भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

परिच्छेद ] भावत्व-लक्षण का खण्डन ४२५ यदपरप्रतिषेधात्मकतया शब्देनापि बोध्यते, तत्तावत् भावरूपमिति चेन्न । परपदवैयर्थ्यात् । तत्यागेऽप्यचाक्षुषत्वापत्तेः । 'सुरभि चन्दनमि'त्यादाविव अन्योपनीतभागवत् तत्र चाक्षुषत्वं भविष्यतीति चेन्न । तथाविधविषयेण विशिष्टाया बुद्धेर्विषयविशेषणताग्रहे स्वाश्रयोऽप्यंशतः स्यात् । तेनोपलक्षितायास्तथात्वे चाभावविशिष्टभावग्रहाथेस्याभावस्य तथात्वापत्तेः। तेन यदेवंविधं तद्भावरूपमिति च ब्रुवता एवंविधत्वाद्भावत्वमन्यद्वाच्यम्, अभेदे च यदेवंविधं तद्भावरूपमिति नियमानुपपत्तेः । अस्योपलक्षणत्वे चोप- लक्ष्यस्यान्यस्य वाच्यत्वात् । समर्थन —'जो अपरप्रतिषेधरूप से शब्द द्वारा भी बोधित हो, वह भाव है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन —पूर्वोक्त रीति से 'पर' पद का वैयर्थ्य हो जायगा । यदि 'पर' पद का लक्षण में निवेश न भी करें, तब भी बोध-घटित होने से उक्त भावत्व का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होगा । समर्थन—जैसे 'सुरभि चन्दनम्' यहाँ सौरभ का तथा 'ज्ञातो घटः' यहाँ ज्ञान का ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति से भान होता है, वैसे ही उक्त लक्षणरूप भावत्व का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष हो जायगा । खण्डन —अपरप्रतिषेधरूप जो विषय, उससे विशिष्ट बुद्धि को यदि लक्षण-प्रविष्ट विषय का विशेषण मानें, तो विषय-विशिष्ट बुद्धि के विषय में वृत्ति होने से बुद्धि द्वारा विषय भी विषयवृत्ति हुआ, अतः आत्माश्रय हो जायगा । यदि अपरप्रतिषेधरूप विषय को बुद्धि में और उससे उपलक्षित बुद्धि को विषय में उपलक्षण मानें, तो अपर भूतल पर विषय से उपलक्षित 'घटाभाववद् भूतलं' इत्याकारक बुद्धि से उपलक्षित घटाभावरूप विषयत्व घटाभाव में भी है । अतः लक्षण की घटाभाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च —'अपरप्रतिषेधरूप से प्रतीयमान भाव है' ऐसा आप कहते हैं, तो लक्षण से अन्य भावत्वरूप लक्ष्यतावच्छेदक का भी निर्वचन करना होगा । कारण लक्षण और लक्ष्यतावच्छेदक को एक मानें, तो 'जो ऐसा हो वह भाव है' यह कथन नहीं बनेगा। यदि लक्षण को उपलक्षण मानें, तो भी उपलक्ष्यता का उपलक्षण से अन्य कोई अवच्छेदक कहना ही होगा । ५४