भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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४२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं 'परस्परविरोधे हि न प्रकारान्तरस्थितिः' इति न्यायात् । एवमीश्वराभिसन्ध्यादावपि तत्तत्स्थाने तिष्ठत्सर्वनामान्तरखण्डनमत्र द्रष्टव्यम् । इति कवितार्किकचक्रवर्ति--श्रीश्रीहर्षकृते खण्डनखण्डखाद्ये सर्वनामार्थानिरुक्तिर्नाम तृतीयः परिच्छेदः । नहीं है, भ्रमभिन्नत्वरूप प्रमात्व का आश्रय होने से अनित्य प्रमा में ही गुण की अपेक्षा होती है । इसी प्रकार 'ईश्वराभिसन्धि' नामक ग्रन्थ के तत्-तत् प्रकरण में किया गया अन्य सर्वनाम-शब्दों का खण्डन यहाँ भी समझ लेना चाहिए । अतः उनका यहाँ खण्डन न करने से कोई न्यूनता नहीं है । तृतीय परिच्छेद का भाषानुवाद समाप्त ।