भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 437

४१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ तृतीय अथ मन्यसे—स्वसिद्धान्तमनुरुन्धानेन भवता यथार्थज्ञानं तत्रोत्पादनीयम् , अतस्तदर्थं भवाननुयुज्यत इति । मैवम्; य ईश्वरसद्भावविषयो भवता प्रमाणा- भासः प्रमाणतया भ्रान्त्या प्रतीतः, तस्य प्रमाणत्वमस्माभिर्व्युत्पादनीयमिति नास्माकमीदृशः सिद्धान्तः । प्रत्युतेश्वरसद्भावविषयं यत्प्रमाणं भवता प्रमाणा- भासत्वेन भ्रान्त्या प्रतीतमस्ति तत्प्रमाणनीयमिति । स्यान्मतमीश्वरसद्भावविषयस्य प्रमाणस्य भवता ज्ञापनमात्रं क्रियतामि- त्यभिमतं पृच्छतामस्माकम् , न तु प्रमाणेनाऽप्रमाणेनेति विशेषोऽप्यभिमत इति । न; ज्ञापनमात्रस्याप्रमाणज्ञानमादायाऽप्युपपत्तेः । तत्र स्वाधीने केयं परा- पेक्षेत्याद्युक्तमनुषञ्जनीयम् । स्यादेतत्—येयमीश्वरसद्भावविषया प्रमाणप्रतीतिरस्माकमुत्पन्ना सा व्यभि- चारिणी सत्या वेति संशयोऽत्रास्माकम् । तेनैकपक्षनिर्धारणाधीनं यदिदं दूषण- मवादि भवता, तन्निरवकाशमिति । नैतदस्ति; एवं हि तस्यां प्रतीतौ यथार्थत्वा- समर्थन—अपने सिद्धान्त के अनुसार आप ईश्वरविषयक प्रमाण में यथार्थ ज्ञान का उत्पादन करें, इसीलिए हम आपको प्रेरित कर रहे हैं । खंडन—यदि प्रश्न का यही आशय हो, तो वह ठीक नहीं । कारण ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाणाभास ( अनुमानादि ) को आप भ्रमवश प्रमाण मानते हैं । हम उस प्रमाणाभास के प्रमाणत्व का प्रतिपादन करें—यह हमारा सिद्धान्त नहीं । प्रत्युत हमारा यही सिद्धान्त है कि ईश्वरसद्भावविषयक प्रमाण ( वेद ) को आपने भ्रमवश प्रमाणाभास मान रखा है, उस (वेद) के प्रमाणत्व का प्रतिपादन करें । समर्थन—प्रश्नकर्ता का यही आशय है कि आप ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाण का बोधनमात्र करें, प्रमाण से ही बोधन करें या अप्रमाण से ही—ऐसा कोई विशेष अभिमत नहीं है । खण्डन—आपका यह मत भी युक्त नहीं है, कारण केवल बोधन अप्रमाण से भी हो सकता है और अयथार्थ ज्ञान के उत्पादन में आप स्वाधीन ही हैं । उसमें दूसरे की अपेक्षा व्यर्थ है, अतः पूर्वोक्त खण्डन की अनुवृत्ति ही कर लेनी चाहिए । समर्थन—ईश्वर-सद्भावविषयक प्रमाण का जो ज्ञान हमें हुआ है, वह यथार्थ या अयथार्थ है, ऐसा इस विषय में हमें सन्देह है । अतः एककोटि यथार्थत्व या अयथार्थत्व का निश्चय कर जो दूषण आपने दिया है, वह युक्त नहीं है ।