भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 445

४२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अस्यैव भावार्थत्वे चाभावो नास्तीति कृत्वा प्रतीयमानस्य भावस्य भावत्वा- भावप्रसङ्गात् । भिन्नञ्च भावत्वं न सम्भवति, षट्पदार्थव्यतिरेकप्रसङ्गात् । यच्च किञ्चिद्भावत्वं तत्स्वात्मन्यस्ति नो वा ? अस्ति चेदात्मनि वृत्तिविरोधः, नास्ति चेत्स्वस्यान्यप्रतिषेधमुखेन चाप्रतीयमानस्याभावत्वप्रसङ्ग इति । अभावत्व-लक्षण-खण्डनम् नन्वेवमीश्वरे प्रमाणानुपदर्शनात्तदभाव एवाऽऽपद्यत इति चेत्, अभावत्वं किमभिधीयते ? निषेधात्मकत्वमिति चेत्, तद्यदि प्रतिक्षेपात्मकत्वं तदा भावेऽप्यस्ति, भावा- भावयोर्द्वयोरपि परस्परप्रतिक्षेपात्मकत्वस्वीकारात् । अथाभावत्वमेव, तदा न निवृत्तः पर्यनुयोगः । यदि किसी प्रकार ‘अपरप्रतिषेधमुखेन प्रतीयमानत्व’रूप लक्षण को ही लक्ष्य का अवच्छेदक मानें, तो ‘अभावो नास्ति’ इस प्रकार प्रतिषेधरूप से प्रतीयमान घटादि भाव लक्ष्य न कहलायेगा । फिर, उस लक्षण से अन्य भावत्व सम्भव भी नहीं है, कारण तब उसे द्रव्यादि षट्-पदार्थों से अन्य पदार्थ मानना पड़ेगा । किञ्च—जो कुछ भी भावत्व कहें, वह भावत्व के लक्षण में रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो स्व में स्व का वृत्तित्व हो जायगा, जो विरुद्ध है । यदि नहीं रहता, तो लक्षण में परप्रतिषेधरूप से अप्रतीयमान होने पर भी अभावत्व का प्रसङ्ग हो जायगा । अभावत्व-लक्षण का खण्डन प्रश्न—इस प्रकार प्रश्न में प्रश्न कर ईश्वर में प्रमाण नहीं दिखा सके, तो ईश्वर का अभाव होने लगेगा । उत्तर—अभाव ही क्या वस्तु है ? अर्थात् निर्वचन न हो सकने से वह भी अनिर्वचनीय है, अतः ईश्वर का अभाव नहीं होगा । निर्वचन—‘जो निषेधरूप हो, वह अभाव है’ ऐसा लक्षण कर ही सकते हैं । खंडन—यदि निषेध प्रतिक्षेपरूप है, तो भाव में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण भाव और अभाव दोनों परस्पर प्रतिक्षेपरूप हैं । यदि निषेध अभाव ही है, तो प्रश्न निवृत्त नहीं हुआ, अर्थात् प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ ।