भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 427

४०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ द्वितीय तत्र कश्चिदाह—शास्त्रमनाश्रित्य कथारम्भानुपपत्तिः । यदा हि क्षणभङ्गसाधन- नप्रयोक्ता अस्फूर्तिमता स्थिरवादिना सिद्धसाधनमुद्भाव्य निगृह्यते तदा किं कुर्यात् । प्रथमविप्रतिपत्तिविरोधमुद्भावयेदिति चेत्; एवं तर्हि विप्रतिपत्त्यनुगुणप्रमेया- न्तरव्यतिक्रममप्युद्भावयेदेव । अन्यथा विप्रतिपत्तिव्यतिक्रममप्युपेक्षेत, न खलु तत्तदनुगुणव्यतिक्रमयोर्विरोधापत्तिं प्रति कश्चिद्विशेषः । न चैकपुरुषार्थानुगुणाङ्गाङ्गिभावव्यवस्थितपदार्थजातव्युत्पादनादन्यच्छास्त्रं विवेचन करने की सामर्थ्य न होने से उत्पन्न होने के साथ ही सिद्धान्त-विशेष का अवलम्बन न करनेवाले प्राणी को किस दुर्मति ने ये तत्तत् सिद्धान्त प्राप्त कराये ? अर्थात् कोई सिद्धान्त किसीका 'अपना सिद्धान्त' नहीं होता । फिर उसे त्यागने पर उसे अपसिद्धान्त कैसे कहा जाय ? अर्थात् आरंभ से रीते ही जन्मे व्यक्ति को बाद में सिद्धान्त-विशेष में रोकना भी दुर्मति ही है । यहाँ 'सिद्धान्तविषयग्रहाः' यह रूपक है । अर्थात् विषय याने ग्राम आदि जैसे राजा द्वारा किसीको प्राप्त होते हैं, वैसे सिद्धान्त किसी को प्राप्त नहीं होते, यह भाव है । समर्थन—यहाँ कोई ( श्रीउदयनाचार्य ) कहते हैं कि शास्त्र का आश्रयण न कर कथा का आरम्भ ही नहीं हो सकता । कारण जिस काल में क्षणभङ्ग के साधक अनुमान ( 'यत् सत् तत्क्षणिकम्, यथा जलधराः, सन्तश्चामी भावाः' ) प्रयोक्ता स्फूर्ति- रहित, स्थिरवादी नैयायिक द्वारा सिद्धसाधन का उद्भावन कर निगृहीत किया जाय, तो वह क्या करे ? क्षणिकत्व मानने से अपसिद्धान्त होगा, ऐसा वह कह नहीं सकता, क्योंकि अपसिद्धान्त को वह मानता ही नहीं ? यदि कहें कि प्रथम विप्रतिपत्ति ( 'विमतं क्षणिकम् अक्षणिकं वा' ) के विषय क्षणिकत्व का स्वीकार करने से वह व्याघात ही का उद्भावन करेगा, तब तो वह विप्रतिपत्ति के विषय के साधक अन्य प्रमेय ( प्रत्यभिज्ञा ) आदि के अस्वीकार का भी उद्भावन करेगा ही । कारण स्थिरवादी प्रत्यभिज्ञा का स्वीकार करता है, अतः उसे व्याघात होता है । यदि इस व्याघात के होते हुए भी उसका उद्भावन न करे, तो विप्रतिपत्ति के विषय स्थिरत्व के स्वीकार-अस्वीकाररूप व्याघात का भी उद्भावन नहीं करेगा, दोनों के उद्भावन में कोई विशेष नहीं है । एक पुरुषार्थ—( स्वर्ग या अपवर्ग ) के साधक उपकार्य-उपकारकभाव से युक्त पदार्थ-समूह का कथन ही शास्त्र है, इससे अन्य शास्त्र नहीं है । तस्मात् जो

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · पृष्ठ 427, कुल 610 में से · BharatKosha