन कीजिये । ‘अस्ति’ शब्द के उल्लेख का अन्वेषण व्यर्थ है । समर्थन—‘जो पर का प्रतिषेधरूप न हो, वह भाव है’, ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—‘अप्रतिषेधरूप भाव है’ इतना ही कहने में कोई दोष तो है नहीं, फिर कोई व्यवच्छेद्य न होने से ‘पर’ पद का निवेश व्यर्थ है। किञ्च—भाव भी अभाव का ‘प्रतिषेधरूप है, अतः उक्त लक्षण का असम्भव हो जायगा । समर्थन—जैसे ‘भावो नास्ति’ इस तरह अभाव की प्रतिषेधरूप से प्रतीति होती है, वैसे ‘अभावो नास्ति’ इस तरह भाव की प्रतिषेधरूप से प्रतीति नहीं होती । अतः असंभव नहीं है। खण्डन—इस कथन से भी लक्षण की निरुक्ति तो नहीं हुई । अर्थात् एतादृश प्रतीति न होने पर भी भाव में स्वाभावाभावत्व का तो आप भी अपलाप नहीं कर सकते । एवञ्च पूर्वोक्त असंभव बना ही हुआ है । समर्थन—‘पर के प्रतिषेधरूप से जो अप्रतीयमान हो, वह भाव है’, ऐसा लक्षण

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