खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अभावत्व-लक्षण का खण्डन ४२७ एतेन निषेधमुखेन प्रतीयमानत्वमिति निरस्तम् । भावविरोधित्वमिति चेन्न । सर्वभावविरोधित्वं तद्विशेषविरोधित्वं वा ? नाद्यः; असिद्धेः, नहि घटाभावो भूतलादि विरुणद्धि । नापि द्वितीयः; भावाना- मपि केषाञ्चित्तथाभावात् । अथ सहानवस्थानं विरोधो विवक्षितः, स भावानां नास्तीति चेन्न । गोत्वाश्वत्वादौ तस्यापि भावात् । एकविधावन्यनिषेधः स इति चेन्न । भेदे भावभेदयोरेव प्रसङ्गात् । एकविधि- रेवापरनिषेधः स इति चेन्न । निषेधस्याभावार्थत्वे भावार्थत्वे चासिद्धेः । समर्थन—'निषेधमुखेन प्रतीयमानत्व' अभावत्व है। खण्डन—यह लक्षण भी युक्त नहीं, कारण यदि निषेध को प्रतिक्षेपरूप मानें, तो भाव में अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि अभावरूप मानें, तो प्रश्न निवृत्त नहीं हुआ । समर्थन—'भाव का विरोधी अभाव है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—सभी भावों का विरोधित्व विवक्षित है या यत्-किञ्चित् भाव का ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं, कारण घटाभाव का भूतल अविरोधी है । अतः सर्व भावों का किसी भी अभाव से विरोध न होने से असंभव हो जायगा । द्वितीय पक्ष में यदि किञ्चिद्भाव ( उत्तर-संयोग ) के साथ वध्यघातकभावरूप विरोध कर्म में भी है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—यहाँ 'सहानवस्थान'रूप विरोध विवक्षित है, वह भावों में नहीं है । खण्डन—गोत्व और अश्वत्व में सहानवस्थानरूप विरोध है, अतः उनमें अतिव्याप्ति होने से यह भी कह नहीं सकते । समर्थन—'एक की विधि में अन्य का निषेध अभाव है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यदि लक्षणघटक विधि-निषेध में परस्पर भेद है, तो पीत की विधि में नील का निषेध होने से नील में अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'एक की विधि ही अपर का निषेध है' इस प्रकार विधि-निषेधों का अभेद मानें और यहाँ 'निषेध' शब्द का अभाव अर्थ करें, तो अभीतक अभाव की निरुक्ति न होने से लक्षण असिद्ध हो जायगा । यदि निषेध शब्द का भाव अर्थ करें, तो निषेध का भावार्थत्व अप्रसिद्ध होने से पुनः लक्षण की असिद्धि हो जायगी ।