भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

परिच्छेद ] सर्वनामार्थ का खण्डन ४१६ यथार्थत्वसंशयेन तस्याः प्रतोतेर्गोचरो यत्प्रमाणं तस्यापि योऽसौ विषय ईश्वर- सद्भावस्तत्र सर्वत्रैव संशयानस्य भवतः प्रश्नोऽयम् , न तु विप्रतिपन्नस्येति स्यात् । तथाच स्वीकुरु शिष्यभावम्, प्रसादय चिरं चरणशुश्रूषाभिरस्मान्, च्छेत्स्यामस्ते संशयमिति । विप्रतिपन्ना एव वयम्, आहार्यः संशयोऽस्माकमिति चेत्; तर्ह्यवधृतैककोटय एव, वयं कार्यानुरोधात्तु संशयमालम्बामह इत्युक्तं स्यात् । एवं तर्हि तदेव कोट्यवधारणं भवतां यथार्थमयथार्थं वेति विकल्पोक्तयुक्त्या दूषणीयम् । एतेन—अनध्यवसायेन¹ तदस्माभिः प्रतिपन्नमित्यपि निरस्तं वेदितव्यम् । व्यभिचारिविषयमव्यभिचारिविषयं वा तदिति विकल्पाभ्यां तस्यापि ग्रस्तत्वात् खंडन—प्रश्न का यह आशय हो नहीं सकता । कारण ऐसा मानने पर अर्थात् प्रमाण की प्रतीति में यथार्थत्व-अयथार्थत्व का सन्देह होने पर उस प्रतीति का विषय जो प्रमाण है, उसके भी विषय ईश्वर-सद्भाव में तुम्हें सन्देह ही है । अतः संशय से ही तुम यह प्रश्न करते हो, विप्रतिपन्न नहीं हो । तब तो हमारे शिष्य बनो, चरण-शुश्रूषा कर हमें प्रसन्न करो । हम तुम्हारे सन्देह का छेदन कर देंगे । समर्थन—हम विप्रतिपन्न ही हैं और हमारा संशय भी आहार्य ( इच्छा से ही जन्य ) है । खंडन—तब ऐसा कहिये कि एक कोटि अर्थात् अभाव का हमें निश्चय है। विजय की इच्छा से हम सन्देह का अवलम्बन करते हैं—यह आपके प्रश्न का आशय हुआ । एवञ्च आपका वह एककोटि का ज्ञान भ्रम है या यथार्थ, ऐसा विकल्प कर उक्त युक्ति से खण्डनीय है । समर्थन—वैशेषिकाभिमत अनध्यवसाय अविद्यारूप ज्ञान से ईश्वर-सद्भाव में प्रमाण ज्ञात होने के कारण उसमें प्रश्न हो सकता है । खंडन—वह अविद्यारूप ज्ञान भी यथार्थ है या अयथार्थ, इस विकल्प से ग्रस्त होने से उक्त आशय भी खण्डनीय है । यथार्थत्व-अयथार्थत्व ये दोनों कोटियाँ परस्पर विरुद्ध हैं । अतः एक कोटि के न होने पर अन्य द्वितीय कोटि की ही प्राप्ति होती है । दोनों से अन्य तृतीय कोटि की प्राप्ति नहीं होती । भाव यह है कि निर्विकल्पकात्मक उक्त ज्ञान भ्रम-प्रमा से बहिर्भूत १. 'किं स्विन्' इत्याकारक विशेषरूप से कोटिद्वय का अनुल्लेखी ज्ञान, जो विशेषतः विरुद्ध कोटिद्वयं के उल्लेखक संशयात्मक ज्ञान से विलक्षण है, 'अनध्यवसायात्मक ज्ञान' कहा जाता है, जिसके विषय में 'न्यायलीलावती' में विशेष रूप से विचार किया गया है ।