भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 447

४२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नास्तीति प्रतीयमानत्वमिति चेन्न । घटाभावो नास्तीति घटस्य तथाप्रतीय- मानतया अभावत्वापत्तेः । अस्तीति भावत्वनिरुक्तौ यदुक्तं दूषणं तदापत्तेश्च । प्रतियोगिनिरूपणाधीननिरूपणत्वमिति चेन्न । प्रतियोगिनः परार्थत्वेऽति- प्रसङ्गात् । विरोध्यर्थत्वे चैतदनिरुक्तेः । असदर्थत्वे नञर्थस्यासिद्धेः अतीतानागत- ज्ञानादौ विषयादिनाऽतिप्रसङ्गात् । यच्च किञ्चिदभावस्य लक्षणमुच्यते, स भावोऽभावो वा स्यात् ? नाद्यः ; भाव- स्याभावानाश्रितत्वात् , विषयिधर्मेण च कथमपि तथात्वे तन्निर्व्वाच्यं स्यात् । समर्थन—‘नास्ति इत्याकारक जो ( प्रतीति ), उसका विषय अभाव है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—‘घटाभावो नास्ति' इत्याकारक प्रतीति का विषय घट भी है। अतः घट में अतिव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—इस लक्षण में “अस्ति' इत्याकारक प्रतीति का विषय भाव है" इस भाव- लक्षण में उक्त दोष भी हो जायँगे । अर्थात् ‘नास्ति' यह शब्द शब्दपरक है या अर्थ परक ? यदि शब्दपरक मानें, तो ‘न वर्तते, न भवति' इत्यादि प्रतीतियों के विषय अभाव न कहलायेंगे । यदि अर्थपरक कहें, तो अभीतक 'नास्ति' शब्द के अर्थ का निश्चय हुआ नहीं है, अतः अप्रसिद्धि या आत्माश्रय दोष हो जायगा, यह भाव है। समर्थन—‘प्रतियोगी के निरूपण के अधीन जिसका निरूपण हो, वह अभाव है,' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यदि प्रतियोगी शब्द का ‘पर’ अर्थ करें, तो विषय के निरूपण के अधीन बुद्धि का निरूपण होने से बुद्धि में एवं संयोगादि, ह्रस्वादि में अति- व्याप्ति हो जायगी । उसका 'विरोधी' यह अर्थ नहीं कर सकते, कारण अभीतक विरोध का निर्वचन ही हुआ नहीं है । नञर्थ की निरुक्ति न होने से प्रतियोगी शब्द का 'असत्' अर्थ भी नहीं कर सकते । किञ्च—अतीत, अनागत वस्तु का ज्ञान वर्तमान काल में असत् विषय से ही निरूपित होता है, अतः उसमें अतिव्याप्ति भी हो जायगी । किञ्च—आप जो कुछ अभाव का लक्षण करते हैं, वह भाव है या अभाव ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण भाव अभाव में नहीं रहता । यदि विषयिधर्म प्रमेयत्व, अभिधेयत्व के तुल्य भावरूप लक्षण को अभाव मानें, तो भी उस लक्षण का निर्वचन तो करना ही होगा । इस प्रकार सभी निर्वचन खण्डित हैं। यदि प्रमेयत्व के तुल्य अभाव का कोई भावरूप लक्षण कहें और उक्तलक्षणयुक्त अभाव को अभाव मानें, तो उसमें भी लक्षण का अस्तित्व कहना पड़ेगा । तब तो विशिष्टवृत्ति धर्म के विशेषण में