भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

परिच्छेद ] सर्वनामार्थ का खण्डन ४१७ यथार्थश्चेत्; तर्हि तेनैव ज्ञानेन स्वकीयो विषयः प्रमाणमुपस्थाप्यते, विषये प्रमाणप्रवृत्तिमन्तरेण तदीययथार्थत्वस्य वक्तुमशक्यत्वात् । तेनापि प्रमाणेन स्वगोचर ईश्वरसद्भाव उपस्थाप्यत इत्यनायासेनैव सिद्धोऽस्माकमीश्वरसिद्धि- मनोरथः । अथाऽयथार्थम् ; तत्रास्मिन्नयथार्थज्ञानविषये यद्यस्माभिरयथार्थमेव ज्ञान- मुत्पादनीयमिति भवतः पृच्छतो वाञ्छितं तदा केयं स्वाधीनेऽर्थे परापेक्षा ? भवानेव अयथार्थज्ञानोत्पादनकुशलो यथैकं तत्र मिथ्याज्ञानमजीजनत्, तथा परमप्युत्पादयतु । वयं पुनर्यथार्थज्ञानस्योत्पादयितारो मिथ्याज्ञाने सर्वथैवा- कृतिनः किमिह नियुज्येमहीति । अथ मदीयस्यायथार्थज्ञानस्य यो विषयः स मदीययथार्थज्ञानविषयो भवता क्रियतामिति त्वदीयं वाञ्छितम्; तदा व्याघातादीदृश‍्यर्थे भवतः प्रवृत्तिरेवानुपपन्ना । 'शुक्तिका रजतत्वेन मम यथार्थज्ञानविषयो भवत्वि'त्येतदर्थं प्रेक्षावान् कथङ्कारं प्रयतेत ? येन रूपेणायथार्थज्ञानविषयत्वं तेनैव रूपेण यथार्थज्ञानविषयत्वे व्याघातात् । यदि यथार्थ कहें, तो वही ज्ञान स्वविषय प्रमाण की भी उपस्थिति करेगा, कारण विषय में प्रमाण की प्रवृत्ति के बिना प्रमाणविषयक ज्ञान की यथार्थता का निश्चय नहीं हो सकता । फिर वह प्रमाण भी स्वविषय ईश्वर के सद्भाव की उपस्थिति कर ही देगा । इस तरह बिना परिश्रम के ही हमारा ईश्वरसद्भावरूप मनोरथ सिद्ध हो गया ! यदि आप यह चाहते हों कि अयथार्थ ज्ञान का विषय प्रमाण हममें अयथार्थ ज्ञान ही उत्पन्न करे, तो स्वाधीन अर्थ में दूसरे की अपेक्षा क्यों ? यथार्थ ज्ञान के उत्पादन में तो आप ही कुशल हैं । जैसे उस विषय में एक मिथ्याज्ञान को उत्पन्न किया है, वैसे ही और भी अयथार्थ ज्ञान का उत्पादन कर लें । हम तो यथार्थ ज्ञान के उत्पादक हैं और मिथ्याज्ञान के उत्पादन में सर्वथा अकुशल हैं । फिर इस विषय में हमें क्यों प्रेरित करते हैं ? समर्थन—मेरे अयथार्थ ज्ञान के विषय को मेरे यथार्थ का ज्ञान विषय आप करें । खण्डन—यदि ऐसी आपकी इच्छा है, तो व्याघात होने से इस विषय में आपकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती । 'शुक्तिका रजतत्वरूप से मेरे यथार्थ ज्ञान का विषय हो' इसके लिए कोई भी बुद्धिमान् किस तरह प्रवृत्त होगा ? जो पदार्थरूप से यथार्थ ज्ञान का विषय हो, उसी रूप से वह अयथार्थ ज्ञान का भी विषय हो, इसमें व्याघात है । ५३