खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ग्रहणप्रसङ्गात् । नहि प्रतीयमानत्वं चक्षुरादिग्राह्यम् । 'अभावो नास्ती'ति प्रतीते- र्निर्विषयत्वप्रसङ्गाच्च । नहीयं भावविषया, भवत्पक्षे परप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्वात् । नाप्यभावविषयैव, तन्निषेधार्थत्वात् । नैवं प्रतीतिरेव स्यादिति चेन्न । शाब्द्याः प्रतीतेः सम्भवात् । आकाङ्क्षादिमद्भिः पदैः प्रतिस्वं संसर्गबोधनात् । 'अत्यन्तासत्यपि ज्ञानमर्थे शब्दः करोति हि ।' प्रत्यक्षप्रतीतेस्तथा विवक्षितत्वादयमदोष इति चेन्न । सर्वस्य भावस्य प्रत्यक्षत्वानङ्गीकारात् । सेश्वरपक्षे सर्वं प्रत्यक्षमिति चेन्न । तेन तेषामपरप्रतिषेधा- त्मतया ग्रहणे प्रमाणाभावात् । तेषां विधिरूपतया तथैव ग्रहणमिति चेन्न । विधिरूपत्वस्यानवधारणात् । करेंगे । वही भाव की विशेषता है । एवञ्च अब असंभव न होगा । खण्डन — प्रतीति- घटित उक्त भावत्व का चक्षु से प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण प्रतीति का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता । किञ्च 'अभावो नास्ति' यह प्रतीति निर्विषयक हो जायगी । देखिये—यह प्रतीति भावविषयक नहीं है, कारण आपके मत में वह पर के प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान है । अभावविषयक भी नहीं है, कारण अभाव के प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान है । ऐसी प्रतीति ही नहीं होती, यह भी नहीं कह सकते; कारण आकाङ्क्षादियुक्त पदों से प्रतिपदार्थों का परस्पर संसर्ग-बोध होने से शब्दजन्य ऐसी प्रतीति हो सकती है । जब 'शशशृङ्गं नास्ति' इस शब्द-प्रयोगस्थल में अत्यन्त असत् अर्थ का भी शब्द से बोध होता है, तब प्रकृत स्थल में जहाँ सत् अर्थ है, वहाँ शब्द से प्रतीति क्यों नहीं होगी ? समर्थन—'अपर-प्रतिषेधमुख से जायमान जो प्रत्यक्ष, उसका विषय भाव है।' 'घटाभावो नास्ति' ऐसी प्रतीति होने पर भी घटादि का प्रत्यक्ष प्रतिषेधरूप से नहीं होता; अतः उसमें अव्याप्ति नहीं है । खण्डन—देश, काल और स्वरूप से विप्रकृष्ट भावों का प्रत्यक्ष न होने से सभी भावों का प्रत्यक्ष होता हो, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । यदि कहें कि ईश्वर और योगी को सब वस्तुओं का प्रत्यक्ष होता है, तब भी उन्हें अपरप्रतिषेधरूप से ही प्रत्यक्ष होता हो, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन—घटादि विधि अपरप्रतिषेध है, अतः उसी रूप से ग्रहण होता है । खंडन—अद्यावधि घटादि के विधि (अपर-प्रतिषेध) रूपत्व का अवधारण ही नहीं हुआ है ।